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भारत और पाकिस्तान के बीच कटुतापूर्ण रिश्ते का परिणाम है- बिमस्टेक : डॉ. श्वेता दीप्ति

बिमस्टेक की सार्थकता ?

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हिमालिनी, अंक सितंबर,२०१८ | बहुक्षेत्रीय प्रौद्योगिकीय एवं आर्थिक सहयोग के लिए बंगाल की खाड़ी की पहल को बिमस्टेक के नाम से भी जाना जाता है । चौथा बिमस्टेक सम्मेलन काठमांडु में संपन्न हुआ । इस दौरान सभी सात सदस्य देशों ने आतंकवाद और इनके नेटवर्कों के खिलाफ संयुक्त कार्रवाई करने का संकल्प लिया । बिमस्टेक के सदस्य देशों सहित दुनियाभर में होने वाले आतंकी हमलों का हवाला देते हुए सम्मेलन के दौरान नेताओं से यह आग्रह किया गया, कि वे आतंकवाद का समर्थन करने, उन्हें शरण देने और धन मुहैया कराने वाले देशों एवं संगठनों की पहचान करें । सम्मेलन के समापन अवसर पर जारी १८ बिन्दु के संयुक्त वक्तव्य में बिम्सटेक के नेताओं ने दुनिया के सभी देशों से आह्वान किया कि वे आतंकवाद से निपटने के लिए एक व्यापक रणनीति बनाएं । ताकि आतंकियों की भर्ती, सीमा पर इनकी आवाजाही, धन की उपलब्धता जैसी तमाम गतिविधियों पर लगाम लगाई जा सके ।
बिमस्टेक के नेताओं ने कनेक्टिविटी के मुद्दे पर भी चर्चा की । इस नेताओं ने विभिन्न क्षेत्रों में बिना किसी रोकटोक के कनेक्टिविटी स्थापित करने के प्रति अपनी वचनबद्धता दोहराई । इसमें रेल, सड़क, जलमार्ग और वायु मार्ग जैसी भौतिक कनेक्टिविटी से लेकर डिजिटल कनेक्टिविटी तक शामिल है । बिमस्टेक नेताओं ने मुक्त व्यापार क्षेत्र (एफटीए) समझौते में तेजÞी लाने और इस क्षेत्र में सरकारों और निजी क्षेत्र के बीच सहयोग को और अधिक मजÞबूत करने के लिए व्यापार और आर्थिक मंचों की गतिविधियों के प्रति अपनी प्रतिबद्धता को फिर से स्वीकार किया । सदस्य देशों ने विभिन्न परियोजनाओं, कार्यक्रम और अन्य गतिविधियों को वित्तपोषित करने और इन पर शोध करने के लिए स्वैच्छिक योगदान वाले एक बिमस्टेक विकास फंड का गठन करने की संभावनों पर भी सहमति जताई ।
बंगाल की खाड़ी के तटों और उसकी सीमा में आने वाले बिमस्टेक देशों में भारत, नेपाल, भूटान, बांग्लादेश, म्यांमार, श्रीलंका और थाइलैंड शामिल हैं । बिमस्टेक देशों में दुनिया की कुल आबादी का २२ फीसदी हिस्सा शामिल है । सदस्य देशों के बीच शांति और समृद्धि स्थापित करने के लिए कुछ विशेष क्षेत्रों को ध्यान में रखकर जून १९९७ में बिमस्टेक का गठन किया गया था ।
बिमस्टेक ने मुख्य रूप से १४ विभिन्न क्षेत्रों को आपसी सहयोग के लिए चिन्हित किया था । इनमें व्यापार, निवेश, परिवहन एवं संचार, ऊर्जा, पर्यटन, कृषि और आतंकवाद शामिल हैं । लेकिन ये संगठन किसी भी क्षेत्र में प्रगति नहीं कर सके । इसके पीछे मुख्य कारण यही था कि बिमस्टेक के सभी सदस्य देश घरेलू स्तर पर ही कई बड़ी समस्याओं से ग्रस्त थे । ये संगठन करीब २१ वर्षों से अस्तित्व में है, मगर काठमांडु सम्मेलन से पहले केवल तीन ही बार इस सम्मेलन का आयोजन हुआ है । पाकिस्तान के आतंकियों के साथ संबंध और सीमा पर चीन की ओर से सड़कें बनाने जैसी गतिविधियों की वजह से सार्क क्षेत्र में गतिरोध बढ़ रहा है । यही वजह है कि बिमस्टेक नेताओं को फिर से एकजुट होने की जÞरूरत महसूस हुई है । बिमस्टेक में सबसे बड़ा देश होने के नाते भारत ने इसकी पहल की ।
काठमांडु सम्मेलन में मौजूदा सहयोग के क्षेत्रों की समीक्षा और पुनर्गठन करने की आवश्यकता और मुख्य क्षेत्रों में विकास को रफ्तार देने पर बल दिया गया । थाइलैंड ने सहयोग के स्तंभों को फिर से वरीयता के आधार पर तय करने के संबंध में एक अवधारणा पत्र प्रस्तुत किया, जिसमें पांच मुख्य क्षेत्रों के बारे में बताया गया, जिस पर स्थायी कार्य समिति में चर्चा की जाएगी । वर्ष २०१४ में म्यांमार की राजधानी नाय पाई ता में हुए तीसरे सम्मेलन के दौरान भारत ने कनेक्टिविटी, आतंकवाद, ऊर्जा, व्यापार और आर्थिक सहयोग और व्यक्ति से व्यक्ति तक आदान प्रदान जैसे प्रमुख क्षेत्रों पर ध्यान केन्द्रित करने की बात कही थी ।
बिमस्टेक के विदेश मंत्रियों ने बिम्सटेक ग्रिड कनेक्शन स्थापित करने के लिए एक समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर भी किया । सम्मेलन के दौरान नेताओं ने गरीबी उन्मूलन, कृषि, मछली पालन, पर्यटन, जन स्वास्थ्य और सांस्कृतिक संबंधों को मजÞबूत करने पर भी चर्चा की ।
सम्मेलन के दौरान भारतीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने बिम्सटेक देशों के नेताओं से मुलाकात की । उन्होंने सदस्य देशों को आश्वासन दिया कि भारत अपनी ‘पड़ोसी प्रथम’ और ‘पूर्व में देखो’ नीति के तहत सदस्य देशों को अपना समर्थन जारी रखेगा । सम्मेलन को संबोधित करते हुए श्री मोदी ने व्यापार, अर्थव्यवस्था, परिवहन, डिजिटल आदि सभी क्षेत्रों में कनेक्टिविटी बढ़ाने की जÞरूरत पर बल दिया । अगला बिम्सटेक सम्मेलन श्रीलंका में आयोजित होने की घोषणा के साथ ही सम्मेलन का समापन हुआ ।
क्या है बिमस्टेक ?
६ जून १९९७ को बैंकॉक में बांग्लादेश, भारत, श्रीलंका और थाइलैंड इकनॉमिक कॉर्पोरेशन नाम से एक क्षेत्रीय समूह की स्थापना हुई थी । तब इन देशों के पहले नाम के अक्षरों के आधार पर इसका नाम द्यक्ष्क्त्(भ्ऋ रखा गया था. मगर २२ दिसंबर १९९७ को म्यांमार भी इसका पूर्णकालिक सदस्य बन गया । ऐसे में इसका नाम द्यक्ष्ःक्त्(भ्ऋ कर दिया गया ।
बाद में साल २००४ में नेपाल औरÞ भूटान भी इसके सदस्य बन गए. ऐसे में ३१ जुलाई २००४ को इसके नाम का अर्थ बदलते हुए ‘बे ऑफÞ बंगाल इनिशिएटिव फÞॉर मल्टी–सेक्टरल टेक्निकल एंड इकनामिक कोआपरेशन’ कर दिया गया । बिमस्टेक की स्थापना के साथ ही कई सवाल भी पैदा हुए । आखिर सार्क से इतर बिमस्टेक की आवश्यकता क्यों पड़ी, बिमस्टेक का लक्ष्य क्या है ? आदि ।
बिमस्टेक की स्थापना आज से २१ साल पहले १९९७ में हुई थी । मगर इसका वर्तमान स्वरूप २००४ में स्थिर हुआ जब सम्मेलन की प्रक्रिया और अन्य चीजÞें तय हुईं ।
बिमस्टेक की स्थापना और हाल में इसमें भारत की दिलचस्पी से यह तो स्पष्ट जाहिर होता है कि भारत सार्क की जगह बिमस्टेक को प्रोत्साहन दे रहा है । जिसकी पहली वजह भारत और पाकिस्तान के बीच के कटुतापूर्ण रिश्ते को लिया जा सकता है । वहीं एक सवाल यह भी है कि नेपाल के प्रधानमंत्री जहाँ सार्क सम्मेलन कराने के लिए प्रतिबद्ध थे वहीं उन्होंने बिमस्टेक के लिए कैसे स्वयं को तैयार किया । इन सवालों से इतर यह तो जाहिर है कि बिमस्टेक का यह सम्मेलन काठमान्डौ में शांतिपूर्ण तरीके से सफल हुआ । वैसे बिमस्टेक में अभी भी सार्क के कुछ देश शामिल नहीं हो पाए हैं जो हैं, पाकिस्तान, अफगानिस्तान और माल्दिभ्स ।
बिमस्टेक ने लगभग १४ एजेंडे तय किए हैं, जो आपस में आर्थिक और तकनीकी सहयोग बढ़ाने पर आधारित हैं । बिमस्टेक के सदस्य देशों में फ्री ट्रेड अग्रीमेंट का प्रस्ताव है ताकि आपस में व्यापार को बढ़ावा दिया जा सके । अभी इन देशों में आपस में इतना ट्रेड नहीं है । कुछ में है, जैसे भारत और श्रीलंका में, भारत और नेपाल में या म्यांमार और थाइलैंड के बीच, मगर भारत का थाइलैंड के साथ या नेपाल का बांग्लादेश के साथ उतना ट्रेड नहीं है ।
भारत की लुक ईस्ट नीति है । यह नीति नरसिम्हा राव के समय से शुरू हुई थी । पूर्व की तरफÞ देखने की पहल के तहत भारत ने बंगाल की खाड़ी से सटे देशों के साथ बिमस्टेक शुरू किया । आज इसमें सात देश हैं जिनकी पहुंच बंगाल की खाड़ी से है ः श्रीलंका, थाइलैंड, भारत, म्यांमार, बांग्लादेश । इनके अलावा नेपाल और भूटान जमीन से घिरे हुए हैं मगर उनका पोर्ट ऐक्सेस बंगाल की खाड़ी के पास है ।
ताजÞा सम्पन्न सम्मेलन में भारत का पूर्वी हिस्सा यानी असम, मणिपुर, नगालैंड और मिजÞोरम, जो बांग्लादेश और म्यांमार से लगता है तथा भारत, म्यांमार और थाइलैंड के बीच आपस में कनेक्टिविटी पर जोर दिया गया ।
इसके अलावा समुद्री यातायात का संपर्क भी बढ़ाने पर जÞोर दिया गया । ये सारे देश बंगाल की खाड़ी को छूते हैं ।
सम्मेलन का तीसरा अहम मुद्दा था आतंकवाद जिस पर विस्तार से चर्चा की गई और यह प्रतिबद्धता व्यक्त की गई कि आतंकवाद के खिलाफ एकजुट होकर लड़ा जाय ।
बिमस्टेक कितना सार्थक ?
नेपाल के पूर्व भारतीय राजदूत राकेश सूद का मानना है कि अगर भारत को इसे सक्रिय बनाना है तो इसके सचिवालय को बड़ा करना चाहिए. अभी ढाका में इसका सचिवालय है जहां १०÷१२ लोग हैं । उनके लिए ७ देशों की सरकारों से बड़े–बड़े मुद्दों पर बात करना मुश्किल हो जाता है । ऐसे में इस सचिवालय का विस्तार करना होगा इसे और तकनीकी रूप से बेहतर बनाना होगा ।
साथ ही उनका कहना है कि जापान, जिसके काफी अच्छे रिश्ते हैं इन सभी देशों से और इनमें जापान का आर्थिक सहयोग का इतिहास रहा है, उसे बिमस्टेक में शामिल किया जाए । ऐसा करने का उद्देश्य यह है कि अर्थ और तकनीकी का एक स्रोत जुड़े । बाकी जो भी देश हैं, वे बहुत आगे नहीं है. जापान के पास पूंजी भी है और टेक्नोलॉजी भी है ।
ऐसे में इससे भी कुछ फायदा हो सकता है । मगर किस शक्ल में जापान को जोड़ा जाय, यह कहना मुश्किल है । क्योंकि चीन भी इस क्षेत्र में इच्छुक है । तो कुछ देशों को लगता है कि एक देश को लाया जाएगा तो दूसरा भी आएगा तो फिर तनाव हो जाएगा । तो इन चीजÞों को भी देखना पड़ेगा ।
वहीं बिमस्टेक सम्पन्नता को लेकर नेपाल के एक महकमे में असंतुष्टि भी नजर आ रही है । आलोचकों का मानना है कि प्रधानमंत्री ओली को बिमस्टेक से अधिक सार्क पर ध्यान देना चाहिए । क्योंकि सार्क सम्मेलन कराना नेपाल की जिम्मेदारी है । इनका मानना है कि कहीं प्रधानमंत्री ओली भारतीय प्रधानमंत्री के दवाब में आकर तो बिमस्टेक में अपनी दिलचस्पी नहीं दिखा रहे ?
बिमस्टेक की समपन्नता को नेपाल की नैतिक जिम्मेदारी से जोड़ते हुए यह माना जा रहा है कि नेपाल को बिमस्टेक से अधिक सार्क पर ध्यान देना चाहिए । क्योंकि अठारहवाँ सम्मेलन काठमान्डौ में सम्पन्न हुआ था और उन्नीसवाँ सम्मेलन पाकिस्तान में होना तय था । जिसे आतंकवाद में पाकिस्तान की सक्रियता देखने के कारण भारत नकार चुका है । परिणामस्वरूप सार्क सम्मेलन स्थगित हो गया । आलोचकों का मानना है कि अगर नेपाल बिमस्टेक को अधिक बढ़ावा देता है तो उस पर सार्क को खत्म करने का आरोप लग सकता है । जिससे नेपाल को बचना चाहिए ।
इस आलोचना के पीछे भारत विरोधी मानसिकता ही काम कर रही है जिनको यह लगता है कि यह भारत का साथ देना है जिससे नेपाल की राष्ट्रवादिता को चोट पहुँची है । किन्तु गहराई से देखा जाय तो जिस देश पर सिर्फ भारत ही नहीं विश्व के कई देश आतंकवाद को प्रश्रय देने का आरोप लगा चुके हैं, उसका साथ देना नेपाल के लिए भी कभी हितकर साबित नहीं हो सकता । एक तरफ पाकिस्तान है जिस पर आतंकवाद को साथ देने का आरोप है तो दूसरी तरफ चीन है जो विस्तारवादी नीति के तहत कर्ज का चारा फेक कर अविकसित देशों को चुँगुल में फसाने की चाल में माहिर है । इन दोनों से स्वयं को सुरक्षित रखकर नेपाल अपनी विकास की राह को कैसे तय कर सकता है, यह नेपाल को अपनी विकास नीति में शामिल करना होगा और देश के हित को देखकर अपने कदम उठाने होंगे जिसके तहत यह माना जा सकता है कि बिमस्टेक को सफलतापूर्वक सम्पन्न कराना नेपाल का एक सार्थक पहल है ।

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