बाढ़ ने छीन लिया बचपन: रसुवा में भाई-बहनों और अपनों की तलाश में भटक रहे बच्चे
छह दिन से लापता हैं बहनें, किसी ने माता-पिता खोए तो किसी ने भाई-बहन; बाढ़ प्रभावित क्षेत्र में 17 हजार बच्चे प्रभावि
काठमांडू, ६ सितंबर। रसुवा और त्रिशूली नदी आसपास के क्षेत्रों में आई विनाशकारी बाढ़ ने केवल घर और संपत्ति ही नहीं बहाई, बल्कि सैकड़ों बच्चों से उनके माता-पिता, भाई-बहन और अपनेपन का सहारा भी छीन लिया है। राहत शिविरों में जिंदगी बचाकर पहुंचे बच्चे अब अपने बिछड़े परिजनों की तलाश में टकटकी लगाए बैठे हैं।
उत्तरगया गाउँपालिका–5, लहरेपौवा स्थित शिवालय आधारभूत विद्यालय के होल्डिंग सेंटर में ऐसे दर्जनों बच्चे हैं, जिनकी आंखों में भविष्य की चिंता से ज्यादा अपने लापता परिजनों की तलाश दिखाई देती है। किसी ने मां-बाप खो दिए हैं, किसी का भाई या बहन बाढ़ में बह गया है और किसी का घर ही अब इस दुनिया में नहीं रहा।
छह दिन से बहनों का इंतजार कर रहा 16 वर्षीय समीर
रसुवा खाल्टे के 16 वर्षीय समीर तामाङ उस दिन स्कूल पहुंच चुके थे। लेकिन घर में उनकी 13 वर्षीय बहन प्रिया और 7 वर्षीय बहन पार्वती थीं। छोटी बहन के हाथ में चोट लगी थी और वह स्कूल नहीं जा सकी थी। उसकी देखभाल के लिए बड़ी बहन भी घर में ही रुक गई थी।
अचानक भोटेकोशी में बाढ़ आ गई। समीर ने किसी तरह भागकर अपनी जान बचाई। लेकिन उनकी दोनों बहनें पिछले छह दिनों से लापता हैं।
शिवालय विद्यालय के होल्डिंग सेंटर में बैठे समीर की चिंता शब्दों में नहीं, उनके चेहरे पर साफ दिखाई देती है।
“साथी जैसी बहनें छिनभर में बाढ़ में बह गईं। अब वे कहां हैं, कुछ पता नहीं,” वे कहते हैं।
बाढ़ उनका घर भी बहा ले गई। पिता सूर्य ने किसी तरह भागकर जान बचाई। मां छेसाङ रोजगारी के सिलसिले में कुवैत में हैं।
अंजु ने एक साथ खो दिए मां, भाई और रिश्तेदार
इसी शिविर में 12 वर्षीय अंजु तामाङ भी हैं। कालिका हिमालय माध्यमिक विद्यालय में कक्षा 7 में पढ़ने वाली अंजु के जीवन पर बाढ़ ने ऐसा घाव छोड़ा है, जिसकी भरपाई शायद कभी नहीं हो सकेगी।
पांच वर्ष पहले उन्होंने अपने पिता बुद्धिमान को खोया था। अब 10 भदौ की बाढ़ में उनकी मां शुभमाया भी लापता हो गईं। वह शान्ति बाजार में एक रिश्तेदार के निधन के बाद उनके घर गई थीं, तभी अचानक बाढ़ आ गई।
लेकिन अंजु की पीड़ा यहीं खत्म नहीं होती।
उनके जेठे भाई सूर्यमान, जीजा ज्ञानबहादुर, चाची थर्मेन्दो, चाचा ज्ञानबहादुर और चाचा का एक वर्षीय बेटा प्रवीन भी बाढ़ के बाद से लापता हैं।
अब उनके साथ केवल बड़ी बहन सविना, भाभी सुशीला, उनके दो बेटे और छोटे भाई सुजन सुरक्षित हैं।
“पिता भी चले गए, अब मां भी नहीं रहीं। क्या कहूं, क्या करूं, कुछ समझ नहीं आ रहा,” अंजु की यह बात पूरे शिविर की पीड़ा को बयान करती है।
स्कूल गए बच्चे लौटे ही नहीं
रसुवा खाल्टे के 14 वर्षीय आकाश तामाङ भी उन बच्चों में हैं जिन्होंने अपनी आंखों के सामने बाढ़ की भयावहता देखी।
बाढ़ आने से पहले आकाश उत्तरगया पब्लिक स्कूल पहुंच चुके थे। स्कूल में बच्चे खेल रहे थे। तभी अचानक तेज आवाज के साथ बाढ़ आती दिखाई दी। स्कूल में अफरा-तफरी मच गई।
बेत्रावती बाजार की ओर से बाढ़ आते देख आकाश और उनके साथी जंगल की ओर भागे। देखते ही देखते जिस स्कूल में वे पढ़ते थे, वह बाढ़ में डूब गया।
लेकिन आकाश की अपनी जिंदगी भी अधूरी हो गई।
उनके 8 वर्षीय भाई अश्विन और 11 वर्षीय बहन अनिशा भी बाढ़ के बाद से लापता हैं। दोनों रामचन्द्र आधारभूत विद्यालय में पढ़ते थे।
उस सुबह आकाश ने खुद खाना बनाकर छोटे भाई-बहन को खिलाया था और उन्हें स्कूल भेजा था। उसके बाद वह खुद स्कूल के लिए निकले।
“पहले भाई-बहन को स्कूल भेजा। फिर मैं स्कूल गया। मैं तो बच गया, लेकिन वे नहीं बच सके,” कहते हुए आकाश की आंखें भर आती हैं।
उनके माता-पिता रोजगारी के सिलसिले में क्रमशः दुबई और मलेसिया में हैं। अब होल्डिंग सेंटर में आकाश लगभग अकेले हैं।
12 वर्षीय भाई की तलाश में 15 वर्षीय निराजन
15 वर्षीय निराजन तामाङ भी अपने 12 वर्षीय भाई अविरल की तलाश में बेचैन हैं।
दोनों खाल्टे में रिश्तेदार के घर रहकर पढ़ते थे। निराजन कक्षा 9 में और अविरल कक्षा 4 में पढ़ते थे।
उस दिन निराजन स्कूल पहले पहुंच गए थे। कुछ देर बाद अविरल भी स्कूल आने के लिए निकले, लेकिन विद्यालय पहुंचने से पहले ही बाढ़ की चपेट में आ गए।
“मैं स्कूल पहुंच चुका था। पैदल स्कूल आ रहा मेरा भाई बाढ़ में फंस गया। उसकी बहुत याद आती है। अब तो लगता है कि शायद भाई नहीं मिलेगा,” निराजन कहते हैं।
यह केवल एक परिवार की कहानी नहीं है। रसुवा और आसपास के बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों में ऐसी कहानियां दर्जनों परिवारों की हैं।
13 वर्षीय निर्मल: “अब पढ़ने का मन नहीं करता”
13 वर्षीय निर्मल घले ने बाढ़ में अपने दादा-दादी को खो दिया।
नीलकण्ठ माध्यमिक विद्यालय की कक्षा 7 में पढ़ने वाले निर्मल स्कूल जा रहे थे, तभी अचानक बाढ़ आ गई। उन्होंने और उनके साथियों ने जूते तक उतार दिए और जंगल की ओर भागकर जान बचाई।
“बहुत बड़ी आवाज थी। लगा अब नहीं बचेंगे। मेरे साथ स्कूल जा रहे और पढ़ने वाले कई साथी बाढ़ में फंस गए,” निर्मल बताते हैं।
अब उन्हें बाढ़ से डर लगता है। उनका घर भी बह चुका है। पहनने के लिए पर्याप्त कपड़े तक नहीं हैं।
“अब पढ़ने का मन नहीं करता,” निर्मल की यह छोटी-सी बात बताती है कि आपदा ने बच्चों के मन पर कितना गहरा असर डाला है। 
250 विद्यार्थी और शिक्षक संपर्कविहीन
शिक्षा मंत्रालय के प्रारंभिक आंकड़ों के अनुसार बाढ़ में 250 विद्यार्थी और शिक्षक संपर्कविहीन हैं। उपलब्ध विवरण के मुताबिक 230 विद्यार्थियों में से 213 अभी भी संपर्कविहीन हैं और 17 विद्यार्थियों के बाढ़ में बह जाने की जानकारी है।
इसी तरह 19 शिक्षक संपर्कविहीन हैं, जिनमें से 10 के बाढ़ में बह जाने की जानकारी मिली है। एक शिक्षक का शव भी बरामद किया गया है।
बाढ़ से प्रभावित क्षेत्र में 23 विद्यालयों को नुकसान पहुंचा है। इनमें नुवाकोट के 8, रसुवा के 7 तथा धादिङ सहित अन्य जिलों के विद्यालय शामिल हैं।
शिक्षा मंत्रालय का कहना है कि लोगों के संपर्क में आने और जीवित लोगों के मिलने का क्रम जारी है, इसलिए आंकड़े लगातार अपडेट किए जा रहे हैं।
17 हजार बच्चे प्रभावित
यूनिसेफ के प्रारंभिक आंकड़ों के अनुसार बाढ़ से लगभग 17 हजार बच्चे प्रभावित हुए हैं।
बाढ़ से बच गए बच्चे भी गंभीर जोखिम में हैं। विस्थापन, परिवार से बिछड़ना, भोजन की कमी और असुरक्षित वातावरण के कारण बच्चों में बीमारी, कुपोषण, हिंसा और शोषण का खतरा बढ़ गया है।
यूनिसेफ ने प्रभावित बच्चों के लिए अस्थायी शिक्षण केंद्र, वैकल्पिक शिक्षण सामग्री और बच्चों तथा शिक्षकों के लिए मनोसामाजिक परामर्श की तत्काल आवश्यकता बताई है।
अब एक नई चिंता—बच्चों की तस्करी का खतरा
बाढ़ में माता-पिता खो चुके या परिवार से बिछड़े बच्चों के सामने एक और गंभीर खतरा खड़ा हो गया है—बाल तस्करी और गैरकानूनी तरीके से बच्चों को एक स्थान से दूसरे स्थान ले जाने का।
महिला, बालबालिका तथा ज्येष्ठ नागरिक मंत्रालय ने रसुवा, नुवाकोट, धादिङ और त्रिशूली नदी आसपास के विपद् संकटग्रस्त क्षेत्रों में ऐसे बच्चों को बिना निर्धारित कानूनी प्रक्रिया के कहीं ले जाने पर रोक लगाने की अपील की है।
मंत्रालय के अनुसार माता-पिता खो चुके अथवा घरबारविहीन बच्चों को किसी भी व्यक्ति या संस्था द्वारा संबंधित स्थानीय तह के बालकल्याण अधिकारी की सिफारिश तथा राष्ट्रीय बालअधिकार परिषद की अनुमति के बिना कहीं ले जाना गैरकानूनी होगा।
राहत के साथ जरूरी है पौष्टिक भोजन
नेपाल रेडक्रस सोसाइटी ने भी राहत शिविरों में रह रहे बच्चों की स्थिति को लेकर चिंता व्यक्त की है।
रेडक्रस के अनुसार कई स्थानों पर बच्चों को तत्काल राहत के रूप में नूडल्स जैसे खाद्य पदार्थ दिए जा रहे हैं। लेकिन आपदा के बाद बच्चों, विशेषकर छोटे बच्चों और नवजात शिशुओं को प्रोटीन और अन्य पोषक तत्वों से भरपूर संतुलित आहार की आवश्यकता है।
नुवाकोट के विभिन्न होल्डिंग सेंटरों में रेडक्रस ने मैट्रेस, कंबल, ड्राई फूड और कपड़ों का वितरण किया है।
सबसे बड़ी जरूरत—इन बच्चों को उनके परिवार तक पहुंचाना
यूनिसेफ और अन्य संस्थाएं लापता अथवा परिवार से बिछड़े बच्चों की पहचान, पंजीकरण और परिवार से पुनर्मिलन के लिए काम कर रही हैं। मनोसामाजिक परामर्श के लिए भी टीमें परिचालित की गई हैं।
लेकिन राहत शिविर में बैठे समीर, आकाश, निराजन, निर्मल और अंजु जैसे बच्चों के लिए सबसे बड़ी राहत कोई कंबल, कपड़ा या भोजन नहीं है।
उनके लिए सबसे बड़ी राहत है—उनका अपना कोई व्यक्ति वापस मिल जाए।
एक भाई अपनी बहनों का इंतजार कर रहा है।
एक बहन अपनी मां को खोज रही है।
एक भाई अपने छोटे भाई को पुकार रहा है।
और एक बच्चा अपने दादा-दादी को खोने के बाद अपने घर की तलाश कर रहा है।
बाढ़ का पानी उतर जाएगा। सड़कें फिर बनेंगी। स्कूल दोबारा खुलेंगे। घर भी शायद फिर बनाए जाएंगे।
लेकिन जिन बच्चों के बचपन को बाढ़ अपने साथ बहा ले गई है, उनके मन में बना यह खालीपन इतनी आसानी से नहीं भरेगा।
यह केवल प्राकृतिक आपदा नहीं है। यह एक पूरी पीढ़ी के बचपन पर पड़ा ऐसा घाव है, जिसे राहत सामग्री से नहीं, बल्कि सुरक्षा, शिक्षा, परिवार से पुनर्मिलन और लंबे समय तक मानवीय संवेदना से ही भरा जा सकता है।


