महात्मा गांधी और मॉरीशस: मेरी यादगार ऐतिहासिक और सांस्कृतिक यात्रा : डॉ. रीना यादव
डॉ. रीना यादव, काठमांडू, २ऑक्टोबर।बहिंद महासागर की गोद में बसा मॉरीशस एक ऐसा सुंदर टापू है, जो चारों तरफ से नीले समंदर की उत्ताल तरंगों से घिरा हुआ है। यहाँ प्राकृतिक सुंदरता अपनी पराकाष्ठा पर है—सड़कों के किनारे तक लहलहाते गन्ने के खेत और दूसरी ओर आधुनिक विकास का बेहतरीन संतुलन इसे एक अद्भुत रूप देता है। यह केवल एक प्राकृतिक पर्यटन स्थल नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति, संघर्ष और स्वाभिमान का एक जीवंत प्रतीक है। जब कोई पर्यटक पहली बार इस देश की धरती पर कदम रखता है, तो उसे यह अहसास ही नहीं होता कि वह अपने वतन से दूर है। मॉरीशस की हवाओं में और यहाँ के जन-जन के हृदयों में बापू की स्पंदन साफ़ महसूस होती है। लेकिन इस भावनात्मक संबंध की सबसे मजबूत नींव जिस युगपुरुष ने रखी थी, वे थे हमारे राष्ट्रपिता—महात्मा गांधी।
इस द्वीप देश के कण-कण में बापू की चेतना आज भी रचती-बसती है। मॉरीशस की रूह में बापू किस तरह बसे हैं, यह समझना किसी पवित्र यात्रा से कम नहीं है।
*1. 1901 की वह ऐतिहासिक यात्रा:* एक नए युग का बीजारोपण
गांधी जी और मॉरीशस का नाता महज एक औपचारिक संबंध नहीं है, बल्कि यह एक ऐतिहासिक क्रांति की कहानी है। वर्ष 1901 में दक्षिण अफ्रीका से भारत लौटते समय बापू का ‘एस.एस. नौशेरा’ (S.S. Nowshera) जहाज मॉरीशस के तट पर रुका। 29 अक्टूबर से 15 नवंबर 1901 तक का वह लगभग 18 दिनों का प्रवास मॉरीशस के इतिहास में हमेशा के लिए स्वर्ण अक्षरों में दर्ज हो गया।
उस समय मॉरीशस में लाखों भारतीय ‘गिरमिटिया मजदूर’ के रूप में गन्ने के खेतों में हाड़-तोड़ मेहनत कर रहे थे। वे शोषित थे, उनके पास न अधिकार थे और न ही अपनी आवाज़ उठाने का कोई जरिया। बापू ने उनके दुख-दर्द को देखा और उन्हें दो ऐसे महामंत्र दिए जिसने उनकी आने वाली पीढ़ियों की तकदीर बदल दी:
शिक्षा को अपना शस्त्र बनाओ: बापू ने कहा कि यदि गरीबी और गुलामी की बेड़ियों को काटना है, तो अपने बच्चों को शिक्षित करना ही होगा।
*सार्वजनिक जीवन में भागीदारी:* उन्होंने भारतीय समाज को संगठित होकर देश की राजनीति और अधिकारों के संघर्ष में उतरने की प्रेरणा दी।
बापू के इस संदेश ने मॉरीशस के गिरमिटिया समाज में सोए हुए स्वाभिमान को जगा दिया। उनके कहने पर ही बाद में बैरिस्टर मणिलाल डॉक्टर मॉरीशस पहुँचे और भारतीयों को उनके कानूनी व नागरिक अधिकार दिलाए।
*2. ‘महात्मा गांधी संस्थान’ (MGI):* बापू के विचारों का जीवंत केंद्र
जब आप मॉरीशस की राजधानी पोर्ट लुई से गुजरते हुए मोका (Moka) क्षेत्र में पहुँचते हैं, तो वहाँ स्थित ‘महात्मा गांधी संस्थान’ (Mahatma Gandhi Institute – MGI) बापू के प्रति इस देश के अगाध प्रेम और सम्मान की गवाही देता है।
1970 में भारत की तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी और मॉरीशस के राष्ट्रपिता सर शिवसागर रामगुलाम द्वारा स्थापित यह संस्थान केवल एक इमारत या स्मारक नहीं है, बल्कि यह बापू के सपनों का एक विशाल विश्वविद्यालय है:
भारतीय भाषाओं और मूल्यों का रक्षक: यहाँ हिंदी, तमिल, तेलुगु, मराठी, उर्दू और भोजपुरी जैसी भारतीय भाषाओं का पठन-पाठन और शोध कार्य होता है। बापू जिस मातृभाषा और सांस्कृतिक जड़ों से जुड़ाव की बात करते थे, MGI उसे रोज़ जीता है।
*पूर्वजों की स्मृति (Immigration Archives):* इसी संस्थान के अभिलेखागार में भारत से गए लाखों प्रवासियों के मूल दस्तावेज़ सुरक्षित रखे गए हैं। यह हर मॉरीशस वासी के लिए अपनी जड़ों से जुड़ने का पवित्र स्थान है।
*कला और सादगी का संगम:* यहाँ भारतीय संगीत, नृत्य, चित्रकला और गांधीवादी दर्शन की शिक्षा दी जाती है, जो बापू की ‘सर्वोदय’ और ‘आत्मनिर्भरता’ की सोच को साकार करती है।
3. मॉरीशस के जन-जीवन और नीति में बापू की उपस्थिति
मॉरीशस में बापू सिर्फ इतिहास की किताबों में नहीं हैं, वे यहाँ के समाज और राजनीति की रूह में बसे हैं:
*सत्य और अहिंसा का मार्ग* : मॉरीशस ने जिस तरह शांतिपूर्ण और लोकतांत्रिक ढंग से अपनी स्वतंत्रता हासिल की, उसमें बापू के अहिंसक आंदोलन की स्पष्ट छाप दिखाई देती है।
*संस्कृति का संरक्षण* : बापू ने सिखाया था कि अपनी संस्कृति को भूलकर कोई भी समाज महान नहीं बन सकता। आज मॉरीशस में रामायण की चौपाइयां गूंजती हैं, छठ और शिवरात्रि जैसे त्यौहार राष्ट्रीय पर्व की तरह मनाए जाते हैं—यह बापू के दिए सांस्कृतिक स्वाभिमान का ही परिणाम है।
*अंतर्राष्ट्रीय सम्मान:* मॉरीशस सरकार हर साल 2 अक्टूबर को ‘अंतर्राष्ट्रीय अहिंसा दिवस’ और बापू की जयंती बड़े ही गौरव और आदर के साथ मनाती है।
*निष्कर्ष:* युगों-युगों तक अमर एक अटूट चेतना
मॉरीशस की नीली समंदरी सीमाओं से टकराकर लौटती लहरें आज भी 1901 के उस ऐतिहासिक प्रवास की गाथा गाती प्रतीत होती हैं। महात्मा गांधी ने गन्ने के खेतों की पगडंडियों पर पसीना बहाते जिन शोषित गिरमिटिया प्रवासियों के हाथों में शिक्षा और स्वाभिमान का चिराग थमाया था, उसी की रोशनी में आज का समृद्ध, आधुनिक और स्वाभिमानी मॉरीशस जगमगा रहा है। यह यात्रा केवल दो देशों के बीच की दूरी तय करने का सफर नहीं है, बल्कि यह समय और सीमाओं से परे ‘सत्य, अहिंसा और मानवीय गरिमा’ की एक अटूट चेतना यात्रा है।
जब तक मॉरीशस के तटों पर समंदर की लहरें टकराएंगी और जब तक वहाँ की फिज़ाओं में रामायण व भोजपुरी की मिठास घुलेगी, तब तक बापू का विचार मॉरीशस के हृदय की धड़कन बनकर हमेशा जीवित रहेगा। मेरे लिए यह एक ऐसी अमिट और यादगार यात्रा रही है, जिसकी पावन स्मृतियाँ मेरे मानस पटल से कभी मिट नहीं सकतीं। आज 2 अक्टूबर (गांधी जयंती) के इस पावन अवसर पर, सत्य और अहिंसा के बल पर पूरे विश्व को करुणा, समानता और स्वाभिमान का मार्ग दिखाने वाले _पूज्य बापू के चरणों में यह लेख प्रस्तुत करते हुए, मैं अपने भावभीनी श्रद्धा-सुमन अर्पित करती हूँ और उन्हें शत-शत नमन करती हूँ।_ बापू के विचार आज भी पूरी मानवता के लिए एक अमर प्रेरणापुंज हैं।


