कोप-31 से पहले नेपाल की तैयारी तेज, जलवायु न्याय और वित्त पर रहेगा जोर
काठमांडू, 22 अक्टूबर।
संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन सम्मेलन (कोप-31) नजदीक आने के साथ ही नेपाल ने अपनी आंतरिक तैयारियां तेज कर दी हैं। कृषि, वन तथा पर्यावरण मंत्रालय ने राष्ट्रीय स्थिति-पत्र को अंतिम रूप देने और संबंधित पक्षों के साथ विचार-विमर्श की प्रक्रिया आगे बढ़ाने की जानकारी दी है।
आगामी 9 से 20 नवंबर तक तुर्की के अंताल्या में होने वाले सम्मेलन में नेपाल जलवायु न्याय और जलवायु वित्त तक आसान पहुंच के मुद्दे को प्रभावी ढंग से उठाने की तैयारी कर रहा है। मंत्रालय के जलवायु प्रबंधन महाशाखा के प्रमुख एवं सहसचिव डॉ. महेश्वर ढकाल के अनुसार, इन विषयों पर नेपाल की कूटनीतिक पहल को मजबूत बनाने के लिए चर्चा चल रही है।
उन्होंने बताया कि दशैं की छुट्टियों के दौरान भी राष्ट्रीय स्थिति-पत्र का मसौदा तैयार करने और संबंधित पक्षों से सुझाव जुटाने का काम जारी रहा। नेपाल अगले सप्ताह अपना स्थिति-पत्र सार्वजनिक करने की तैयारी कर रहा है। अंतरराष्ट्रीय जलवायु वित्त तक सहज पहुंच सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक प्रक्रियाओं पर भी विभिन्न निकायों से सुझाव प्राप्त हो रहे हैं।
मजबूत राजनीतिक प्रतिनिधित्व की जरूरत
सहसचिव ढकाल ने कहा कि कोप-31 में नेपाल की प्राथमिकताओं को प्रभावी रूप से प्रस्तुत करने के लिए उच्चस्तरीय राजनीतिक प्रतिनिधित्व आवश्यक है। सम्मेलन के पहले सप्ताह में तकनीकी और विषयगत वार्ताएं होती हैं, जबकि दूसरे सप्ताह में मंत्रिस्तरीय बैठकों के माध्यम से तकनीकी टीमों द्वारा तैयार दस्तावेजों को अनुमोदित करने की प्रक्रिया आगे बढ़ती है।
जलवायु वित्त, अनुकूलन और अन्य महत्वपूर्ण विषयों पर होने वाली इन बैठकों में नेपाल के राजनीतिक नेतृत्व की भागीदारी उसकी आवाज को अधिक प्रभावी बना सकती है। उनके अनुसार, तकनीकी विशेषज्ञों की भूमिका महत्वपूर्ण है, लेकिन राजनीतिक स्तर पर मुद्दे उठाए जाने से उन पर व्यापक ध्यान आकर्षित होता है।
उन्होंने कहा कि सम्मेलन में संघीय, प्रांतीय और स्थानीय सरकारों के साथ-साथ संघीय संसद के प्रतिनिधियों की भागीदारी को लेकर भी स्पष्ट योजना जरूरी है। सीमित संसाधनों और सम्मेलन में शामिल होने के इच्छुक प्रतिनिधियों की बड़ी संख्या के कारण प्रतिनिधित्व का प्रबंधन चुनौतीपूर्ण बना हुआ है।
ढकाल ने यह भी कहा कि भोटेकोशी क्षेत्र में हाल में आई आपदा के बाद नेपाल के जलवायु संबंधी जोखिमों और प्राथमिकताओं पर अंतरराष्ट्रीय समुदाय का ध्यान बढ़ा है। नेपाल इस अवसर का उपयोग सम्मेलन में अपनी चिंताओं को प्रभावी ढंग से प्रस्तुत करने के लिए करना चाहता है।
पर्वतीय मुद्दों और जलवायु वित्त को प्राथमिकता देने का सुझाव
राष्ट्रीय प्रकृति संरक्षण कोष के जलवायु परिवर्तन विभाग के प्रमुख निदेशक डॉ. मनीषराज पांडे ने सुझाव दिया कि नेपाल को सम्मेलन में पर्वतीय क्षेत्रों से जुड़े मुद्दों, जलवायु परिवर्तन से होने वाली क्षति एवं नुकसान और अनुकूलन के लिए वित्तीय सहायता को प्राथमिकता देनी चाहिए।
उन्होंने कहा कि पर्वतीय क्षेत्रों के विशिष्ट जलवायु जोखिमों को अनुकूलन और जलवायु वित्त संबंधी निर्णयों में स्पष्ट रूप से शामिल किया जाना चाहिए। हिमनद झीलों की निगरानी, हिमालयी क्षेत्रों में उत्पन्न आपदाओं से प्रभावित निचले तटीय समुदायों की सुरक्षा तथा जोखिम न्यूनीकरण जैसे विषयों को अंतरराष्ट्रीय जलवायु वार्ताओं में प्रमुखता मिलनी चाहिए।
डॉ. पांडे के अनुसार, जलवायु परिवर्तन से प्रभावित समुदायों के लिए पर्याप्त वित्तीय संसाधन जुटाना, सहायता शीघ्र पहुंचाना और आर्थिक नुकसान के साथ-साथ सामाजिक, सांस्कृतिक तथा अन्य गैर-आर्थिक क्षति को भी मान्यता देना आवश्यक है। उन्होंने जोर दिया कि ऐसी सहायता ऋण के बजाय अनुदान के रूप में उपलब्ध कराई जानी चाहिए।
उन्होंने अनुकूलन कोष से प्राप्त धन के प्रभावी उपयोग के लिए स्थानीय निकायों और समुदायों को सक्षम बनाने तथा कम विकसित और पर्वतीय देशों के लिए जलवायु वित्त प्राप्त करने की प्रक्रियाओं को सरल, त्वरित और जरूरतों के अनुरूप बनाने की आवश्यकता भी बताई।
जलवायु क्षेत्र में निवेश बढ़ाने का दबाव बनाना जरूरी
जलवायु विशेषज्ञ राजु पंडित क्षेत्री ने कहा कि वैश्विक निवेश का बड़ा हिस्सा युद्ध और व्यापार की ओर केंद्रित होने के कारण जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को कम करने तथा उनके अनुरूप ढलने के लिए आवश्यक निवेश नहीं हो पा रहा है। उनके अनुसार, आगामी सम्मेलन में नेपाल को विकसित देशों पर जलवायु क्षेत्र में निवेश बढ़ाने के लिए दबाव बनाना चाहिए।
क्षेत्री ने कहा कि जलवायु परिवर्तन के कारण हिमालयी क्षेत्रों में तापमान बढ़ रहा है, लेकिन इसके प्रभावों को कम करने के लिए अंतरराष्ट्रीय समन्वय पर्याप्त नहीं है। जलवायु संबंधी घटनाओं का स्वरूप बदल रहा है, फिर भी अंतरराष्ट्रीय समुदाय की जवाबदेही अपेक्षित स्तर तक नहीं पहुंची है।
उन्होंने सुझाव दिया कि नेपाल को भोटेकोशी बाढ़ सहित हाल की जलवायुजनित आपदाओं से हुए नुकसान का स्पष्ट विवरण अंतरराष्ट्रीय समुदाय के सामने रखना चाहिए और प्रभावित क्षेत्रों के लिए वित्तीय तथा तकनीकी सहायता उपलब्ध कराने की मांग करनी चाहिए।
उन्होंने यह भी कहा कि नेपाल को जलवायु जोखिम कम करने के साथ-साथ आपदाओं से हुई क्षति का आकलन, अभिलेखीकरण और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मुआवजे या सहायता की मांग प्रस्तुत करने की व्यवस्था अधिक प्रभावी बनानी होगी।
जलवायु जोखिमों को अंतरराष्ट्रीय मंच पर उठाने का अवसर
जलवायु विशेषज्ञ मञ्जित ढकाल ने कहा कि कोप-31 में भागीदारी को भोटेकोशी बाढ़ और नेपाल के अन्य जलवायु संबंधी जोखिमों को अंतरराष्ट्रीय मंच पर उठाने के महत्वपूर्ण अवसर के रूप में देखा जाना चाहिए।
उनके अनुसार, नेपाल को अंतरराष्ट्रीय समुदाय से मिल रहे सहयोग, सद्भावना और सकारात्मक दृष्टिकोण को बनाए रखते हुए विभिन्न पक्षों के साथ मिलकर आपदा के बाद पुनर्वास और पुनर्निर्माण की दिशा में आगे बढ़ना चाहिए।
उन्होंने कहा कि नेपाल को स्वयं भी कार्बन उत्सर्जन घटाने की प्रतिबद्धताओं को लागू करना होगा और विकसित देशों पर उत्सर्जन कम करने तथा जलवायु वित्त उपलब्ध कराने के लिए दबाव बनाना होगा।
ढकाल के मुताबिक, जलवायु परिवर्तन अब केवल पर्यावरण का विषय नहीं रह गया है। यह हिमालयी क्षेत्र की अर्थव्यवस्था, बुनियादी ढांचे, आजीविका और विकास से सीधे जुड़ गया है। इसलिए नेपाल को वैज्ञानिक प्रमाणों, कूटनीतिक पहलों और अंतरराष्ट्रीय सहयोग के समन्वय के साथ अपनी बात रखनी चाहिए।
कोप-31 के लिए नेपाल की तैयारियों का मुख्य उद्देश्य पर्वतीय क्षेत्रों के जोखिम, जलवायु अनुकूलन की जरूरतों और जलवायुजनित क्षति की भरपाई के मुद्दों को अंतरराष्ट्रीय वार्ता में प्रभावी ढंग से उठाना है।


