Wed. Aug 5th, 2026
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जेपी की गिरफ्तारी से उपजे सवाल

पंकज दास

 
Jay prakash Gupta
Jay prakash Gupta

मधेश और मधेशी शक्तियों के विरुद्ध जिस तरह से काठमांडू का एक प्रभावशाली वर्ग षड्यन्त्र कर रहा है, जेपी गुप्ता को मिली सजा कहीं उसी षड्यन्त्र का हिस्सा तो नहीं है – यह सवाल इसीलिए भी उठ रहा है कि मधेशी जनता को ना तो पुलिस प्रशासन पर और ना ही न्याय प्रणाली पर भरोसा रह गया है। सर्वोच्च अदालत का जेपी गुप्ता के विरुद्ध दिया गया फैसला ऐसे समय में आया है, जब मधेश में निर्ण्ाायक लडरई की तैयारी की जा रही थी और इसमें कोई संदेह नहीं कि गुप्ता इसकी अगुवाई कर रहे थे। इस देश में अख्तियार हो या सर्वोच्च अदालत यह बात तो तय है कि मधेशी जनता या मधेशी नेता के पक्ष में कोई नहीं है। और इसी का खामियाजा गुप्ता को भी भुगतना पडÞा।
मातृभाषा को लेकर सर्वोच्च अदालत द्वारा दिया गया फैसला हो या उपराष्ट्रपति के शपथ-ग्रहण को लेकर आया आदेश सभी पर्ूवाग्रह और मधेश विरोधी मानसिकता से ग्रस्त थे। उसके बाद में भी कई उदाहरण हैं। राष्ट्रीय पोशाक के संबंध में हो या फिर सेना में मधेशी जनता के सामूहिक प्रवेश की बात, हर बार सर्वोच्च अदालत का फैसला पर्ूवाग्रह से ग्रसित रहा है। अदालत के इन्हीं फैसलो की वजह से उसके द्वारा किए गए सही फैसले को भी आशंका की दृष्टि से देखा जाने लगा है। और जेपी गुप्ता के सम्बन्ध में भी ऐसा ही हुआ है।
वैसे इस केस के कानूनी पहलू पर विचार करें तो भी कई सवाल खडÞे होते है। आखिरकार शाही शासन के समय जिस तरह नेताओं को प्रतिशोध की भावना में भ्रष्टाचार के झूठे मुकदमें में फंसाया गया था, आज फिर वही हो रहा है। जब गुप्ता ने भ्रष्टाचार किया तो विशेष अदालत ने क्यों उन्हें इस केस से बाईज्जत बरी कर दिया था – फिर ऐसी क्या वजह थी कि अख्तियार दुरुपयोग अनुसन्धान आयोग ने गडेÞ हुए मर्ुर्दे को उखाडÞा और चुन-चुन कर मधेशी नेताओं को अपना निशाना बनाया। यह तो र्सवविदित है कि अख्तियार भी मधेश विरोधी रवैया अपनाता रहा है। गुप्ता को इस बार मन्त्री बनने के साथ ही उन के खिलाफ अख्तियार द्वारा भ्रष्टाचार के मुकदमें को तीव्र रुप से आगे बढÞाने और मन्त्री पद पर रहते सजा देने के लिए काफी कसरत की गई थी।
इस केस से जुडेÞ अख्तियार के ही एक अधिकारी ने ६ महीने पहले ही अदालत के द्वारा सुनाए जाने वाले फैसले की जानकारी दी थी। और ठीक उसी तरह का फैसला अदालत द्वारा आने के बाद मन में शंका होना लाजिमी है। इस देश में एक ऐसा सशक्त लाँबी काम कर रही है जो कि इस देश की सभी बडÞी राजनीतिक पार्टियों पर अपना असर दिखा रही है। उसने पुलिस, प्रशासन, न्याय व्यवस्था, अख्तियार, नेपाली सेना, मीडिया, नागरिक समाज सब को अपने कब्जे में ले रखी है। उसी के प्रभाव से इस समय पूरा का पूरा उथल पुथल हो रहा है। और यह बार बार कहना ना होगा कि वह अदृश्य शक्ति मधेश का धूर विरोधी है।

जाते-जाते जेपी की प्रतिक्रिया

सुप्रीम कोर्ट द्वारा अपने विरूद्ध फैसला सुनाने के बाद जेल जाने से पहले जेपी गुप्ता द्वारा पत्रकारों के समक्ष दी गई प्रतिक्रियाः
पहली बात मैं विगत २०-२५ वर्षों से मीडिया के मित्रों के साथ रहते आ रहा हूँ। अदालत के फैसले ने परिस्थिति में परिवर्तन लाया है। अब मैं एक राजनीतिक पार्टर्ीीे नेता के रुप में अथवा राजनीतिक कार्यकर्ता के रुप में शायद आप लोगों से नहीं मिल पाऊँगा।
दूसरी बात आज मैं आप लोगों के मार्फ प्रधानमन्त्री समक्ष अपने मन्त्री पद से त्यागपत्र देने की जानकारी कराना चाहता हूँ। इस स्थिति में प्रधानमन्त्री को अपना इस्तिफा प्रेषित नहीं कर सकता, तर्सथ मीडिया से ही प्रधानमन्त्री जी को जानकारी करा रहा हूँ।
तीसरी बात यह है कि इस फैसले को मैने एक संर्घष्ा के रुप में लिया है। मैं अदालती फैसले का दफा-उपदफा जानना नहीं चाहता। अदालत ने मुझे क्या जुरमाना किया, क्या सजाय दिया यह भी मै जानना नहीं चाहता। भविष्य में अदालत के फैसले के विषय में कानूनविद मित्र लोग ही कुछ कहेंगे, करेगें।
लेकिन मैने इस फैसले को इस तरह से ग्रहण किया है- मधेशी जनता के लिए मैने जो संर्घष्ा शुरु किया, मधेशी आन्दोलन को विगत में मैने जैसे आगे बढाया और आज भी बढÞा रहा हूँ, उसी के लिए मुझे दण्डित किया गया है। मुझे लगता है, इतिहास के एक क्रुसियल मोड में, मुझे जैसे शाही सत्ता के समय २०५९ साल में प्रताडित करके भ्रष्टाचार का अभियोग लगाया गया था, आज देश में लोकतन्त्र के आने के बाद भी उस भ्रष्टाचार को प्रमाणित करने का काम किया गया। यह मुझे दण्डित करना नहीं, मेरो द्वारा बढÞाया गया आन्दोलन को दण्डित करना है।
मैं विश्वास के साथ कहता हूँ, मेरे द्वारा बढाया गया आन्दोलन कभी भी दण्डित नहीं हो सकता। मेरे एक-डेढ साल कैद में रहने से यह आन्दोलन समाप्त होनेवाला नहीं है। इस के मुद्दे किसी के दबाने से नहीं दबेंगे।
अदालत के फैसले के बाद मैं एक राजनीतिक व्यक्ति के रुप में स्वयं आज अदालत में प्रस्तुत हुआ हूँ। जेल से निकलने के बाद मैं पुनः आन्दोलन को आगे बढाउंगा। मेरी पार्टर्ीीमधेशी जनअधिकार फोरम गणतान्त्रिक) के मित्र लोगों को, मधेशी मोर्चा के मित्र लोगों को इस फैसले को मधेश के भावी दिन का संकट समझने के लिए आग्रह करता हूँ। मुझे इतना ही कहना है। धन्यवाद !

जेपी गुप्ता को भ्रष्टाचार के मुद्दे पर जेल भिजवाना मधेश आन्दोलन को कमजोर करने की कडी थी। क्योंकि जिस प्रखर ढंग से जेपी गुप्ता मधेश के पक्ष में वकालत करते है, मधेश के मुद्दों को उठाते हैं, इस समय नेतृत्व के स्तर पर दूसरा कोई भी नेता उन के जोडÞ का नहीं है। मन्त्री पद पर रहते हुए मधेश के पक्ष में सरकार के फैसले की आलोचना करना, प्रधानमन्त्री तक को कठघरे में खडÞा कर देना, विपक्षी पार्टियों को करारा जबाव देना या फिर अदालती फैसले पर तीखी प्रतिक्रिया देना यह सब जेपी के ही बस की बात थी।
उपेन्द्र यादव से अलग होने के बाद मधेश के मुद्दे को जिस ढंग से जेपी ने उठाया, वह निश्चित ही मधेश को एक नई शिक्षा दे सकता था। पिछले कुछ दिनों से देश की न्यायपालिका, कार्यपालिका और विधायिका सभी के ही मधेश विरोधी रुख अपनाने के बाद जेपी गुप्ता ने साफ कह दिया था कि यही रवैया रहा तो काठमांडू का संबंध मधेश से टूट सकता है। गुप्ता के इस बयान के बाद मानो नेपाली राजनीति में भूचाल आ गया था। राष्ट्रपति तक ने इस पर आपत्ति जताई थी। अपने रटे रटाए अंदाज में राष्ट्रपति ने गुप्ता को राष्ट्रीयता और अखण्डता का पाठ पढÞाया और संविधान के दायरे में रहने की हिदायत दी तो गुप्ता ने भी इस का करारा जबाव दिया था। जेपी गुप्ता ने राष्ट्रपति को कडÞा पत्र लिखते हुए संविधान में राष्ट्रीयता और अखण्डता के साथ ही संघीयता, मधेश स्वायत्तता आदि के भी उल्लेख होने की याद दिलाते हुए मधेश के विरोध में बोलने वालों की ओर भी ध्यान देने की बात कही।
जेपी गुप्ता के फैसले के बाद मधेशी नेता, मधेशी मोर्चा व अन्य नेताओं की खामोशी पर भी सवाल खडÞे हो रहे है। जिस तरह से शरद सिंह भण्डारी के समय मेधशी मोर्चा की खामोशी नहीं थी, उसी प्रकार यदि इस बार भी मधेशी मोर्चा ने अपना रुख स्पष्ट नहीं किया तो आने वाले दिनों में इस का गलत असर दूसरे नेताओं पर भी पडÞ सकता है। क्योंकि अख्तियार की जद में जेपी गुप्ता अकेले मधेशी नेता नहीं हैं। आज यदि मधेशी नेता खामोश रहे तो अगला नम्बर हृदयेश त्रिपाठी, महेन्द्र राय यादव और राजेन्द्र महतो का भी आ सकता है।  क्योंकि अख्तियार ने चुन-चुन कर मधेशी नेताओं को अपना निशाना बनाया हुआ है और सभी अख्तियार की घेराबन्दी में आ चुके है। इसलिए भ्रष्टाचार के मुद्दे पर नहीं तो कम से कम मधेश का मुद्दा जो जेपी ने शुरु किया था, उस के पक्ष में बोलना ही चाहिए। जेपी तो जेल होने के बाद यहाँ के सभी मीडिया मंे इतनी खुशियाली कभी नहीं थी। इस फैसले के बाद ऐसा लगा रहा था, जैसे मीडिया काँफी खुश हो। क्योंकि एक मधेशी मन्त्री को जेल हुआ था। कई मीडिया ने तो गुप्ता को इस कदर प्रचारित किया, जैसे श्याम सुन्दर गुप्ता की तरह ही वह अपहरणकारी हो। मीडिया को अच्छी तरह पता है कि जेपी के जेल जाने से मधेश मुद्दा कमजोर होगा, इसीलिए नेपाली मीडिया या मधेश विरोधी मीडिया खुशीयाली मना रही थी। लेकिन इससे सभी को सावधान रहना होगा। क्योंकि मधेशी जनता नेपाली मीडिया के झूठे व भ्रामक विश्लेषणों के झाँसे में नहीं आने वाली है। मधेशी जनता न्यायालय के भी मधेश विरोधी व्यवहार से अच्छी तरह वाकिफ है और मीडिया की भी मधेश विरोधी चेहरे को अच्छी तरह जानती है। इस समय भले ही मधेशी जनता खामोश है लेकिन वह सही परिस्थितियों का आकलन कर रही है और स्थिति उस समय भयानक रुप ले सकती है, जब मधेशी जनता सर्वोच्च अदालत के फैसले को मानना ही छोडÞ दे। जेपी के जेल जाने से किसी भी मधेश विरोधी को अधिक खुश नहीं होना चाहिए। हाँ जेल जाने से कांग्रेस के साथ अपने बिताए दिन का प्रायश्चित्त अवश्य हो जाएगा लेकिन मधेश मुद्दा कमजोर नहीं हो सकता है। एक साल के बाद जब गुप्ता जेल से बाहर होंगे तो उम्मीद है उसी धार के साथ मधेश के मुद्दे को आगे बढाएंगे। ±±±

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