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रमा एकादशी का महत्तव

 

१५ अक्टुवर

रमा एकादशी

एकादशी मनुष्‍यों को कर्मो से मुक्ति देती है। प्रति वर्ष 24 एकादशी आती है। ज‍िस वर्ष अधिक मास होता है उस वर्ष 26 एकादशी होती हैं। सभी एकादशी का पौराणिक महत्‍व है। उत्‍तरी भारत के कैलेंडर के अनुसार रमा एकादशी कार्तिक माह में आती है। जबकि तमिल कैलेंडर में ये पुरातास्‍सी महीने में आती है। आंध्र प्रदेश, कर्नाटका, गुजरात एवं महराष्‍ट्र में रमा एकादशी अश्र्वायूज महीने में आती है। देश के कुछ हिस्‍सों में ये आश्र्विन महीने में भी मनाई जाती है। रमा एकादशी दिवाली के त्‍यौहार के चार दिन पहले आती है। रमा एकादशी को रम्‍भा एकादशी या कार्तिक कृष्‍ण एकादशी भी कहा जाता है। ऐसी मान्‍यता है कि रमा एकादशी का व्रत रखने से मनुष्‍य के पाप धुल जाते है।

रमा एकादशी तिथि

यह कार्तिक माह की एकादशी है। ज‍िसका महत्‍व अधिक माना जाता है। यह एकादशी कार्तिक कृष्‍ण पक्ष की एकादशी है। वर्ष 2017 में यह 15 अक्‍टूबर रविवार को मनाई जाएगी। एकादशी तिथि की शुरुआत 15 अक्‍टूबर दोपहर 2 बजकर 3 मिनट से 16 अक्‍टूबर को दोपहर 1 बजकर 5 मिनट तक है।

रमा एकादशी व्रत विधि

एकादशी व्रत के नियमों का पालन व्रत के एक दिन पहले यानि दशमी के दिन से ही शुरू हो जाता है। रमा एकादशी के दिन स्नानादि से निवृत्त होकर व्रत संकल्प करना चाहिए। एकादशी व्रत के दिन भगवान विष्णु की पूजा करनी चाहिए है। इसके बाद भगवान विष्णु का धूप, पंचामृत, तुलसी के पत्तों, दीप, नेवैद्ध, फूल, फल आदि से पूजा करने का विधान है। रमा एकादशी व्रत वाली रात को भगवान का भजन- कीर्तन या जागरण करना चाहिए। पद्म पुराण के अनुसार व्रत अगले यानि द्वादशी के दिन भगवान का पूजन कर ब्राह्मण को भोजन और दान विशेष: कपड़े, जूते, छाता, आदि देने का विधान बताया गया है। अंत में भोजन ग्रहण कर व्रत खोलना चाहिए।

रमा एकादशी व्रत का महत्त्व 

पद्म पुराण के अनुसार रमा एकादशी व्रत कामधेनु और चिंतामणि के समान फल देता है। इसे करने से व्रती अपने सभी पापों का नाश करते हुए भगवान विष्णु का धाम प्राप्त करता है। मृत्यु के बाद उसे मोक्ष की प्राप्ति होती है। इसके अलावा रमा एकादशी व्रत के प्रभाव से धन- धान्य की कमी दूर होती है।

कैसे करें रमा एकादशी व्रत

एकादशी व्रत के नियमों का पालन व्रत के एक दिन पहले यानि दशमी के दिन से ही शुरू हो जाता है। रमा एकादशी के दिन स्नानादि से निवृत्त होकर व्रत संकल्प करना चाहिए। एकादशी व्रत के दिन भगवान विष्णु की पूजा करनी चाहिए है। इसके बाद भगवान विष्णु का धूप, पंचामृत, तुलसी के पत्तों, दीप, नेवैद्ध, फूल, फल आदि से पूजा करने का विधान है।

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रमा एकादशी की कथा

पौराणिक काल में मुचुकुंद नाम का राजा राज्य करता था। इंद्र, वरुण, कुबेर, विभीषण आदि उसके मित्र थे। वह बड़ा सत्यवादी तथा विष्णुभक्त था। उसका राज्य बिल्कुल निष्कंटक था। उसकी चंद्रभागा नाम की एक कन्या थी जिसका विवाह उसने राजा चंद्रसेन के पुत्र सोभन से कर दिया। वह राजा एकादशी का व्रत बड़े ही नियम से करता था और उसके राज्य में सभी क्रठोरता से इस नियम का पालन करते थे।

सोभन एक बार अपनी ससुराल आया हुआ था। वह कार्तिक का महीना था। उसी मास में महापुण्यदायिनी रमा एकादशी आ गई। इस दिन सभी व्रत रखते थे। चंद्रभागा ने सोचा कि मेरे पति तो बड़े कमजोर हृदय के हैं वे एकादशी का व्रत कैसे करेंगे जबकि पिता के यहां तो सभी को व्रत करने की आज्ञा है। मेरा पति राजाज्ञा मानेगा तो बहुत कष्ट पाएगा। चंद्रभागा को जिस बात का डर था वही हुआ। राजा ने आदेश जारी किया कि इस समय उनका दामाद राज्य में पधारा हुआ है अतः सारी प्रजा विधानपूर्वक एकादशी का व्रत करे। जब दशमी आई तब राज्य में ढिंढो़रा पिटा उसे सुनकर सोभन अपनी पत्नी के पास गया और बोला हे प्रिय तुम मुझे कुछ उपाय बतलाओ क्योंकि मैं उपवास नहीं कर सकता यदि मैं उपवास करूंगा तो अवश्य ही मर जाऊंगा।

पति की बात सुन चंद्रभागा ने कहा हे स्वामी मेरे पिता के राज्य में एकादशी के दिन कोई भी भोजन नहीं कर सकता। यहां तक कि हाथी, घोड़ा, ऊंट, पशु आदि भी तृण, अन्न, जल आदि ग्रहण नहीं करते, फिर भला मनुष्य कैसे भोजन कर सकते हैं। यदि आप उपवास नहीं कर सकते तो किसी दूसरे स्थान पर चले जाइए, क्योंकि यदि आप यहां रहेंगे तो आपको व्रत तो अवश्य ही करना पड़ेगा। पत्नी की बात सुन सोभन ने कहा हे प्रिय तुम्हारी राय उचित है परंतु मैं व्रत करने के डर से किसी दूसरे स्थान पर नहीं जाऊंगा, अब मैं व्रत अवश्य ही करूंगा, परिणाम चाहे कुछ भी क्यों न हो, भाग्य में लिखे को भला कौन टाल सकता है। सभी के साथ सोभन ने भी एकादशी का व्रत किया और भूख और प्यास से अत्यंत व्याकुल होने लगा।

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सूर्य नारायण भी अस्त हो गए और जागरण के लिए रात्रि भी आ गई। वह रात सोभन को असहनीय दुख देने वाली थी। दूसरे दिन सूर्योदय होने से पूर्व ही भूख-प्यास के कारण सोभन के प्राण-पखेरू उड़ गए। राजा ने सोभन के मृत शरीर को जल-प्रवाह करा दिया और अपनी पुत्री को आज्ञा दी कि वह सती न हो और भगवान विष्णु की कृपा पर भरोसा रखे। चंद्रभागा अपने पिता की आज्ञानुसार सती नहीं हुई। वह अपने पिता के घर रहकर एकादशी के व्रत करने लगी।

उधर रमा एकादशी के प्रभाव से सोभन को जल से निकाल लिया गया और भगवान विष्णु की कृपा से उसे मंदराचल पर्वत पर धन-धान्य से परिपूर्ण तथा शत्रु रहित देवपुर नाम का एक उत्तम नगर प्राप्त हुआ। उसे वहां का राजा बना दिया गया। उसके महल में रत्न तथा स्वर्ण के खंभे लगे हुए थे। राजा सोभन स्वर्ण तथा मणियों के सिंहासन पर सुंदर वस्त्र तथा आभूषण धारण किए बैठा था। गंधर्व तथा अप्सराएं नृत्य कर उसकी स्तुति कर रहे थे। उस समय राजा सोभन मानो दूसरा इंद्र प्रतीत हो रहा था। उन्हीं दिनों मुचुकुंद नगर में रहने वाला सोमशर्मा नाम का एक ब्राह्मण तीर्थयात्रा के लिए निकला हुआ था। घूमते-घूमते वह सोभन के राज्य में जा पहुंचा, उसको देखा। वह ब्राह्मण उसको राजा का जमाई जानकर उसके निकट गया। राजा सोभन ब्राह्मण को देख आसन से उठ खड़ा हुआ और अपने ससुर तथा पत्‍नी चंद्रभागा की कुशल क्षेम पूछने लगा। सोभन की बात सुन सोमशर्मा ने कहा हे राजन हमारे राजा कुशल से हैं तथा आपकी पत्नी चंद्रभागा भी कुशल है। अब आप अपना वृत्तांत बतलाइए। आपने तो रमा एकादशी के दिन अन्न-जल ग्रहण न करने के कारण प्राण त्याग दिए थे। मुझे बड़ा विस्मय हो रहा है कि ऐसा विचित्र और सुंदर नगर जिसको न तो मैंने कभी सुना और न कभी देखा है, आपको किस प्रकार प्राप्त हुआ।

इस पर सोभन ने कहा हे देव यह सब कार्तिक माह के कृष्ण पक्ष की रमा एकादशी के व्रत का फल है। इसी से मुझे यह अनुपम नगर प्राप्त हुआ है किंतु यह अस्थिर है। सोभन की बात सुन ब्राह्मण बोला हे राजन  यह अस्थिर क्यों है और स्थिर किस प्रकार हो सकता है, सों आप मुझे समझाइए। यदि इसे स्थिर करने के लिए मैं कुछ कर सका तो वह उपाय मैं अवश्य ही करूंगा। राजा सोभन ने कहा हे ब्राह्मण देव मैंने वह व्रत विवश होकर तथा श्रद्धारहित किया था। उसके प्रभाव से मुझे यह अस्थिर नगर प्राप्त हुआ परंतु यदि तुम इस वृत्तांत को राजा मुचुकुंद की पुत्री चंद्रभागा पे कहोगे तो वह इसको स्थिर बना सकती हे।

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राजा सोभन की बात सुन ब्राह्मण अपने नगर को लौट आया और उसने चंद्रभागा से सारा वृत्तांत कह सुनाया। इस पर राजकन्या चंद्रभागा बोली हे ब्राह्मण देव आप क्या वह सब दृश्य प्रत्यक्ष देखकर आए हैं या अपना स्वप्न कह रहे हैं। चंद्रभागा की बात सुन ब्राह्मण बोला हे राजकन्या  मैंने तेरे पति सोभन तथा उसके नगर को प्रत्यक्ष देखा है किंतु वह नगर अस्थिर है। तू कोई ऐसा उपाय कर जिससे कि वह स्थिर हो जाए। ब्राह्मण की बात सुन चंद्रभागा बोली हे ब्राह्मण देव आप मुझे उस नगर में ले चलिए मैं अपने पति को देखना चाहती हूं। मैं अपने व्रत के प्रभाव से उस नगर को स्थिर बना दूंगी।

चंद्रभागा के वचनों को सुनकर वह ब्राह्मण उसे मंदराचल पर्वत के पास वामदेव के आश्रम में ले गया। वामदेव ने उसकी कथा को सुनकर चंद्रभागा का मंत्रों से अभिषेक किया। चंद्रभागा मंत्रों तथा व्रत के प्रभाव से दिव्य देह धारण करके पति के पास चली गई। सोभन ने अपनी पत्नी चंद्रभागा को देखकर उसे प्रसन्नतापूर्वक आसन पर अपने पास बैठा लिया।

चंद्रभागा ने कहा हे स्वामी अब आप मेरे पुण्य को सुनिए जब मैं अपने पिता के घर में आठ वर्ष की थी तब ही से मैं सविधि एकादशी का व्रत कर रही हूं। उन्हीं व्रतों के प्रभाव से आपका यह नगर स्थिर हो जाएगा और सभी कर्मों से परिपूर्ण होकर प्रलय के अंत तक स्थिर रहेगा। चंद्रभागा दिव्य स्वरूप धारण करके तथा दिव्य वस्त्रालंकारो से सजकर अपने पति के साथ सुखपूर्वक रहने लगी। भगवान कृष्‍ण ने कहा हे अर्जुन यह मैंने रमा एकादशी का प्रताप कहा है। जो मनुष्य रमा एकादशी के व्रत को करते हैं। उनके सभी पाप नष्ट हो जाते हैं। जो मनुष्य रमा एकादशी का माहात्म्य सुनते हैं। वह अंत समय में विष्णु लोक को जाते हैं।

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