Sat. Sep 12th, 2026
English मे देखने के लिए क्लिक करें

भारत में वंशवाद राजनैतिक श्राप : अजयकुमार झा

 

अजयकुमार झा, जलेश्वर | भारत में राजवंश की स्थापना के साथ ही वंशवाद का भविष्य तय हो गया होगा, इसे मनु के वंश से शुरू होना मान सकते हैं. जिसमे एक के बाद एक कई वंशों तक होने वाले राजाओं ने राज किया. ये इक्ष्वाकु वंश था जिसके पहले राजा इक्ष्वाकु थे जो सूर्य वंश के जनक थे. इक्ष्वाकु ने कौशल राज्य पर शासन किया था।
शासन की एक ऐसी पद्धति, जिसमें एक ही परिवार, वंश या समूह से एक के बाद एक कई शासक बनते जाते हैं, उसे वंशवाद या परिवारवाद कहते हैं। वंशवाद, भाईभतीजावाद का श्रोत है। वैसे लोकतन्त्र में वंशवाद के लिये कोई स्थान नहीं होना चाहिए किन्तु फिर भी अनेक देशों में अब भी वंशवाद हाबी है। वंशवाद, धूर्तों के द्वारा किया गया षडयंत्रयुक्त आरक्षण है। ‘राजनीतिक परिवारों से आने वाले 20 या 30 साल की उम्र के युवाओं को राजनीति में प्रवेश का सीधा अर्थ है, वंशवाद के नामपर बेहतर ओहदा, ताकत और कमाई; बनिस्पत इसके कि वो बिजनेस, बैंकिंग, प्रशासनिक सेवा या किसी और पेशे में जाते।’अतः इसे राजतन्त्र का परिष्कृत रूप कहा जा सकता है। वंशवाद, आधुनिक राजनैतिक सिद्धान्तों एवं प्रगतिशीलता के विरुद्ध है। वंशवाद के कारण नये लोग राजनीति में नहीं आ पाते।
वंशवाद सच्चे लोकतन्त्र को मजबूत नहीं होने देता। अयोग्य शासक देश पर शासन करते हैं जिस में प्रतिभावान को पिछे धकेल दिया जाता है। वही सामान्य व्यक्ति और बुद्धि को बढ़ावा मिलता है। इसमे समान अवसर का सिद्धान्त पीछे रह जाता है तथा ऐसे कानून एवं नीतियाँ बनायी जाती हैं जो वंशवाद का भरण-पोषण करती रहे। परिणाम में आम जनता में कुंठा की भावना घर करने लगती है और लोग जीवन से निरास होने लगते हैं। समाज में रुग्नता और दीनता का प्रभाव बढ़ने लगता है।
दुष्प्रचार (प्रोपेगैण्डा), चमचातंत्र, धनबल एवं भ्रष्टाचार को बढ़ावा दिया जाता है ताकि जनता का ध्यान वंशवाद की कमियों से दूर रखा जा सके।
जनता में स्वतन्त्रता की भावना की कमी बनी रहती है। देश की सभी प्रमुख संस्थाएँ पंगु बनाकर रखी जाती हैं।
आधुनिक भारत में वंशवाद के पितामह जवाहर लाल नेहरु को माना जाता है। इंदिरा गांधी से राजीव गांधी, सोनिया गांधी और राहुल गांधी तक सत्ता का आनन्द उठाते रहे हैं। अमेरिका के बर्कले स्थित यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया में राहुल गांधी ने वंशवाद का समर्थन करते हुए बयान दिया था।
इसी प्रकार बाल ठाकरे, लालू यादव, शरद पवार, शेख़ अब्दुल्ला, फ़ारुख़ अब्दुल्ला, उमर अब्दुल्लाह, महवुवा मुफ़्ती, माधवराव सिंधिया, मुलायम सिंह यादव के साथहि भारत का लगभग हर प्रदेस और ज्यादातर पार्टियों में वंशवाद का बोलबाला दिखाई दे रहा है। कश्मीर में अब्दुल्ला और सईद परिवार, पंजाब में बादल परिवार, हरियाणा में हुडा और चौटाला परिवार, राजस्थान में सिंधिया परिवार, महाराष्ट्र में बाल ठाकरे और शरद पवार परिवार, ओडिशा में पटनायक परिवार, झारखण्ड में सोरेन परिवार, दक्षिण के राज्यों में भी करूणानिधि परिवार, मारन और देवेगौड़ा परिवार, और न जाने कितने परिवार…।
राजनीति में वंशवाद केवल भारत तक ही सीमित नहीं है. पाकिस्तान में भुट्टो परिवार. नेपाल में कोईराला परिवार. बांग्लादेश में शेख हसीना और खालिदा जिया परिवार. श्रीलंका जयवर्धने और भंडारनायके परिवार. अमेरिका में बुश, केनेडी और क्लिंटन वंश का दबदबा चला आ रहा है।
इससे लोकतंत्र के समानांतर राजशाही की झलक भी मिलने लगी है। क्योंकि फर्क है तो इतना ही कि पहले राजे महाराजे अपने उत्तराधिकारी की घोषणा करते थे, भारत के लोकतंत्र में आज यह काम उनके लिए चाहे, अनचाहे ढंग से जनता या वोटर करते हैं।वंशवाद सिर्फ लोकतंत्र का नकारात्मक ही नहीं है बल्कि यह असमानता का  वो आधार  हैं जो किसी व्यक्ति विशेष को ही नहीं बल्कि पूरे समाज को आगे बढ़ने से रोकता है। सवाल यह उठता है कि प्रज्ञा और सृजनशील क्षेत्रों को लात मारकर आखिर ए वंशवाद के पोषक अपने लाडले को राजनीति में ही क्यों लाते है? उत्तर सीधा है: – इनके संतान इतने नालायक मूढ़ होते हैं कि पढ़ाई और सृजनशीलता जैसे शुक्ष्म तत्व इनके क्षमता से वाहर है, या कि ए देश को लुटकर कम समय में शक्ति संपन्न होना चाहते हैं। वैसे, इन बातों पर ध्यान दिया जा सकता है:-
° किसी खास परिवार से होने के नाते क्षेत्र व समाज में पारिवारिक दबदबा रखने में आसान होता है।
• खानदानी और जातिगत समर्थन विरासत में मिल जाता है।
• राजनीति में प्रवेश के लिए बिना रोक-टोक ऊँचे ओहदे मिल जाते हैं।
• कोई शैक्षणिक योग्यता की आवश्यकता नहीं पड़ती।
• जोखिम के मुकाबले बेहतर इनाम मिलने की संभावना रहती है।
• काफी सारी मुफ्त सुविधाएं और रियायतें उपलब्ध रहती है…..।
इक्कीसवी सदी में भी वंशवाद का पोषण भारतीय लोकतंत्र के लिए दुर्भाग्य ही कहा जाएगा कि जिन दलों ने अपनी घोषित विचारधारा के उलटे लगातार काम किया है, वंशवाद और परिवारवाद को बढ़ावा दिया है, अकूत संपत्ति इकट्ठी की है उसे भारतीय मतदाताओं का एक वर्ग यह सब जानते हुए भी उन पर भरोसा जताता है और अपना भाग्यविधाता बनाता है। साथहि भारत के एक बौद्धिक वर्ग को इन्हीं दलों में भारत का भविष्य और गरीबों का संरक्षण दिखाई देता है। शायद यही कारण है कि आजादी के सत्तर साल की यात्रा के वावजूद भी भारत गरीब, अशिक्षित और विकासशील ही रहा। तो क्या, भारतीय मतदाता अब भी जागरूक नहीं हो पाएगा? क्या इन राजनीतिक बुराइयों को मिटाने के लिए हम सक्षम नहीं हैं ? जिसप्रकार आजादी के वाद हमने राजे राजबाड़े को मटियामेट किया था,उसी प्रकार इन वंशवाद रूपी मुठ्ठीभर राजबाड़े के अस्तित्व को नष्ट करना होगा।
अजय कुमार झा

About Author

आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

WP2Social Auto Publish Powered By : XYZScripts.com