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नेपाल: बिना पिता के नागरिकता नहीं

 

BBC Hindi:नेपाल में नागरिकता प्रमाणपत्र किसी भी नेपाली आदमी के लिए सर्वाधिक महत्वपूर्ण दस्तावेज़ है पर इसे पाना बड़ा ही कठिन है.

एक अनुमान के मुताबिक देश में क़रीब बीस लाख लोग ऐसे हैं जिनके पास ये दस्तावेज़ नहीं है इसका मतलब है कि ये लोग नेपाल के निवासी हैं लेकिन नागरिक नहीं.

कई लोगों को भय है कि नेपाल के नए संविधान में ये नियम और कड़े किए जा सकते हैं.

पासपोर्ट है पर नागरिकता नहीं

नेपाल के क्रिकेट खिलाड़ी शरद भेस्वाकर देश के बड़े खिलाड़ियों में से एक हैं. वो नेपाल की टीम की राष्ट्रिय टीम के खिलाड़ी हैं लेकिन देश के अधिकृत नागरिक नहीं हैं.

“मैं पिछले आठ साल से नागरिकता प्रमाण पत्र लेने की कोशिश कर रही हूँ. साल भर में मैं जो भी बचाती हूँ वो सब इसी कोशिश में ख़र्च हो जाता है. अब तो बिना नागरिकता प्रमाण पत्र के कोई मकान भी किराए पर नहीं देता. मेरा तो चल गया पर मेरे बच्चों का क्या होगा बिना इसके वो कैसे अपनी रोज़ी रोटी कमाएंगे.”

भगवती छेत्री

उनका पूरा जीवन नेपाल में बीता है लेकिन वो यहाँ पैदा नहीं हुए हैं. उनकी माँ नेपाली हैं पर उनके पिता भारतीय थे. इसलिए वो नागरिकता की मांग नहीं कर सकते.

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शरद इस मुद्दे पर कहते हैं ” ये बहुत ही लंबा किस्सा है. आठ नौ सालों से मैं इस जद्दोजहद में लगा हूँ. पर समस्या वहीं की वहीं है. कई बार ये मामला बेहद परेशान कर देता है.”

कुछ साल पहले नेपाल सरकार ने एक विशेष मामला मानते हुए उन्हें अंतरराष्ट्रीय मैचों में खेलने जाने के लिए एक पासपोर्ट जारी किया था पर शरद अभी भी नेपाली नागरिक नहीं हैं.

बिना नागरिकता प्रमाणपत्र के वो बैंक में खाता नहीं खोल सकते, ड्राईविंग लाईसेंस नहीं ले सकते और तो और उच्च शिक्षा के लिए प्रयास भी नहीं कर सकते.

नेपाल में 16 साल की उम्र में किसी को भी नागरिक घोषित किया जा सकता है बशर्ते आवेदनकर्ता के पिता ने उसके आवेदन पर हस्ताक्षर किए हों.

अगर किसी के पिता गुम हैं या नेपाली नागरिक नहीं हैं तो उसके सामने मुश्किलों का पहाड़ खड़ा हो सकता है.

‘अनुमान संकुचित’

“प्रारूप में कहते हैं कि नेपाल में नागरिकता के लिए माता और पिता दोनों का नेपाली होना ज़रूरी है तभी किसी को नागरिकता मिल पाएगी.किसी एक के नेपाली होने से काम नहीं चलेगा.”

रॉबर्ट पाईपर

संयुक्त राष्ट्र के मानवाधिकार मामलों के समन्वयक रॉबर्ट पाईपर कहते हैं “संख्या संयुक्त राष्ट्र के आंकड़ों से कहीं ज़्यादा हो सकती है. नेपाल के चुनाव आयोग ने गावों में लोगों से बात की थी और 20 लाख से ज़्यादा लोग अपने नागरिकता प्रमाणपत्र नहीं दे पाए, उन्होंने शहर में लोगों से अभी बात ही नहीं की है.”

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नेपाल में नागरिकता वंशावली पर मिलती है और नेपाली पिता के बच्चों को ही मिलती है. मानवाधिकार कार्यकर्ता कहते हैं कि यह महिलाओं के खिलाफ़ भेदभाव है. किसी विदेशी पुरुष से शादी करने वाली नेपाली महिला के लिए अपने बच्चे को नेपाली नागरिकता नहीं दिलवा सकती. नेपाली महिलाओं बिना पति के लिए अपने बच्चे के नाम को सरकारी कागजों में दर्ज नहीं करवा सकतीं.

महिलाएं अधिक परेशान

नेपाल के संविधान सभा के सदस्य उषाकला राय कहती हैं ” कई महिलाएं हिंसा और भेदभाव का शिकार होती हैं. ख़ास तौर पर महिलाएँ जो काम काज के लिए बाहर जाती हैं, जिनके पति उन्हें छोड़ चुके हैं या जिनका तलाक हो चुका है उनके और उनके बच्चों को नागरिकता से वंचित होना पड़ता है.”

क़रीब 55 साल उम्र की भगवती छेत्री को उनके पति ने छोड़ दिया था. उनके पास नागरिकता प्रमाणपत्र नहीं है और उनके बच्चों के पास भी कोई कानूनी दस्तावेज़ नहीं है.

छेत्री बताती हैं “मैं पिछले आठ साल से नागरिकता प्रमाण पत्र लेने की कोशिश कर रही हूँ. साल भर में मैं जो भी बचाती हूँ वो सब इसी कोशिश में ख़र्च हो जाता है. अब तो बिना नागरिकता प्रमाण पत्र के कोई मकान भी किराए पर नहीं देता. मेरा तो चल गया पर मेरे बच्चों का क्या होगा बिना इसके वो कैसे अपनी रोज़ी रोटी कमाएंगे.”

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संवेदनशील मुद्दा

नेपाल में नागरिकता एक संवेदनशील मुद्दा है. नेपाल के सरकारी अधिकारीयों और नेताओं को लगता है कि उन्हें इस मामले में सख्त होना ही होगा क्योंकि नेपाल तीन तरफ़ से भारत जैसे विशाल और बड़ी आबादी वाले देश से जुड़ा है.

राजनेता कहते हैं कि नए संविधान में वो औरतों के खिलाफ़ भेदभाव को दूर कर देंगे.

संयुक्त राष्ट्र के अधिकारीयों का कहना है कि मामला दावे के उलट है. संयुक्त राष्ट्र के रॉबर्ट पाईपर कहते हैं कि नए संविधान के प्रारूप में नियम और सख्त हैं.

पाईपर के अनुसार “प्रारूप में कहते हैं कि नेपाल में नागरिकता के लिए माता और पिता दोनों का नेपाली होना ज़रूरी है तभी किसी को नागरिकता मिल पाएगी.किसी एक के नेपाली होने से काम नहीं चलेगा.”

नागरिकता नियम अभी पूरी तरह से तय नहीं हुए हैं लेकिन लोगों में भय है कि अगर प्रारूप में मौजूद प्रस्ताव मान लिए गए तो लाखों लाख लोग मूलभूत अधिकारों से वंचित हो जायेगें.

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