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हिमालिनी, अंक डिसेम्वर 2018,नेपाल बहुसांस्कृतिक देश है । यहाँ के दर्जनों सुन्दर संस्कृति में एक नेवारी संस्कृति उल्लेखनीय और जीवन्त संस्कृति है । वर्तमान नेपाल की राजधानी तथा ऐतिहासिक नेपाल की पहचान काठमांडौं उपत्यका नेवारी संस्कृति की पहचान स्थल है । मूलतः हिन्दू और बौद्ध धर्म से प्रभावित नेवारी संस्कृति स्वयं में पूर्ण और सघन रूप में व्यवस्थित संस्कृति है । इसका अपना संवत् (क्यालेन्डर) है, अपनी वेश भूषा, भाषा तथा विशेष परम्पराएँ हैं और अपना त्योहार और पूजापद्धति है । नेवारी संस्कृति धनी, संस्कारित और मनमोहक संस्कृति है । अन्य संस्कृतियों के साथ भगिनीवत सम्बन्ध और सहिष्णुता इसकी मुख्य विशेषता है । अन्य संस्कृतियों की तरह इसकी कुछ विकृतियाँ भी हैं । कर्म के आधार पर जातिगत बँटवारे का नाम रखा गया है जैसे कंसाकार, ताम्राकार आदि । नेवाडी समुदाय के सांस्कृतिक पर्व त्योहार सर्वसाधारण के लिए अत्यन्त मंहगा और खर्चीला है बावजूद इसके इसकी परम्पराएँ मोहक और मनभावन हैं ।

नेवारी संस्कृति का अपना संवत् है । जिसे नेपाल संवत् कहते हैं । यह संवत ११३३ वर्ष पुराना संवत् है । जिसे राष्ट्रीय विभूति शंखधर साख्वा ने इस्वी सम्वत् ८७९, अक्टुबर २० में शुरु किया है । विश्व में मूलतः तीन तरह के संवत् हैं, सौर्य संवत् (क्यबिच ऋबभिलमभच), चान्द्र संवत (ीगलबच ऋबभिलमभच) और चान्द्र÷सौर्य संवत् (ीगलष्कयबिच ऋबभिलमभच) । सूर्य या चन्द्रमा की गति पर आधारित होकर इनका समय विभाजित किया जाता है । नेपाल संवत् चान्द्र÷सौर्य संवत् है । यह चन्द्रमा की गति पर आधारित है । नेपाल में जो आमतौर पर प्रयोग किया जाता है वह विक्रम संवत् सौर्य संवत् है । सौर्य संवत में ३६५ दिन १५ घटी २२ पला और ५७ विपला (ढाइ घटी का एक घन्टा होता है और दिन में ६० घटी होता है । ६०÷२.५‌‌.२४ का एक वर्ष होता है लेकिन कैलेन्डर में ३६५ या ३६६ दिन होते हैं यानि चन्द्र संवत में कुल ३५४ दिन २२ घटी १ पला २३ विपला का एक वर्ष होता है । इस तरह एक वर्ष में दोनों संवत के बीच करीब ११ दिन का अन्तर होता है । इसे हरेक तीन वर्ष में पञ्चाङ्ग में एक चन्द्र महीना जोड़कर सौर्य पञ्चाङ्ग के साथ मिलाया जाता है । इसे चन्द्र–सौर्य संवत् कहते हैं । यही बढे हुए महीने को अधिक मास, मलमास, पुरुषेत्तम मास कहते हैं । नेपाल संवत में १२ महीने हैं जो कार्तिक महीना के शुक्लपक्ष से शुरु होता है । इसे ‘कछला’ कहते हैं । क्रमशः थिन्ला, पोहेला, सिल्ला, चिल्ला, चौला, बछला, तछला, दिल्ला, गुँला, यँला तथा कौला ११ महीने हैं । मलमास या अधिक मास को ‘अनला’ कहते हैं । हरेक महीने की अपनी विशेषता और पर्व त्योहार भी हैं ।

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नया वर्ष को नेवारी संस्कृति में बहुत धूमधाम से मनाया जाता है । नेवारी नयाँ वर्ष ५ दिन तक विभिन्न सांस्कृतिक विधि के साथ मनाया जाता है । पुराने वर्ष के अन्तिम ३ दिन और नयाँ वर्ष के शुरु के २ दिन को मिलाकर ५ दिन तक मनाए जाने वाले नयाँ वर्ष के उत्सव को नेवार ‘स्वन्ति’ कहते हैं । यह अन्य सनातन संस्कृति में मनाया जाने वाला यमपञ्चक (तिहार) के समय ही मनाया जाता है । इसमें मृत्युदेव अर्थात् यमराज की विशेष पूजा होती है । पहले और दूसरे दिन क्रमशः कौए और कुत्ते की पूजा होती है । नेपाली संस्कृति आदिम युग से ही प्रकृतिपूजक है । प्रकृति के हरेक अङ्ग और स्रोत के प्रति अगाध आस्था, सम्मान और संरक्षणमुखी सोच नेपाली सनातन संस्कृति की विशेषता है, जो नेवारी संस्कृति में भी देखने को मिलती है । यह निर्माणमुखी और प्रकृतिप्रेमी संस्कृति है । तीसरे दिन स पूजा अर्थात् गाई(गाय) पूजा होती है । नेवारी संस्कृति में गाय को बहुत महत्तव दिया गया है । गाईजात्रा एक प्रमुख नेवारी त्योहार है जिसे बहुत धूमधाम से मनाया जाता है ।
स पूजा की शाम लक्ष्मी देवी ‘लक्ष्मीद्यः’की पूजा होती है । घर के भीतर और बाहर विशेष प्रकार का अष्टदल (कमल पुष्प की मण्डला) तथा रङ्गीन चित्र बनाकर लक्ष्मी की पूजा आराधना होती है । दाँए हाथ में ज्वाला सहित आइना (ज्वाला न्याकँ) तथा बाँए हाथ में चन्दन अबीर से सजा विशेष प्रकार के कलश (सिन्हस्मू) के साथ गहना सुसज्जित लक्ष्मी की कल्पना की जाती है । उसके आसपास धनकुबेर के अलावा ‘ख्यः’ (एकप्रकार का हिममानव)का चित्र भी उकेरा हुआ होता है । लक्ष्मी को सनातन धर्म में ’कमलासना’ (कमल के फूल पर विराजमान) कहा गया है । इस पूजा में घर की महिलाओं के साथ सभी सदस्य भी भाग लेते हैं ।
चौथा दिन विशेष दिन होता है । क्योंकि यह नव वर्ष का पहला दिन होता है । ‘कछलाथ्व पारु’ अर्थात् कछला (कार्तिक) महीना के प्रतिपदा (कार्तिक शुक्लप्रतिपदा) का दिन ‘म्ह’ पूजा का होता है । सम्भवतः ‘अहम्’ (मैं) संस्कृत शब्द से म्ह शब्द का विकास हुआ है । यह विशेष प्रकार की पूजा सम्भवतः नेवारी संस्कृति में ही सिर्फ जीवित है । नव वर्ष की शुरुआत में अपनी आत्मा को साक्षी मानकर आत्मविशलेषण का कार्य इसमें होता है । संस्कृत में कहा गया है कि ‘शरीरमाद्यं खलु धर्मसाधनम्’ अर्थात् शरीर ही धर्म का पहला साधन है’ । इसलिए शरीर की रक्षा आवश्यक है । वर्ष भर भूलवश, वाध्यतावश या जाने अनजाने किए गए पाप या प्रायश्चित्त के लिए और आत्मा की शुद्धि के लिए ऐसी पूजा की जाती है । सनातन धर्म में कहा गया है कि आत्मा में ही परमात्मा का वास होता है । इसी आधार पर म्ह पुजा की जाती है । नेवारी संस्कृति में मातृशक्ति का बहुत महत्व है । अष्टमातृका को अजिमा कहते हैं ।
पाँचवे दिन तिहार (दीवाली) और भाई दूज जैसा ही नेवारी में किजपूजा अर्थात् भाइपूजा होती है । जिसमें भाई की सुख शान्ति समृद्धि की प्रार्थना की जाती है । और उन्हें सगुण दिया जाता है जिसमें पाँच प्रकार के चीन शामिल होते हैं जो पृथ्वी, तेज, जल, वायु और आकाश का प्रतिनिधित्व करते हैं । ये हैं शराब(तेज), माँस(पृथ्वी), मछली–पानी), बारा जो उड़द के दाल से बनता है(हवा) और अण्डा (आकाश) है । नेवारी संस्कृति एक समृद्ध और सुंदर संस्कृति है ।

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