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लो बसंत आया ! संत, कुसंत, असंत ! सभी पर छाया !-:मुकुन्द आचार्य

 
बुरा ना मानो होलि है

बसन्त सौर्न्दर्य की सीमा है। इसीलिए तो महाकवि कालिदास ने ‘ऋतुसंहार’ में कहा था- र्सव प्रिये ! चरुतरं वसन्ते ! स्वभावतः वसन्त से कला और साहित्य को बहुत प्रेरणा मिली। कहा जाता है, जिस व्यक्ति का जन्म वसन्त पंचमी के दिन होता है, वह ललित कलाओं का प्रेमी होता है। पहले वसन्त के शुभागमन पर वसन्तोत्सव मानाया जाता था। इस के पीछे एक महान् आदर्श भी है। इस वसन्त की वासन्तिकता के बीच भगवान शंकर को कामदेव के मोहन रुप ने मोहने की चेष्टा की थी और तब महादेव के तीसरे नेत्र ने उसे भस्म कर दिया था। प्रतिवर्षहोलिका-दहन अन्य बातों के अतिरिक्त इस घटना की स्मृति भी दिला जाता है। अतः हमारे इस सांस्कृतिक पर्व होली को एक ओर ‘मदन महोत्सव’ की संज्ञा दी गई है, तो, दूसरी ओर ‘शतपथ व्राम्हण’ ने वसंत को ही ब्रम्ह माना है।
होली मुक्त स्वच्छंद हास-परिहास का पर्व है। फाल्गुन शुक्ल पूणिर्मा को आर्य लोग जौ की बालियों की आहुति यज्ञ में देकर अग्निहोम का आरंभ करते है, कर्मकाण्ड में इसे ‘यवग्रयण’ यज्ञ का नाम दिया गया है। बसंत में र्सर्ूय दक्षिणायन से उत्तरायण में आ जाता है। इसीलिए होली के पर्व को गवंतरांय भी कहा गया है।
होली फाल्गुन-पूणिर्मा और चैत्र-प्रतिपदा को मनाई जाती है। यह तिथि कई कारणों से महत्वपर्ूण्ा मानी जाती है। कहा जाता है कि इस दिनर् इश्वरभक्त सत्यवादी प्रह्लाद को उस के पापी पिता हिरण्यकश्यप ने आग में न जलने का वरदान वाली होलिका की गोद में बैठाकर आग में डाल दिया था, किन्तु, भगवान की महिमा से होलिका जल गई और प्रह्लाद को कुछ न हुआ। उसी के उपलक्ष्य में होलिका-दहन महोत्सव मनाया जाता है।
कहा जाता है कि इसी दिन राम ने लंका पर विजय पाई थी और होलिका दहन लंका-दहन का प्रतीक है। होली के दिन हिन्दू नया वस्त्र पहनते हैं, रंग-अबीर खेलते हैं, झाल-ढÞोलक के साथ होली गाते हैं और पकवान खाते हैं। एक दिन पहले कहीं-कहीं कादों-मिट्टी खेलने का भी रिवाज है और होली की रात को कहीं अश्लील होलैया और जोगीरा बोलने का भी। हालांकि इससे सद्भाव और प्रेम के बदले कटुता बढÞती है। गांवों का यह हाल है तो शहरों में भी नशे में धूत होकर गाली-गलौज, मारपीट, छेडÞखानी करने की गंदी प्रवृत्ति दिनानुदिन बढÞ रही है। ऐसी गंदी आदत को छोडÞ देना चाहिए।
किन्तु, इतना होने पर भी फागुन हममें ऐसी स्निग्धता और मस्ती भरता है कि हम वर्तमान की कठोरता को भूलकर कुछ क्षण अपने मन की कह- सुन लेना चाहते है।
हाँ, होली हमारी एकता का प्रतीक है। उस दिन छोटे-बडेÞ, धनी-दर्रि्र सभी अबीर के रंग में रंगकर एक रंग हो जाते हैं। किसी कवि ने होली के मकसद को ऐसे उजागर किया हैः-
बिछडेÞ है जो मिल जाएँ
मनकी कलियाँ फिर खिल जाएँ
बैरी देखें और हिल जाएँ
तेरे घर का मेल !
ऐसी होली खेल !
हिन्दी साहित्य में एक सुप्रसिद्ध मुस्लिम भक्त कवि रसखान हो गए हैं। वे भगवान कृष्ण की मुरली-माधव छवि पर मुग्ध हो गए थे। उन की चार पंक्तियों में ब्रज की होली का आनन्द लीजिएः-
फागुन लाग्यो सखी जबतें तबतें ब्रजमण्डल धूम मच्यो है।
नारी नवेली बचैं नहीं एक, बिसेख यहै सब प्रेम रच्यो है।
साँझ सकारे वही ‘रसखानि’ सुरंग गुलाल ले खेल रच्यो है।
को सजनी निलजीन भई, अरु कौन भटू जिहि मान बच्यो है।
फागुन का मस्त महीना है। वन-उपवन फूलों से लदे हैं। फागुन में पुराने पत्ते झडÞने लगते हैं। नवीन कोपलें निकलती हैं। इस मादकता भरे फागुन में आईए हम लोग भी कलम को पीचकारी और स्याही को रंग बनाकर होली खेलें। क्या आप को वसंत के आगमन की पदचाप नहीं सुनायी दी – तो लीजिए कलम की गोली खाईए और फाग का राग गाईए ः-
-साथ में होली सम्बन्धी विविध लेख, रोचक प्रसंग और विभिन्न क्षेत्रों से जुडे लोगों से पूछे गए प्रश्न का जवाफ ।)

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