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इंसाँ की ख़्वाहिशों की कोई इंतिहा नहीं, दो गज़ ज़मीं भी चाहिए दो गज़ कफ़न के बाद : कैफी आजमी

 

अपने गीतों और गजलों के माध्यम से पूरी दुनिया को दिशा दिखाने वाले प्रख्यात शायर कैफी आजमी आज भी लोगों के दिलों में राज करते हैं। महज 11 साल की उम्र में ही उनकी पहली गजल ‘इतना तो जिंदगी में किसी की खलल पडे, हंसने से हो सुकून रोने से कल पडे’ दुनिया के सामने आ गई थी। 19 साल की ही उम्र में शेरो और शायरी के शौक उन्हें मुंबई महानगर खींच ले गई। इस दौरान उन्होंने भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी से भी अपना रिश्ता जोड़ लिया। उन्होंने 1942 के भारत छोडा़े आंदोलन में भी बढ़-चढ़ कर हिस्सा। 1942 तक कैफी आजमी शायरी की दुनिया में काफी मशहूर हो चुके थे। इसी बीच उन्होंने निकहत से निकाह कर उन्हें अपना जीवनसाथी बनाया। 1952 में पहली बार फिल्मों में गीत लिखना शुरू किया जो फिर रुकने का नाम ही नहीं लिया। ‘बुजदिल’, ‘हंसते जख्म’, ‘हिन्दुस्तान की कसम’, ‘कागज के फूल’, ‘शोला और शबनम’ जैसी तमाम फिल्मों में अपने गीत लिखे। 1973 में मुंबई को छोडकर वापस अपने गांव आ गए। 10 मई 2002 को कैफी आजमी ‘इस दुनिया से विदा हो गए।

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इतना तो ज़िंदगी में किसी के ख़लल पड़े

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हँसने से हो सुकून न रोने से कल पड़े

इंसाँ की ख़्वाहिशों की कोई इंतिहा नहीं

दो गज़ ज़मीं भी चाहिए दो गज़ कफ़न के बाद

झुकी झुकी सी नज़र बे-क़रार है कि नहीं

दबा दबा सा सही दिल में प्यार है कि नहीं

बस इक झिजक है यही हाल-ए-दिल सुनाने में

कि तेरा ज़िक्र भी आएगा इस फ़साने में

ये बुझी सी शाम ये सहमी हुई परछाइयाँ
ख़ून-ए-दिल भी इस फ़ज़ा में रंग भर सकता नहीं
आ उतर आ काँपते होंटों पे ऐ मायूस आह
सक़्फ़-ए-ज़िन्दाँ पर कोई पर्वाज़ कर सकता नहीं
झिलमिलाए मेरी पलकों पे मह-ओ-ख़ुर भी तो क्या?
इस अन्धेरे घर में इक तारा उतर सकता नहीं

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लूट ली ज़ुल्मत ने रू-ए-हिन्द की ताबिन्दगी
रात के काँधे पे सर रख कर सितारे सो गए
वो भयानक आँधियाँ, वो अबतरी, वो ख़लफ़शार
कारवाँ बे-राह हो निकला, मुसाफ़िर खो गए
हैं इसी ऐवान-ए-बे-दर में यक़ीनन रहनुमा
आ के क्यूँ दीवार तक नक़्श-ए-क़दम गुम हो गए

देख ऐ जोश-ए-अमल वो सक़्फ़ ये दीवार है
एक रौज़न खोल देना भी कोई दुश्वार है

तुम बिन जीवन कैसा जीवन
फूल खिलें तो दिल मुरझाए
आग लगे जब बरसे सावन

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रूठे तुम जबसे पिया, रूठे तुम जबसे पिया
सूना-सा है मन का डेरा, बैरी है दुनिया

बाँटे कोई क्यों दुख मेरा, 
अपने आँसू, अपना ही दामन
तुम बिन जीवन कैसा जीवन

कैसे दिल बहले हँसना चाहूँ, रोना आए
सूना जग सारा, कुछ न सूझे, कुछ न भाए

तोड़ गए तुम मन का दर्पण

तुम बिन जीवन कैसाजीवन

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