संवाद राज्य की सबसे बड़ी शक्ति है : श्वेता दीप्ति
डॉ श्वेता दीप्ति, सम्पादकीय हिमालिनी अंक अगस्त, ६ सितंबर। लोकतंत्र संवाद, सहमति और विधि के शासन पर आधारित व्यवस्था है । इसलिए लोकतांत्रिक राज्य में जनता और सरकार के बीच मतभेद होना असामान्य नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक जीवन का स्वाभाविक अंग है । विरोध प्रदर्शन, धरना, रैली और आंदोलन नागरिकों के संवैधानिक अधिकार हैं । किंतु जब कोई आंदोलन हिंसक रूप धारण कर ले, सार्वजनिक या निजी संपत्ति को क्षति पहुँचाने लगे, आगजनी और तोड़फोड़ होने लगे अथवा आम नागरिकों की सुरक्षा खतरे में पड़ जाए, तब कानून–व्यवस्था बहाल करना राज्य का दायित्व बन जाता है ।
फिर भी यह दायित्व राज्य को असीमित अधिकार नहीं देता । लोकतांत्रिक शासन की पहचान इसी में है कि वह कठिनतम परिस्थितियों में भी संयम, धैर्य और पेशेवर दक्षता का परिचय दे । सुरक्षा बलों की पहली जिम्मेदारी तनाव को कम करना और स्थिति को नियंत्रित करना है, न कि बल प्रयोग को प्राथमिक उपाय बना देना । इसलिए गोली चलाना सदैव अंतिम विकल्प होना चाहिए ।
किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में राज्य को कानून लागू करने और नागरिकों के जीवन, स्वतंत्रता तथा संपत्ति की रक्षा करने का अधिकार प्राप्त होता है । इसी उद्देश्य की पूर्ति के लिए उसके पास पुलिस, सशस्त्र बल तथा अन्य सुरक्षा एजेंसियाँ होती हैं । किंतु जब कानून–व्यवस्था बनाए रखने के लिए बल प्रयोग, विशेषकर गोली चलाने की नौबत आती है, तब यह केवल प्रशासनिक निर्णय नहीं रह जाता; यह संवैधानिक, नैतिक और मानवीय विमर्श का विषय भी बन जाता है । गोली राज्य की शक्ति का सबसे कठोर और अंतिम साधन है । लोकतांत्रिक व्यवस्था में इसका प्रयोग तभी न्यायोचित माना जाता है, जब अन्य सभी वैधानिक और शांतिपूर्ण उपाय निष्फल हो जाएँ तथा जनजीवन, सार्वजनिक संपत्ति या राष्ट्रीय सुरक्षा पर तत्काल और गंभीर संकट उत्पन्न हो ।
विश्व के अधिकांश लोकतांत्रिक देशों में बल प्रयोग के संबंध में स्पष्ट और क्रमबद्ध दिशा–निर्देश निर्धारित हैं । सामान्यतः सबसे पहले संवाद और समझाने का प्रयास किया जाता है । इसके बाद चेतावनी, भीड़ नियंत्रण के गैर–घातक उपाय, लाठीचार्ज, आँसू गैस, पानी की बौछार अथवा अन्य नियंत्रित साधनों का उपयोग किया जाता है । गोली चलाने का निर्णय तभी लिया जाता है, जब किसी व्यक्ति, समूह या भीड़ से तत्काल और गंभीर जानलेवा खतरा उत्पन्न हो तथा उसके अतिरिक्त कोई प्रभावी विकल्प शेष न रह जाए । यही लोकतांत्रिक शासन और दमनकारी शासन के बीच मूलभूत अंतर भी है ।
सुनसरी के देवानगंज में हुई हिंसक घटना ने एक बार फिर सुरक्षा व्यवस्था, प्रशासनिक निर्णयों और बल प्रयोग की आवश्यकता पर राष्ट्रीय बहस को जन्म दिया है । प्रारंभिक घटनाक्रम के अनुसार स्थानीय विवाद ने देखते–ही–देखते हिंसक रूप धारण कर लिया । स्थिति को नियंत्रित करने के लिए पहले भीड़ नियंत्रण के विभिन्न उपाय अपनाए गए और बाद में गोली चलाने की नौबत आई । घटना के बाद कफ्र्यू लगाया गया, अतिरिक्त सुरक्षा बल तैनात किए गए तथा सरकार ने जाँच की प्रक्रिया भी प्रारम्भ की । किन्तु किसी भी ऐसी घटना के बाद केवल यह पूछना पर्याप्त नहीं है कि गोली क्यों चली । उससे अधिक महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि ऐसी स्थिति उत्पन्न ही क्यों हुई, जहाँ गोली चलाना आवश्यक समझा गया । क्या स्थानीय प्रशासन को तनाव की पूर्व सूचना थी ? क्या विभिन्न सुरक्षा निकायों के बीच समुचित समन्वय स्थापित था ? क्या प्रारम्भिक स्तर पर संवाद और मध्यस्थता के सभी उपाय अपनाए गए ? क्या उपलब्ध संसाधन और भीड़ नियंत्रण के गैर–घातक साधन पर्याप्त थे ? और सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न–क्या ऐसी परिस्थितियों को गोली चलाए बिना नियंत्रित किया जा सकता था ?
ये प्रश्न केवल किसी एक घटना से जुड़े नहीं हैं, बल्कि सम्पूर्ण सुरक्षा तंत्र की कार्यकुशलता और लोकतांत्रिक उत्तरदायित्व से जुड़े हुए हैं । किसी भी लोकतांत्रिक राज्य में प्रत्येक गोली केवल एक व्यक्ति को ही प्रभावित नहीं करती, बल्कि वह नागरिकों के मन में राज्य की कार्यप्रणाली के प्रति विश्वास और अविश्वास दोनों की संभावनाएँ भी पैदा करती है ।
वर्तमान परिस्थिति में यह भी आवश्यक है कि नेपाल के सभी सुरक्षा निकाय–नेपाल पुलिस, सशस्त्र प्रहरी बल, नेपाली सेना तथा राष्ट्रीय अनुसन्धान विभाग–अपने–अपने दायित्वों, संसाधनों और समन्वय तंत्र का गंभीर पुनर्मूल्यांकन करें । बदलती सामाजिक परिस्थितियों, सोशल मीडिया के तीव्र प्रभाव और अचानक फैलने वाले तनाव को देखते हुए पारंपरिक सुरक्षा दृष्टिकोण अब पर्याप्त नहीं रह गया है । आधुनिक भीड़ नियंत्रण तकनीक, त्वरित खुफिया सूचना, स्थानीय प्रशासन के साथ निरंतर संवाद तथा संकट प्रबंधन की पूर्व तैयारी आज की अनिवार्य आवश्यकता बन चुकी है ।

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हिमालिनी

