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उलझनों का देश – नेपाल

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देवेश झा :नये वर्ष २०१६ का आगमन हो चुका है । लेकिन आन्दोलित नेपाल अन्य वर्षों की तरह इस बार उत्साहपूर्वक स्वागत नहीं कर सकाnepal । काठमाण्डू में बिजली की न्यून आपूर्ति और खाना पकाने वाले गैस एवं पेट्रोल के अभाव ने नववर्ष को फीका बना दिया । संविधान जारी किये जाने के साथ मधेस में उठा तूफान थमने का नाम नहीं ले रहा है । प्रधानमन्त्री की क्षण–क्षण में बदलती टिप्पणियाँ परिस्थिति को दिनानुदिन और जटिल बनाए जा रही है । इस बीच बिराटनगर के जोगबनी नाका में अवरोध खड़ा करने के लिये धर्ना देने बैठे सद्भावना पार्टी के अध्यक्ष राजेन्द्र महतो पर नेपाल पुलिस ने डंडे का सीधा वार करके उनका सिर फोड़ दिया । पिछले चार महीने से अधिक दिनों तक के मधेस आन्दोलन के दौरान नेपाली पुलिस की बर्बरता द्वारा अभी तक घायल होने वाले लोगों में से सबसे अधिक प्रभावशाली व्यक्ति के साथ हुई दमनकारी घटना थी । सामाजिक संजाल में उक्त बर्बरता का विडियो प्रायः बहुतों ने देखा होगा । स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है कि निहत्थे और सड़क पर गिरे हुए नेता महतो जी पर पुलिसिया डंडा कैसे बरसाया गया । सिर पर गम्भीर चोट के कारण महतो जी आई सी यू में भर्ती किये गये और अभी तक वे उपचाररत हैं ।
इस बार के मधेस आन्दोलन के प्रति सरकारी रवैये का यह एक उदाहरण मात्र है । कुछ दिनों पहले एशियन ह्युमन राइट्स के चेयरमैन ब्रैड एडम्स ने मधेस आन्दोलन के वारे में अपना प्रतिवेदन सार्वजनिक करते हुए तथ्यों के आधार पर स्पष्ट विश्लेषण करते हुए कहा था कि कम से कम नौ घटनाओं में नेपाल पुलिस ने प्रत्यक्षतः मानव अधिकार का हनन किया है । जिसमें उन्होंने पुलिस द्वारा स्कूल से पढ़कर वापस घर लौटते बच्चे को देखकर गोली मारने से लेकर जान बचाने के लिये झाडि़यों में छुपी हुई नाबालिग लड़की को पकड़कर सिर के ठीक बीचोबीच गोली मारे जाने का जिक्र किया है । सरकारी के मुताविक आन्दोलन के शुरुआती दिनों में कैलाली में हुई कुछ पुलिसवालों की निर्मम हत्या के कारण ये घटनाएँ घबराहट में पुलिस द्वारा होने का दावा किया गया है । अगर इस दलील को मान भी लिया जाय तो कैलाली घटना के दोषियों को अगर कटघरे में खड़ा किया जाता है तो फिर बर्बरता दिखाने वाले पुलिसकर्मियों पर कार्यवाही क्यों नही होती ? कारण स्पष्ट है कि पुलिस प्रशासन के द्वारा किया जा रहा दमनकारी व्यवहार के पीछे सरकार की नियोजित साजिश है । सरकार दमन करके इस आन्दोलन को समाप्त करना चाहती है ।
पाँचवा महीना पूरा करता हुआ यह मधेस आन्दोलन सरकार और आन्दोलनकारी दल दोनों की समझ से परे होता जा रहा है । मुख्यतः मधेस दो ध्रुवों में बँटता जा रहा है । पहले वो दल हैं जो आज भी संवैधानिक दायरे में रहते हुए नेपाल सरकार से ही वर्तमान संविधान का संशोधन किये जाने की आशा रखते हैं । दूसरे वो जो किसी कालखण्ड में भारत पर ब्रिटिश शासन के समय मधेसी भूभाग तत्कालीन नेपाल सरकार को दिये जाने की वकालत करते हैं । पहली विचारधारा से ताल्लुक रखने वाले दलों में अधिकांश की वर्तमान संसद में उपस्थिति भी है । इसलिये यदा कदा उन दलों पर सत्ता के लिये मधेस आन्दोलन कराने का आरोप भी लगता रहा है । लोग इन दल के नेताओं पर सशंकित भी रहे हैं । खास तौर पर आन्दोलन के उत्कर्ष पर रहते हुए अचानक प्रधानमन्त्री के निर्वाचन प्रक्रिया में इन दलों का शामिल होना मधेसी समुदाय द्वारा आलोचित रहा है । संयुक्त लोकतान्त्रिक मधेसी मोर्चा द्वारा आन्दोलन के शुरुआती दो महीनों तक अपनी माँग को व्योरेबार रखने में असमर्थ होना भी उनकी कमजोरी ही थी । मधेसी जनता की उत्कट आकांक्षा और मधेस के शुभचिन्तकों की बारम्बार सलाह के बावजूद मोर्चा के नेतागणों ने मधेस के दूसरे दलों के साथ अछूतों जैसा बर्ताव रखा जो आज भी लगभग जारी ही है । उनके इन्हीं तौर तरीकों का परिणाम ये हुआ कि मधेस में आन्दोलन कर रहे कुछ दूसरे दलों ने मिलकर अलग गठबन्धन बना लिया है । सरकार को कहने में आसान हो गया कि मधेस स्वयं ही वैचारिक रूप से विभाजित है ।
इस बीच मित्र राष्ट्रों विशेषतः भारत की सलाह पर नेपाल के तीन बड़े दल संविधान में संशोधन के लिये राजी हुए और उसी अनुरूप संसद में संशोधन प्रस्ताव प्रस्तुत भी किया जा चुका है । परन्तु मधेसी जनमत के दृष्टिकोण से वह संशोधन अधूरा है । वर्तमान संविधान में वैसे तो अनेकों त्रुटियाँ है, परन्तु मुख्य रूप से चार विषयों को अत्यन्त गम्भीर माना जा रहा है । (१) सीमांकन (२) प्रतिनिधित्व (३) समानुपातिक÷समावेशिता (४) नागरिकता ।
(१) सीमांकन – पहले मधेस आन्दोलन में एक ही माँग स्पष्ट रूप से स्थापित हुई थी “समग्र मधेस एक प्रदेश” । तत्कालीन सरकार और आन्दोलनकारियों के बीच हुए सम्झौते में भी नेपाल के दक्षिणी भाग में अवस्थित बीस जिलों को मधेस के रूप में स्वीकारा गया था । जिस अनुसार अन्तरिम संविधान में आरक्षण के लिये मधेस के उन बीस जिलों के प्रमुख प्रशासक को तदनरुप मधेसी पहचान को प्रमाणित करने का अधिकार भी दिया गया था । बाद में कुछ मधेसी नेताओं ने काठमाण्डू में मधेस में दो प्रदेश बनाने पर सहमति जता दी और यहीं से विवाद की शुरुआत हो गई । नेपाल के शासकों ने इस सहमति का लाभ उठाते हुए मधेस में दो प्रदेश देते हुए पूरे मधेस को पाँच टुकड़ों में बाँट दिया । अपनी मूर्खता को छुपाते हुए मधेसी नेताओं ने अपने सहमति की अलग तरीके से व्याख्या कर दी । बाध्यतावश मधेसी जनता अपने नेता की बात को स्वीकारते हुए मधेस भूभाग को सिर्फ दो प्रदेश में बाँट सकने तक सहमत है । संघीय समावेशी मधेसी गठबन्धन ने मधेसी अवाम की इसी भावना का सम्बोधन करते हुए मधेस में परस्पर सीमा जुड़े दो प्रदेश को स्वीकार करने की माँग सरकार समक्ष प्रस्तुत किया है । जिस अनुसार दक्षिण के बीस जिलों को नारायणी नदी से पूर्व झापा तक एक प्रदेश और नारायणी नदी से पश्चिम कन्चनपुर तक दूसरे प्रदेश का प्रस्ताव है ।
(२) प्रतिनिधित्व – संविधान में यह भूगोल और जनसंख्या के आधार पर प्रस्तावित है । खास बात यह है कि सन् २०११ के राष्ट्रीय जनगणना अनुसार मधेस की आबादी देश की कुल जनसंख्या का ५०.१२ प्रतिशत है । इस हिसाब से मधेस को संसद में कम से कम आधा प्रतिनिधित्व मिलना चाहिये । परन्तु तीनों बड़े दल इसे स्वीकारना नहीं चाहते । जबकि हकीकत ये है कि मधेस में १८ प्रतिशत से अधिक पहाड़ी समुदाय के लोगों का भी बसोवास है । इसके साथ ही अगले बीस वर्षों तक निर्वाचन क्षेत्र पुनरावलोकन नहीं किये जाने की भी संवैधानिक सुनिश्चितता की गई है । इधर पहाड़ों पर रहने वाले लोगों का लगातार आन्तरिक अप्रवासन जारी है । तो इस प्रकार से पहाड़ पर आबादी घटते जाने के बावजूद संसद में प्रतिनिधित्व यथावत रखने की जो संवैधानिक व्यवस्था की गई है, मधेस इसको स्वीकारना नहीं चाहता ।
(३) समानुपातिक÷समावेशिता – अन्तरिम संविधान में मधेसी, आदिवासी÷जनजाति, अल्पसंख्यक, दलित और सीमान्तकृत समुदायों को निश्चित अनुपात में सरकारी सेवाओं में आरक्षण दिया गया था । वर्तमान संविधान में यह व्यवस्था अमूर्त रूप से रखा गया है । संसद में प्रस्तावित संशोधन विधेयक इस विषय पर आधा अधूरा प्रस्तुत किया गया है । मधेसी दल इसे पूर्णरूपेण अन्तरिम संविधान में स्वीकृत हो चुके व्यवस्था अनुरूप ही रखने की माँग किये हुए हैं ।
(४) नागरिकता – यह विषय भावनात्मक रूप से मधेसी समुदाय को अधिक आन्दोलित किये हुए है । मधेसी समुदाय के लगभग प्रत्येक परिवार का भारत में वैवाहिक सम्बन्ध है । स्वाभाविक है भारत से लाई गई बहू के अधिकारों की सुनिश्चितता का दायित्व भी मधेसियों पर ही जाता है । इसलिये अपने परिवार में ब्याह कर लाई गई भारतीय कन्या को सहज और अधिकार सम्पन्न नागरिकता की संवैधानिकता मधेस की चौथी और महत्वपूर्ण माँग है ।
इस बीच तीनों बड़े दलों के नेता और विशेष रूप से प्रधानमन्त्री की परस्पर विरोधाभासी अभिव्यक्तियाँ भी विश्वास का वातावरण बनने नहीं दे रही है । उस पर अपनी कटुक्तियों के लिये आलोचित प्रधानमन्त्री ओली के बोल समय कुसमय आग में घी डालने का काम करते ही रहते हैं । अपने बड़बोलेपन के कारण पिछले दिनों प्रधानमन्त्री ने देश की इस आन्तरिक समस्या में भारत को भी लपेट लिया था । मधेसी दलों के आन्दोलन का हिंसक दमन किये जाने पर भयभीत मधेसी सीमा नाका पर जा कर बैठ गये । इस नाकाबन्दी को ओली जी ने भारत द्वारा प्रायोजित बता दिया । नेपाली मीडिया में महीनों तक हाय–तौबा मचाया गया । भारतीय रवैये के अन्तर्राष्ट्रीयकरण करने की धमकी दी गई । राष्ट्रीय स्वाधीनता और राष्ट्रवाद का नारा जोरों से उछाला गया । परिणाम ये हुआ कि भारत की सदाशयता के बावजूद भी नेपाल में जारी आन्दोलन को सहज अवतरण कराना अब आसान नहीं रहा । बाद के दिनों में भारत द्वारा मधेस और नेपाल सरकार के बीच सहज वातावरण बनाने की कोशिश भी असरदार नहीं हो पा रही है । उलझन का दौर बढ़ता ही जा रहा है । मधेस आन्दोलन इतना भावनात्मक हो चुका है कि कोई भी मधेसी नेता निर्णय लेने का साहस नहीं जुटा पा रहा । आम जनता चाहे पहाड़ी समुदाय का हो या मधेसी की परेशानी हद से बाहर जा चुकी है । फिर भी लोग सदियों की पीड़ा और अपमानित जीवन का अन्त चाहते हैं । देखना है ओली सरकार देश को इस भँवर से निकालना भी जानती है या सिर्फ कटुक्तियों तक ही सीमित रहने वाली है । जो भी हो नव वर्ष नेपाल के लिये नयी उम्मीद लेकर आए यही कामना है ।

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