अपने स्वभाव में जीना श्रेष्ठकर है, दूसरों का धर्म अपनाने की जरुरत नहीं : अभिषेक दूबे
हिमालिनी काठमांडू तथा पं० तिलकराज शर्मा स्मृति ट्रस्ट दिल्ली द्वारा आयोजित वरिष्ठ नागरिक सम्मान एवं पुस्तक परिचर्चा में मुख्य अतिथि के रूप में भारतीय दूतावास के पीआईसी विंग के प्रथम सचिव श्री अभिषेक दूबे जी कि गरिमामयी उपस्थिति थी । प्रस्तुत है कार्यक्रम में अभिव्यक्त आपके सार्थक मंतव्य का संपादित अंश—
नेपाल–भारत की साझी संस्कृति हमारी विरासत है । हम लोग जीवन में जो अनुभव करते हैं, उसमें मैंने दो तरह की सोच देखी है । एक सोच है, जो हमारे अस्तित्व से जुड़ी हुई है, स्वभाव से जुड़ी हुई है । यह दुनिया का एक रिश्ता है, जो कहता है कि अपने स्वभाव की रक्षा करो । दूसरी सोच है– उपयोगितावाद । जीवन में जो उपयोगी है, जो बिक रहा है, वह सबसे महत्वपूर्ण है । इन दोनों सोच में हमेशा संघर्ष रहा है । हां, स्वभाव और उपयोगिता के बीच हमेशा संघर्ष चलता आया है । हम लोग खुद अपनी जिन्दगी का अनुभव लें, कुछ चीजें अच्छी लगती है पर समय नहीं होता उनके साथ बिताने का । क्योंकि उसकी उपयोतिगा नहीं होती । जीवन के बाजार में वह चीज बिकती नहीं । पर दुःख होता है अन्दर से, क्योंकि वह हमारे स्वभाव का हिस्सा होती है । अपने बड़ों के साथ हम वक्त गुजारना चाहते हैं पर विवशता होती है कि हम उनसे दूर चले जाते हैं ।
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मै वरिष्ठ जनों का हार्दिक अभिनन्दन करता हूं नेपाल में और यह कहता हूं कि जब आप घूमेंगे पशुपति नाथ में, दर्शन करने के लिए जाएंगे, एक साझा संस्कृति की विरासत आप देखेंगे भारत और नेपाल के बीच में । आप जो संस्कृति देखेंगे, वह नेपाल और भारत की साझा है और यह संस्कृति हमारा स्वभाव है, जिसे हम लोगों ने संरक्षित रखा है । जब आप यहां के नेवारी समाज में जाएंगे और वहा देखेंगे तो आप पाएंगे कि किस प्रकार से वरिष्ठजनों का आदर होता है । यह उनके संस्कार का हिस्सा रहा है । उनके यहां कई संस्कार है, जैसे हमारे यहां होते हैं, जिसमें वरिष्ठजनों को इज्जत दी जाती है । मैं कहना यह चाहता हूं कि भारत और नेपाल की संस्कृति में स्वभाव का संरक्षण होता है । जिसकी उपयोगिता नहीं है, उसका संरक्षण करना भी हमारी परम्परा है । यही हमने अपने जीवन में अपने ऋषियों–मुनियों से प्राप्त की है । भाषा का संघर्ष है क्या ? नेपाली हो, हिन्दी हो या अन्य भी भाषाएं हो, आखिर हम झेल क्या रहे हैं ? हम एक ही चीज झेल रहे हैं कि बाजार में जो भाषा उपयोगिता के साथ जुड़ी है, रोटी के साथ जुड़ी है, वह चलती है । जो भाषा उपयोगिता के साथ नहीं जुड़ी, जिससे तनखाह घर नहीं आती, उसकी इज्जत नहीं है । पर जब कोई भाषा प्रयोग करता है, तो उसमें उसके गली की महक, उसका खानपान, उसकी संस्कृति, उसके मां की जो लोरियाँ थी, वह सब आप को पता चल जाती है, एक ही बार में । हिन्दी में एक शब्द है– साढूभाई । इसका अंग्रेजी अनुवाद है ही नहीं । मौसा जी का अंग्रेजी अनुवाद है ही नहीं । अगर कोई यह शब्द प्रयोग करता है तो पता चलता है कि जहां रिश्ते इतने ज्यादा बढ़ गए थे, लोगों ने हर रिश्ते के लिए एक शब्द रखा । जो अंकल–आंटी प्रयोग करते हैं वे लोग जानते हैं कि बात वही तक थी । लोग उससे ज्यादा आगे बढ़े नहीं थे । और दोनों में कोई तुलना नहीं, और गलत भी नहीं है, जीने के तरीके हैं । तो भाषा जो है, वह यही लड़ाई लड़ रही है । हिन्दी, नेपाली और सारी भाषाएं । सच्चिदानन्द मिश्र जी भी इस लड़ाई का हिस्सा है । बड़े ही तटस्थता के साथ, मेहनत करते हुए, वह अपने मिशन पर हैं, अपने विचार पर अडिग हैं । जिस चीज से उन्हें प्रेम है, जिस चीज में वह महसूस करते हैं कि उनके स्वभाव से जुड़ी है, कितनी भी बाधा हो, उसमें कार्य करते हैं, हमारे जीवन में भी, यही अवस्था है । इसकी दूसरी कड़ी है– काव्य । काव्य की बहुत उपयोगिता नहीं है, जीवन में । यह किताबें, पीएचडी, थीसिस की है । पर काव्य की क्या उपयोगिता है !? जो आदमी थकान भरा बजार से होकर घर आता है, बोलने के लिए भी उसके अन्दर साहस और ऊर्जा नहीं होती है, वह जो भाव व्यक्त करता है, वही काव्य है । मैं कल एक कविता पढ़ रहा था, गोरख पाण्डे की । बडी छोटी सी कविता थी, नोकरशाहों को ज्यादा पसंद आती है, वह कविता– राजा ने कहा रात है रानी ने कहा रात है मन्त्री ने कहा रात है सन्त्री ने कहा रात है यह आज दिन की बात है । यह चार लाइन बडी सरल–सी थी । उपयोगिता अपनी तरफ खींचती है, बजार उनको अपनी तरफ खीचती है । पर हमारी संस्कृति शुरु से यह कहती आई है कि उपयोगिता नहीं स्वभाव को देखो । उसका सबसे बड़ा कोई उदाहरण है तो वह गीता है । अर्जुन ने यही कहा, कृष्ण से– सामने सेना खड़ी है, जिसमें युद्ध होगा, मारकाट होगी, सत्ता मिल जाएगी । इसकी उपयोगिता क्या है ? कृष्ण ने कहा कि यह चालाकी है । क्षत्रिय हो, युद्ध करो । अपने स्वभाव में जीना श्रेष्ठकर है, दूसरों का धर्म अपनाने की जरुरत नहीं है । स्वभाव का अर्थ यही है । बस ऐसे ही हम जीते हैं और अपने अपने कर्मों में रत रहते हैं । एक नई पहल के लिए हिमालिनी को अनन्त शुभकामनाएँ ।


