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जनता का दिल स्टंट से नहीं अपने काम और व्यवहार से जीतें कंचना झा

 

“प्रजा सुखे सुखं राज्ञः, प्रजानां च हिते हितम् ।”

अर्थात् राजा का सुख प्रजा के सुख में है, और उसका हित प्रजा के हित में है । चाणक्य नीति कहती है कि राज्य का पहला धर्म है–प्रजा की रक्षा ।
देश में अब राजा नहीं रहें । राजतंत्र से देश गणतंत्र या लोकतंत्र बन चुका है । ऐसे में अब राजा नहीं है तो देश का सर्वेसर्वा प्रधानमंत्री होता है । प्रधानमंत्री देश के अभिभावक हैं और जनता उनकी संतान । अपनी संतान की रक्षा करना प्रधानमंत्री का पहला कर्तव्य होता है ।

 

चाणक्य नीति कहती है जब देश में आपदा आए, तो सबसे पहले जनता की सुरक्षा और राहत पर ध्यान देना चाहिए । चाणक्य नीति में कहीं भी “प्रदर्शन” या “लोकप्रियता” को प्राथमिकता नहीं दी गई है । नीति कहती है कि आप दिखावा में नहीं जाए । आप परिणाम, दक्षता और प्रजा–कल्याण की ओर ध्यान दें । क्योंकि यही असली मापदंड हैं ।
लेकिन देश इस समय विषम परिस्थिति के दौर से गुजर रहा है । भाद्र १० गते की सुबह हिमस्खलन से आई विनाशकारी बाढ़ ने रसुवा, भोटेकोशी, नुवाकोट तथा चितवन आदि कई जिलों में तबाही मचा दी है । जनधन की अपार क्षति हुई है । तबाही का मंजर कुछ इस तरह का कि ह्दय चित्कार कर उठता है । यह समय मिलकर, इस आपदा से लड़ने का है, एक दूसरे का साथ देने और सहयोग का करने का समय है ।
भाद्र १९ गते ९४ सितंबर० आलेख तैयार करते समय तक नेपाल प्रहरी द्वारा जारी किए गए के आकंड़े कुछ इस तरह से हैं – भोटेकोशी में आई विनाशकारी बाढ़ में अब तक १,२९० लोगों के शव बरामद किए जा चुके हैं । नेपाल प्रहरी द्वारा पूर्व में जारी आँकड़ों के अनुसार मृतकों की संख्या लगातार बढ़ रही है । इसके साथ ही बड़ी संख्या में लोग अब भी लापता हैं ।
बरामद किए गए १,२९० शवों में से ४२७ पुरुष, २५० महिलाएँ, ३४ बालक और ४५ बालिकाएँ शामिल हैं । इसी प्रकार ५३२ मामलों में मानव शरीर के केवल आंशिक अंग ही बरामद हो सके हैं । दो व्यक्तियों की अस्पताल में इलाज के दौरान मृत्यु हो गई ।

प्रहरी के अनुसार बरामद शवों में से ९२६ का अंतिम संस्कार या व्यवस्थापन किया जा चुका है । इस आपदा में अब तक ४,७९८ लोग लापता बताए गए हैं । लापता लोगों में २,८४७ स्वदेशी और ६०१ विदेशी नागरिक शामिल हैं, जबकि १,३५० लोगों के संबंध में फोन के माध्यम से जानकारी प्राप्त हुई है । दूसरी ओर, सुरक्षा बलों की सक्रियता के चलते अब तक ८,१२७ लोगों का सफलतापूर्वक उद्धार किया जा चुका है । बचाए गए लोगों में ६,०९० पुरुष और २,४७२ महिलाएँ हैं । अब तक १,१४१ मृतकों की पहचान नहीं हो पाई है ।

इसी तरह न जाने कितने घर उजड़ चुके हैं, हजारों लोग बेघर हो गए हैं और अनगिनत परिवार अपने प्रियजनों को खो चुके हैं । इस समय नेपाल में चारों ओर भय, असुरक्षा और अनिश्चितता का माहौल है । लोगों की आँखों में निरंतर आँसू हैं, अपने प्रियजनों के खोने की पीड़ा है । रहने को घर नहीं है , पहनने को वस्त्र नहीं हैं, न ही भोजन की कोई व्यवस्था है । ऐसे समय में काम से ज्यादा दिखावा किया जा रहा है । यह आरोप सरकार पर जनता द्वारा बार– बार लगाया जा रहा है कि सरकार काम कम कर रही है और दिखावा ज्यादा । खासकर इस मामले में गृहमंत्री का नाम खुलकर लिया जा रहा है ।
ऐसा नहीं है कि सरकार इस मामले में चुपचाप हाथ पर हाथ धरे बैठी है, लेकिन जनता के अनुरुप कहें या पीडि़तों के अनुरुप सरकार काम नहीं कर पा रही है । जब देश संकट में होता है, जनता कठिन परिस्थिति से गुजर रही होती है तो ऐसे कठिन समय में जनता की निगाहें हमेशा सरकार पर टिकी होती हैं, विशेष रूप से अपने अभिभावक प्रधानमंत्री और गृहमंत्री पर, जिनके कंधों पर आंतरिक सुरक्षा और आपदा प्रबंधन की सबसे बड़ी जिम्मेदारी होती है ।
भाद्र १० गते रसुवा में आई विनाशकारी बाढ़ ने न सिर्फ जनजीवन को, बल्कि राजनीतिक बहस को भी तेज कर दिया है । प्रत्येक दिन आम नागरिक इस बात का इंतजार करता है कि आज सरकार ने कौन –कौन से निर्णय लिए हंै । वह पीडि़तों के लिए क्या नीति बना रही है । जो बच्चें अनाथ हो गए हैं, उनकी शिक्षा– दीक्षा को लेकर सरकार ने क्या निर्णय लिए हैं रु पुनर्वास को लेकर क्या कह रही है सरकार रु इन प्रश्नों के जवाब में जनता बैठी है ।
ऐसे समय में जनता अपने प्रधानमंत्री तथा गृहमंत्री से बहुत सी अपेक्षाएं रखती है । वह अपेक्षा इस बात की करती है कि उसका अभिभावक सही मायने में काम करें । राजनीति अपनी जगह पर है, लेकिन फिलहाल आप जनता के बीच में जाएं, उनकी पीड़ाएं सुनें ,उनकी आँखों से बहते आँसूं पोंछें, और उन्हें सांत्वना दें । उन्हें यह जताए कि आप इस कठिन समय में, उनके साथ खड़े हैं ।
यह सच है कि प्रकृति द्वारा आई आपदा से आप बहुत ज्यादा लड़ नहीं सकते, क्योंकि वह कहकर नहीं आती । यह आपको संभलने का समय नहीं देती । लेकिन कुछ तैयारियां पहले से की जा सकती हंै । दुर्भाग्यवश ऐसा होता नहीं है । इस वक्त जनता सरकार के स्टंट को नहीं देखना चाहती है वह राहत चाहती है । फंसे हुए लोगों का उद्धार चाहती है । आज दस दिन के बाद भी लोगों की आँखों में इंतजार है अपने परिजनों के वापस लौटने का ।
इस विषम परिस्थिति में गृहमंत्री को लेकर कई सवाल उठाए जा रहे हैं । यह सवाल प्रमुखता से उठया जा रहा है कि सुदन गुरुङ का राहत कार्यों में सक्रिय दिखना क्या वास्तव में जिम्मेदारी है या फिर उनका “स्टंट” । वैसे हमारे गृहमंत्री को लेकर यह सवाल पहली बार नहीं उठा है । जब जब देश में कोई संकट का समय आया है गृहमंत्री स्वयं स्थिति से लड़ने के लिए निकल पड़ते हैं । ऐसा लगता है जैसे वे अकेले ही सब कुछ कर लेंगे ।
भाद्र १० गते को आई बाढ़ कोई सामान्य आपदा नहीं थी । नेपाल को भारी क्षति का सामना करना पड़ा है । बहुत बड़े पैमाने पर भौतिक संरचनाएँ नष्ट हुई हैं । ऐसी अवस्था में सरकार के हर कदम पर जनता की नजर होना स्वाभाविक है ।
गृहमंत्री गुरुंग बार–बार एक ही बात को दोहराते हंै कि वे पूरी रात सो नहीं पाए हैं, वे लगातार काम कर रहे हैं । वैसे गृहमंत्री को नींद आनी भी नहीं चाहिए क्योंकि आप कोई सामान्य व्यक्ति नहीं हैं । देश और जनता की जिम्मेदारी है आप पर । लेकिन हाँ स्टंट नहीं करें । जनता का दिल स्टंट से नहीं अपने काम, अपने व्यवहार से जीतें ।
आपका बार बार यह कहना कि हम रातभर काम कर रहे हैं । यह कहना पर्याप्त नहीं है । उसका परिणाम भी आना चाहिए । अगर परिणाम संतोषजनक नहीं होंगे तो आपके जागने का कोई अर्थ नहीं रह जाएगा । आपके इन वाक्यों से क्या समाधान हो जाएगा रु तो स्पष्ट है की नहीं १ नहीं होगा । इसलिए बार –बार कहा जा रहा है कि यह समय दिखावे या औपचारिकताओं का नहीं, बल्कि ठोस और प्रभावी निर्णयों और परिणामों का है । आप राजनीति करने आए हैं, राजनीति एक तरीके से करें । देश के इस आपदा काल में आपका मीडिया में बार–बार आना, कुछ बचाव के दृश्यों को दिखाकर वाहवाही लूटना आपके किए कराए काम पर भी पानी फेर देगा ।
आज के इस विषम समय में यह समझना आवश्यक है कि गृहमंत्री का संवैधानिक और प्रशासनिक दायित्व आखिर क्या है रु तो गृहमंत्री का काम है–नीति बनाना, समन्वय स्थापित करना, सुरक्षा निकायों को निर्देश देना और राहत कार्यों को प्रभावी बनाना । सरकार ने राहत और बचाव के लिए हेलीकॉप्टर और सुरक्षा बलों–को तैनात किया है । सरकार से जितना बन सका है वह कर रही है लेकिन गृहमंत्री स्वयं को हीरों बनाने के फिराक में दिख रहे हैं । देश में जब कुछ संकट आए हैं गृहमंत्री खुद घटनास्थल पर पहुँच जाते हैं । ऐसा भी हो सकता है कि उनके जाने से ही काम पर प्रभाव पड़ जाएं । काम ढ़ंग से नहीं हो पाए । लोग उन्हें ही प्राथमिकता में रखें और असली काम से लोग हट जाएं ।
इस बार भी वही हुआ वे राहत कार्यों में व्यस्त दिखाई दिए । यहाँ तक कि उनका कुछ वीडियों बहुत तेजी से वाइरल हुआ । कई जगह वें किसी को बचाते हुए कैमरे पर दिखाए गए । तो ऐसे में एक बहस शुरु हो जाती है कि क्या वे काम करने गए हैं या कैमरे के सामने सक्रियता दिखाने । उनके प्रशंसको के लिए यह बहुत बड़ी बात है कि हमारे गृहमंत्री हर क्षण तैयार रहते हैं लेकिन आलोचकों का कहना है कि – यह सिनेमा नहीं है जहाँ ‘नायक’ सिनेमा में अनील कपूर हर काम स्वयं करते हैं । यह मानव जीवन है जहाँ हर काम आप अकेले नहीं कर सकते । आपको सभी का सहयोग चाहिए ही चाहिए ।
बाढ़ जैसी आपदा में हर क्षण बेहद कीमती होता है । राहत और बचाव कार्यों के लिए एक स्पष्ट और ठोस रणनीति होनी चाहिए, जिसमें सेना, पुलिस, स्थानीय प्रशासन और स्वयंसेवी संगठनों के बीच समन्वय स्थापित किया जाए । आप गृहमंत्री हैं आपको इस समन्वय का नेतृत्व करना चाहिए, न कि केवल इसकी निगरानी । आपकी निगरानी आवश्यक है । कहाँ, कब, कैसे और क्या करना चाहिए इस ओर आपका ध्यान ज्यादा जाना चाहिए ।
प्राकृतिक आपदाओं के बाद शवों का सम्मानजनक व्यवस्थापन अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाता है । किसी भी प्राकृतिक आपदा के बाद अक्सर बड़ी संख्या में शव बरामद किए जाते हैं, जिनका समय पर, गरिमापूर्ण तरीके से अंतिम संस्कार होनी चाहिए । यह केवल प्रशासनिक जिम्मेदारी ही नहीं है, वरन मानवीय संवेदना का भी प्रश्न है । इसके लिए स्पष्ट दिशा–निर्देश, संसाधनों की उपलब्धता और प्रशिक्षित टीमों को तैनात करना आवश्यक है । ऐसे समय में गृहमंत्री का काम निरिक्षण करना है । न की टीमों के साथ स्वयं घुमने का है ।
इसी तरह बाढ़ प्रभावित जगहों पर राहत पहुँचाना सरकार की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है । केवल राहत सामग्री भेजना पर्याप्त नहीं है, बल्कि यह सुनिश्चित करना भी जरूरी है कि वह सही लोगों तक, सही समय पर और पारदर्शिता के साथ पहुँचे । मीडिया में यह बात खुलकर आ रही है कि कई ऐसे प्रभावित जिलें हैं जहाँ पीडि़तों को राहत का सामान नहीं मिला है । उनकी पीड़ा को सुनकर मन विचलित हो जाता है जब कोई कहता है कि आज इतने दिन हो गए हैं और हम अभी भी भूखे हैं । एक महिला का वीडियों दिखाया गया जहाँ वो कपड़े को लेकर कह रही थी कि कपड़े नहीं है । ऐसा नहीं है कि सरकार के काम की प्रशंसा नहीं हो रही है । बहुत से लोग हैं जो सरकार के काम की तारीफ करते हुए कह रहे हैं कि सरकार तो राहत भेज रही है लेकिन राहत असल पीडि़त तक नहीं पहुँच रही है । यहाँ आवश्यकता है निगरानी की, न की स्टंट की । गृहमंत्री को काम करना है तो यहाँ पहुँचे और तहकीकात करें कि सही मायने में राहत पीडि़तों तक पहुँच रहा है या नहीं ।
इन सबके साथ ही बचाव कार्यों में तेजी और दक्षता लाना अत्यंत आवश्यक है । भले ही समय बीतने के साथ जीवित लोगों के मिलने की संभावनाएं कम हो जाती है, लेकिन हर संभव प्रयास किया जाना चाहिए । यह केवल जीवन बचाने का प्रयास नहीं, बल्कि पीडि़त परिवारों को एक मानसिक संबल देने का भी माध्यम है कि सरकार ने अपनी ओर से कोई कमी नहीं छोड़ी ।
गृहमंत्री को लेकर क्यों आलोचना हो रही है रु
गृहमंत्री का घटनास्थल पर जाना, कार्यो का निरीक्षण करना और स्थिति का जायजा लेना निश्चित रूप से आवश्यक है । लेकिन यह केवल तब जब शुरुआती दौर हो क्योंकि वहाँ बैठकर अगर आप उसमें लग जाएंगे तो नियम नीति कौन बनाएगा रु इस विनाशकारी बाढ़ से उबरने के लिए, इससे लड़ने के लिए जनता को सबल बनाने के लिए उन्हें नीति–निर्माण की ओर लगना चाहिए । उन्हें संसाधन जुटाने में लगना चाहिए । उन्हें ठोस कदम उठाने चाहिए ।
इसके अतिरिक्त, दीर्घकालिक दृष्टिकोण भी उतना ही जरूरी है । हर वर्ष बाढ़ आती है, हर वर्ष नुकसान होता है, और हर वर्ष वही प्रतिक्रियात्मक कदम उठाए जाते हैं । यह सिर्फ इस सरकार की नहीं वरन हर सरकार की यही हालत होती है जब जब प्राकृतिक आपदाएं आती है । इसके लिए पहले से ही कुछ तैयारियां की जा सकती है लेकिन इस ओर सरकार का ध्यान कभी गया ही नहीं है । इसलिए अब समय आ गया है कि स्थायी समाधान की दिशा में काम किया जाए ।
गृहमंत्री या किसी और नेता का मैदान में उतरकर काम करना गलत नहीं है लेकिन यह समझना होगा कि आपदा के समय में ही नेतृत्व की असली परीक्षा होती है । बयान देना आसान है, लेकिन जमीनी स्तर पर बदलाव लाना कठिन । गृहमंत्री को इस कठिनाई को स्वीकार करते हुए, साहसिक और संवेदनशील निर्णय लेने होंगे । देश को इस समय आश्वासन नहीं, कारवाई चाहिए–ऐसी कारवाई जो पीडि़तों के दर्द को कम कर सके और भविष्य में ऐसी त्रासदियों से बचाव का रास्ता दिखा सके ।
आपदा के समय अगर आप जमीन पर उतरते हैं तो उसका उद्देश्य होना चाहिए–
व्यवस्था सुधारना, राहत तेज करना और लोगों को बचाना,लोगों में यह विश्वास दिलाना कि हाँ हम आपके इस गम में आपके साथ हैं । न कि सिर्फ स्टंट करना । आपका काम निरिक्षण करना है सुरंग में घुसकर बचाव करना नहीं । आप राजनीति करने आए हैं स्टंट करने नहीं ।चाणक्य नीति कहती है “मंत्री का मूल्य उसके काम से तय होता है, न कि उसके प्रदर्शन से ।”
आप अपनी स्वेच्छा से सत्ता के शीर्ष पर बैठे हैं तो जागना तो पड़ेगा । जनता की जिम्मेदारी है आप पर । इस जिम्मेदारी से आप भाग नहीं सकते । आप अच्छा काम करेंगे तो जनता को दिखाना ही नहीं पड़ेगा । वो स्वयं आपकी प्रशंसा में लग जाएंगे । इसलिए काम करें स्टंट नहीं ।

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