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नाँच न आवे आंगन टेढ़ा, नेपाल में न जाने कब होगा सवेरा

 

मालिनी मिश्र , ९ जून , काठमाण्डू

एक तो हमारा देश गरीब देशों की श्रेणी में है, उस पर काम भी ऐसे हैं जो कभी हमें उपर उठने ही नही देंगें । गत वर्ष आये भूकम्प ने अच्छा खासा हमें पीछे ढकेल दिया है उस पर राजनीतिक अस्थिरता देश की रीढ की हड्डी को मूल रुप से कमजोर कर रही है ।

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क्या अक्सर होने वाले इस बन्दी नामक रोग का कोई इलाज नही है । नेपाल के एक दिन बन्द होने से हमें लगभग २ अर्ब के बराबर का नुकसान होता है । रोज काम कर अपना पेट भरने वालों के बारे में सोचिए । मजे की बात तो यह है कि आज एक पार्टी की वजह से बन्द तो कल दूसरी के वजह से । कार्यकर्ताओं से ज्यादा पुलिस कर्मी सड़कों पर नजर आते है ।

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लोग साहस कर के निकलते तो हैं ही पर सुरक्षा को देखते हुए स्कूल, कालेज आदि को बन्द कर दिया जाता है । इस का प्रभाव क्या है ? क्या हम उन्नति की तरफ अग्रसर हो रहे हैं ? बन्द से सिर्फ हमारी शिक्षा व्यवस्था, आर्थिक व्यवस्था का ह्ृास हो रहा है । बन्द कर्ता मात्र अपना व्यक्तिगत स्वार्थ सिद्ध करके, जनता में डर व भय पैदा कर रहे हैं और कुछ नही । ऐसी स्थिति में हमारे देश में लगानी करने वालों में कमी व देश के व्यापार, निर्यात तो पहले से ही नाम मात्र है, आयात, उद्योग, आपूर्ति आदि में अच्छी खासी गिरावट हो रही है । बड़ी बड़ी बातों से यदि देश चलता तो आज जनता, बच्चे बेवजह घरों में बैठ कर अपना समय बर्बाद नही कर रहे होते ।

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इस स्थिति से छुटकारा का कोई नियम नही है हमारी सरकार के पास, कड़े से कड़े नियम तो सिर्फ उन गरीबों के लिए बना दिए गए हैं जो फुटपाथ पर सड़क के किनारे स्वरोजगार से अपना पेट भरते हैं । इस तरह के सिर्फ नाम भर के बन्द से ही देश में लगभग १५ से १६ लाख छोटे बड़े सभी व्यापारियों के काम पर असर पर रहा है ।

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