क्या लोकतंत्र में सवाल पूछना गुनाह है ? गंदी गालियां, ट्रोलिंग और नेपाली समाज का मानसिक पतन : कृतिका यादव

कृतिका यादव, काठमांडू ६सितंबर । नेपाली समाज में महिलाओं को सदैव देवी, माता और सम्मान का सर्वोच्च स्थान दिया गया है। हमारी संस्कृति में किसी महिला या नागरिक की गरिमा पर उंगली उठाना भी महापाप माना जाता था। पहले के दौर में जब सोशल मीडिया (फेसबुक, टिकटॉक आदि) इतना हावी नहीं था, तब समाज में राजनीतिक मतभेद होने के बावजूद बातचीत में एक मर्यादा, लिहाज और संवेदनशीलता बनी रहती थी। लेकिन पिछले कुछ समय से नेपाल में एक नया और बेहद जहरीला चलन शुरू हुआ है—सोशल मीडिया के जरिए गाली-गलौज करना, ट्रॉलिंग करना और आवाज उठाने वालों का चरित्र-हनन करना।
आज यदि कोई आम नागरिक सरकार या तंत्र की नाकामी पर सवाल पूछता है, अपनी पीड़ा व्यक्त करता है, तो उसे तुरंत दबाने और चुप कराने की कोशिश की जाती है। चाहे वह बुजुर्ग हो, मासूम बच्चा हो, या किसी सम्मानित घर की महिला—सत्ता और राजनीतिक गुटों की साइबर सेना सीधे तौर पर उस इंसान की अस्मिता पर हमला बोल देती है।
हाल ही में रसुवा में लापता हुए इंजीनियर और उनकी बिलखती पत्नी का मामला इसका सबसे हृदयविदारक उदाहरण है। काख में मासूम बच्चा लिए, अपने पति की “सांस या लाश” की गुहार लगाती एक असहाय महिला को सहानुभूति देने के बजाय सोशल मीडिया पर “नौटंकी”, “भालुनी” और “झोलेनी” जैसे घटिया और अश्लील शब्दों से नवाजा गया। यह केवल एक महिला का अपमान नहीं है, बल्कि नेपाल के लोकतंत्र और सामाजिक ताने-बाने को उलझाने और बिगाड़ने का सुनियोजित प्रयास है।
*1. सवाल पूछने वालों को डराकर चुप कराने की साजिश*
यह ट्रोलिंग और चरित्र-हनन कोई अनजाने में हुआ व्यवहार नहीं है, बल्कि यह एक रणनीतिक हथियार बन चुका है।
आवाज दबाने का डर: जब किसी एक महिला या नागरिक को सोशल मीडिया पर गंदी गालियां देकर उसका चरित्र-हनन किया जाता है, तो इसका सीधा संदेश बाकी समाज को दिया जाता है—”यदि तुमने भी सवाल पूछा, तो तुम्हारा हश्र भी यही होगा।”
जनता को उलझाना: मूल मुद्दों (जैसे प्रशासनिक नाकामी, भ्रष्टाचार, गायब लोगों की खोज-बीन) से ध्यान भटकाकर बहस को गालियों, व्यक्तिगत आक्षेपों और राजनीतिक गुटबाज़ी में उलझा दिया जाता है।
लोकतंत्र में नागरिक की भूमिका: नेपाल के संविधान ने हर नागरिक को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता (Freedom of Speech) दी है। सरकार कोई मालिक या राजा नहीं है, वह जनता द्वारा चुनी गई ‘सेवक’ (नौकर) है। सवाल पूछने वाला व्यक्ति किसी पार्टी का कार्यकर्ता हो—यह बिल्कुल जरूरी नहीं; वह केवल एक पीड़ित और सचेत ‘आम नागरिक’ होता है।
*2. इस गंदी संस्कृति के भयानक परिणाम*
यदि इस जहरीली प्रवृत्ति को यहीं नहीं रोका गया, तो नेपाली समाज को इसके गंभीर परिणाम भुगतने होंगे:
सभ्य और योग्य लोगों का मौन होना: जब सोशल मीडिया का माहौल इतना घटिया हो जाएगा, तो समाज के पढ़े-लिखे, समझदार, महिलाएं और युवा अपनी आवाज उठाना बंद कर देंगे। इससे केवल उपद्रवियों और अपराधियों का बोलबाला होगा।
मानवीय संवेदना (Empathy) का खात्मा: जब हम किसी की चीख और रोने-धोने को भी “ड्रामा” या “राजनीति” कहने लगेंगे, तो एक समाज के रूप में हम पूरी तरह संवेदनहीन और निष्ठुर बन जाएंगे।
सामाजिक ताने-बाने का बिखराव: हर बात को राजनीतिक चश्मे और गालियों से तोलने से परिवारों, दोस्तों और समाज के बीच आपसी विश्वास और सम्मान हमेशा के लिए खत्म हो जाएगा।
मानसिक तनाव और आत्महत्याएँ: बिना किसी कसूर के साइबर बुलिंग और चरित्र-हनन का शिकार होने वाले लोग गहरे डिप्रेशन और आत्महत्या जैसे कदम उठाने को मजबूर हो सकते हैं।
*3. इस समस्या से कैसे निपटें ? (समाधान और उपाय)*
इस बिगड़ते सामाजिक माहौल को सुधारने और सोशल मीडिया को सुरक्षित बनाने के लिए तत्काल निम्नलिखित कदम उठाए जाने चाहिए:
कड़े कानून और त्वरित साइबर पुलिस कार्रवाई: नेपाल पुलिस की साइबर ब्यूरो को केवल कागजी कार्रवाई तक सीमित न रहकर फर्जी अकाउंट्स (Fake IDs) और सोशल मीडिया पर महिलाओं की अस्मिता पर हमला करने वालों को तुरंत ट्रैक करके कड़ी सजा देनी चाहिए।
नागरिकों द्वारा संगठित बहिष्कार (Report & Block): समाज के आम नागरिकों को भी ऐसे ट्रोलर्स और घटिया कमेंट्स करने वालों का समर्थन करने के बजाय उन्हें सामूहिक रूप से ‘रिपोर्ट’ और ‘ब्लॉक’ करना चाहिए। ऐसे तत्वों को सोशल मीडिया पर कोई अटेंशन (ध्यान) न दें।
राजनीतिक दलों की जवाबदेही: चाहे कांग्रेस हो, कम्युनिस्ट पार्टियाँ हों, मधेसी पार्टियाँ हों, आरएसपी (RSP) हो या अन्य कोई भी राजनीतिक दल—सभी को सार्वजनिक रूप से अपने कैडरों और साइबर विंग्स को कड़ा निर्देश देना होगा कि वे किसी भी नागरिक या महिला के खिलाफ अभद्र भाषा और चरित्र-हनन का प्रयोग न करें।
डिजिटल साक्षरता और नैतिक शिक्षा: स्कूलों, कॉलेजों और जनसंचार माध्यमों के जरिए यह सिखाया जाना बेहद जरूरी है कि ‘फ्रीडम ऑफ Speech’ का मतलब किसी को गाली देना या चरित्र-हनन करना नहीं होता।
*निष्कर्ष*
नेपाल का समाज सदैव अपनी सहिष्णुता, भद्रता और विपत्ति के समय एक-दूसरे के साथ खड़े होने के मानवीय मूल्यों के लिए जाना गया है। राजनीति की क्षणिक अंधभक्ति और सोशल मीडिया की बेलगाम होड़ में हमें अपनी इस सांस्कृतिक और नैतिक पहचान को खोने नहीं देना चाहिए।
सत्ता से जवाबदेही और न्याय की मांग करना प्रत्येक नेपाली नागरिक का संवैधानिक और लोकतांत्रिक अधिकार है। किसी के गहरे दुख, वेदना और आंसुओं पर अभद्र भाषा का प्रहार करना न तो वीरता है और न ही अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता—यह सरासर वैचारिक कंगाली और मानवीय संवेदनहीनता है। अब समय आ गया है कि हम एक प्रबुद्ध समाज के रूप में अपनी चेतना जगाएं और यह आत्ममंथन करें कि “परिस्थितियों की गंभीरता, मानवीय गरिमा और शब्दों की मर्यादा का सम्मान कैसे किया जाता है।संवाद में सभ्यता और आचरण में करुणा ही किसी भी सशक्त समाज और जीवंत लोकतंत्र की सच्ची कसौटी है।


