सात अधिकारकर्मियों ने की मांग कहा …गृहमंत्री सार्वजनिक रूप से मांगे माफी
काठमांडू, भाद्र २५ – सात अधिकारकर्मियों ने एक एक संयुक्त विज्ञप्ति जारी की है । इन अधिकारकर्मियों में अधिवक्ता तथा अभियंता हैं । इन सभी ने एक संयुक्त विज्ञप्ति जारी कर गृहमंत्री सुधन गुरुङ से आग्रह किया है कि पत्रकारों के विरुद्ध गृहमंत्री ने जिन शब्दों का प्रयोग किया है उसके लिए वे माफी मांगे ।
राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग के पूर्व आयुक्त सुशील प्याकुरेल, मानव अधिकारकर्मी शोभाकर बुढाथोकी, वरिष्ठ अधिवक्ता दिनेश त्रिपाठी, महिला अधिकारकर्मी श्यामकुमारी साह, मानव अधिकारकर्मी सोम निरौला, मानव अधिकारकर्मी सुबोध प्याकुरेल और युवा अभियन्ता अभिषेक अधिकारी ने संयुक्त वक्तव्यों के माध्यम आपत्ति जताई है जहाँ गृहमंत्री गुरुङ ने पत्रकारों के विरुद्ध अपनी अभिव्यक्ति दी है ।
‘गृहमंत्री सुधन गुरुङ ने २०८३ भाद्र २३ में दिए गए समग्र भाषण आपत्तिजनक है । उक्त अभिव्यक्तियों में से पत्रकारों के विरुद्ध प्रयोग किए गए धमकीपूर्ण शब्दों के प्रति खेद व्यक्त करते हैं । । इन सभी ने संयुक्त रुप से जारी किए गए विज्ञप्ति में कहा है कि –‘हम सभी माध्यमों के संचारकर्मियों से आग्रह करते हैं कि समाचार सम्प्रेषण और प्रवाह के दायित्व का जिम्मेदारीपूर्वक निर्वाह करें ।
इसके साथ ही हम गृहमंत्री गुरुङ से भी आग्रह करते हैं कि पत्रकारों के खिलाफ धमकीपूर्ण शब्दों को वापस लें और सार्वजनिक रूप से माफी मांगें । गृहमंत्री सुधन गुरुङ ने २०८३ भाद्र २३ को जो टिप्पणियां की थी, समग्र में आपत्तिजनक है । उक्त अभिव्यक्ति में से पत्रकारों के विरुद्ध प्रयोग किए गए धमकीपूर्ण शब्दों के प्रति हम खेद व्यक्त करते हैं ।
उन्होंने लिखा है कि – हमने अनुभूति किया है कि गृह मंत्री गुरुंग—जिन पर शांति, सुरक्षा और अमन चैन तथा कानून–व्यवस्था बनाए रखने के साथ–साथ आपदा प्रबंधन की मुख्य जिम्मेदारी है, उनके अराजक व्यवहार और बयानों ने कई बार देश की शासन व्यवस्था का मान घटाया है।
गृह मंत्री के चयन और उन पर लगे आरोपों की ‘जांच’ को हमने जिस शक की नजÞर से देखा है, उसे देखते हुए हमें लगता है कि पत्रकारों के प्रति गुरुंग की आक्रामक टिप्पणियां यह दिखाती हैं कि उन्हें अपने ऊंचे पद की गरिमा, संयम और गंभीरता की समझ नहीं है।
एक पत्रकार की मुख्य जिम्मेदारी है कि वह सरकारी तंत्र में ऊँचे पदों पर बैठे लोगों से सवाल करे और उन्हें जवाबदेह ठहराए—यह एक ऐसा काम है जिसे संचार जगत ने पंचायत काल से ही, अनेक मुश्किलों, चुनौतियों और धमकियों के बावजूद लगातार निभाया है । इस कारण, नेपाल में लोकतंत्र कायम रहा है, सुशासन की नींव पड़ी है और भ्रष्टाचार को उजागर करने की कोशिशों को मजबूती मिली है ।


