रसुवा की बाढ़ ने दिया हिमालय का चेतावनी संदेश : श्वेता दीप्ति
डॉ श्वेता दीप्ति, (सम्पादकीय) हिमालिनी अंक सितंबर । नेपाल के रसुवा जिले में भोटेकोशी नदी पर आई विनाशकारी बाढ़ केवल एक प्राकृतिक आपदा नहीं थी । यह हिमालय की बदलती जलवायु, तेजी से अस्थिर होते ग्लेशियरों और अव्यवस्थित विकास मॉडल की गंभीर चेतावनी है । इस त्रासदी ने एक बार फिर यह प्रश्न हमारे सामने खड़ा कर दिया है कि क्या हिमालयी देशों– नेपाल, भारत, भूटान और चीन– ने अपने पर्वतीय क्षेत्रों को वास्तव में समझा है रु या हम अब भी नदियों के स्वाभाविक रास्तों और ग्लेशियरों की अनिश्चित प्रकृति को नजरअंदाज कर रहे हैं रु रसुवा की घटना ने साबित कर दिया कि हिमालय में आने वाली आपदाएं केवल वर्षा या भूस्खलन तक सीमित नहीं हैं । ग्लेशियर झीलों के फटने, हिमस्खलन, बर्फीले बांधों के टूटने और ऊंचाई वाले क्षेत्रों में अचानक जलसंचय जैसी घटनाएं अब अधिक बार और अधिक तीव्र रूप में सामने आ रही हैं ।

हिमालय को अक्सर ‘थर्ड पोल’ यानी दुनिया का तीसरा ध्रुव कहा जाता है । अंटार्कटिका और आर्कटिक के बाद सबसे अधिक बर्फ यहीं मौजूद है । पूरे हिंदूकुश–हिमालय क्षेत्र में लगभग ५४ हजार से अधिक ग्लेशियर फैले हुए हैं । इनमें से लगभग ३,२०० से अधिक ग्लेशियर नेपाल में स्थित हैं । इन ग्लेशियरों से निकलने वाली नदियां नेपाल ही नहीं, बल्कि भारत, बांग्लादेश, पाकिस्तान और चीन के करोड़ों लोगों की जीवनरेखा हैं ।
नेपाल के उत्तरी हिमाली क्षेत्र में रसुवा, सोलुखुम्बु, संखुवासभा, दोलखा, मनाङ, मुस्ताङ, हुम्ला और ताप्लेजुङ जैसे जिलों में बड़ी संख्या में सक्रिय ग्लेशियर मौजूद हैं । रसुवा स्वयं लांगटांग हिमालय का हिस्सा है, जहां सैकड़ों ग्लेशियर और दर्जनों हिमनदीय झीलें स्थित हैं । लांगटांग ग्लेशियर रसुवा जिले का सबसे बड़ा ग्लेशियर है, जिससे लांगटांग खोला और त्रिशूली नदी प्रणाली को पानी मिलता है । याला ग्लेशियर जलवायु परिवर्तन के प्रभावों का अध्ययन करने वाला नेपाल का सबसे अधिक निगरानी किया जाने वाला ग्लेशियर है । लिरुंग ग्लेशियर लांगटांग क्षेत्र का तेजी से पिघलता ग्लेशियर है, जिसके आसपास कई छोटी ग्लेशियर झीलें विकसित हो रही हैं ।
लांगशीसा ग्लेशियर ऊंचे हिमालय में स्थित विशाल हिमनद, जहां बर्फ के टूटने और हिमस्खलन का जोखिम बना रहता है । इन ग्लेशियरों के आसपास बनने वाली झीलें भविष्य में बड़े खतरे का कारण बन सकती हैं । नेपाल में २,००० से अधिक ग्लेशियर झीलें हैं। इनमें से लगभग २०–२५ झीलें अत्यधिक जोखिम वाली मानी जाती हैं । दोलखा, सोलुखुम्बु,संखुवासभा, मनांग में नेपाल की सबसे खतरनाक झीलें हैं । जलवायु परिवर्तन के कारण हिमनद तेजी से पीछे हट रहे हैं और उनके स्थान पर पानी भरकर विशाल झीलें बन रही हैं । यदि इन झीलों का प्राकृतिक बांध टूट जाए, तो कुछ ही मिनटों में करोड़ों घनमीटर पानी नीचे की घाटियों में तबाही मचा सकता है ।
रसुवा बाढ़ के बाद सबसे बड़ा सवाल उठा कि क्या ऐसी आपदाओं की पहले से सूचना दी जा सकती थी रु उत्तर है– कुछ हद तक, लेकिन पूरी तरह नहीं । राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन विशेषज्ञों का मानना है कि हिमालय में ग्लेशियर झीलों के लिए अर्ली वार्निंग सिस्टम विकसित करना दुनिया की सबसे कठिन तकनीकी चुनौतियों में से एक है । नेपाल और भारत दोनों कुछ संवेदनशील झीलों पर सेंसर, जलस्तर मापक, मौसम स्टेशन और सैटेलाइट निगरानी प्रणाली विकसित कर रहे हैं, लेकिन पूरे हिमालय को कवर करना फिलहाल संभव नहीं है ।
रसुवा ने सिखाया है कि केवल तकनीक काफी नहीं, तकनीक से पहले जोखिम की समझ आवश्यक है । नदी के बिल्कुल किनारे बहुमंजिला भवन, होटल, होम–स्टे और जलविद्युत परियोजनाएं बनाई गईं । कई संरचनाएं नदी के पुराने बहाव क्षेत्र में थीं । जब बाढ़ आई तो नदी ने अपना प्राकृतिक मार्ग वापस ले लिया । हिमालय की नदियां सदियों में अपना रास्ता बदलती हैं । वे केवल सामान्य दिनों की पतली धारा नहीं होतींस उनके पास विस्तृत बाढ़ क्षेत्र होता है । यदि उस क्षेत्र में निर्माण होगा, तो किसी न किसी दिन नदी उसे वापस ले लेगी । यही सबक २०१३ की केदारनाथ त्रासदी ने भी दिया था और अब रसुवा ने उसे दोहरा दिया ।
पहाड़ों में पुराने गांव अक्सर ऊंची ढलानों पर बसे मिलते हैं । लोग नदी के किनारे स्थायी घर नहीं बनाते थे । खेती नीचे होती थी, लेकिन बस्तियां ऊपर रहती थीं । आज पर्यटन, सड़क और व्यापार के नाम पर घाटियों के तल तक निर्माण पहुंच गया है । नदी किनारे रिसॉर्ट, बाजार, पुल और होटल बन रहे हैं । इससे जोखिम कई गुना बढ़ गया है ।
रसुवा की त्रासदी के बाद नेपाल के लिए कुछ प्राथमिक कदम स्पष्ट दिखाई देते हैं । पहला, सभी संवेदनशील ग्लेशियर झीलों का नियमित वैज्ञानिक सर्वेक्षण और सैटेलाइट मॉनिटरिंग । दूसरा, चीन, भारत और नेपाल के बीच रियल टाइम हाइड्रोलॉजिकल डेटा साझा करने की व्यवस्था मजबूत करना । तीसरा, नदी के बाढ़ क्षेत्र का वैज्ञानिक मानचित्र तैयार कर वहां नए निर्माण पर स्पष्ट प्रतिबंध लगाना । चौथा, स्थानीय समुदायों के लिए अर्ली वार्निंग संदेश, सायरन, निकासी मार्ग और नियमित मॉक ड्रिल अनिवार्य करना । पांचवां, जलविद्युत परियोजनाओं, पुलों और सड़कों के डिजाइन में हिमालयी बाढ़ के नए जोखिमों को शामिल करना ।
रसुवा की बाढ़ किसी एक जिले या एक देश की त्रासदी नहीं है । यह पूरे हिमालयी क्षेत्र के लिए चेतावनी है । जलवायु परिवर्तन ग्लेशियरों को बदल रहा है, लेकिन उससे भी बड़ा खतरा हमारी विकास नीतियों की अनदेखी है । हिमालय को जीतने की नहीं, समझने की आवश्यकता है । यदि रसुवा की त्रासदी से यह सबक नहीं लिया गया, तो आने वाले वर्षों में हिमालय की नदियां बार–बार हमें यही याद दिलाती रहेंगी कि प्रकृति अंततः अपना रास्ता स्वयं चुनती है ।

सम्पादक, हिमालिनी ।

