Sat. Jan 18th, 2020

नेपाल के न्यायालय पर एक नजर : चन्दा चौधरी

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हिमालिनी अंक जुलाई २०१९ |हाल ही मे संघीय लोकसेवा आयोगद्वारा ७५३ स्थानीय तह में कर्मचारी नियुक्ति के लिए विज्ञापन लाया गया था जो संविधान में किए गए व्यवस्था के विरुद्ध लाया गया था । विज्ञापन के विरुद्ध रिट दायर किया गया । सड़क प्रदर्शन भी जोरशोर से हुआ । विश्लेषण करने से साफ पता चलता है कि यह नेपाल के संविधान और संघीय लोकसेवा आयोग एन के मर्म के विपरीत है । संविधान की व्याख्या करने वाला सम्मानित सर्वोच्च अदालत कैसे संविधान के मर्म की व्याख्या नहीं कर पाया यह चर्चा का विषय बना हुआ है । न्यायालय की नीयत मे खोट तो नहीं है ? खुद इस मुद्दा पर बहस करने वाले अधिकतम वकीलों का बयान है । वास्तव मे न्याय सम्पादन में नेपाली न्यायालय का किस तरह का अभ्यास रहा है और लोगों का न्यायालय के प्रति विमति के कारण इसपर एक नजर डालना स्वाभाविक महसूस होता है ।

राजा हो या फकीर । जिस किसी को भी न्याय चाहिए उसे न्यायालय की शरण में जाना पड़ता है । इक्कीसवी सदी में सम्भवतः दुनिया के हरेक देश में यही व्यवस्था है । और नेपाल मे भी यही व्यवस्था है । नेपाल मे कितने को न्याय प्राप्त होता है और कितने लोगों ने न्याय को खरीदा है इसकी चर्चा इस आलेख में नहीं की जा रही है । और नेपाल का न्यायालय कितना समावेशी है यह चर्चा भी करना इस लेख का उद्देश्य नहीं है । परंतु न्यायालय द्वारा किए गए फैसले के कार्यान्वयन की अवस्था और न्यायालय की राजनीतिक साँठगाँठ पर चर्चा अभी के सन्दर्भ में करना उचित है ।

पिछले समय आए आँकडेÞ के अनुसार देश मे सुशासन कायम करने वाली निकाय के विभिन्न मन्त्रालय और अख्तियार दुरुपयोग अनुसन्धान आयोग की तरफ से ही न्यायालय के फैसला का कार्यान्वयन नही किया जाता है । विभिन्न मन्त्रालय के नाम पर सर्वोच्च न्यायालय द्वारा किए गए फैसलों का २० वर्ष बीत जाने के बावजूद भी मन्त्रालय द्वारा अनदेखा किया जा रहा है । प्रधानमन्त्री तथा मन्त्री परिषद के कार्यालय ने कुल २३ मुद्दाें में फैसला कार्यान्वयन नही किया है । वैसे ही गृहमन्त्रालय ने २९, वन, शिक्षा, स्वास्थ्य, महिला बालबालिका मन्त्रालय ने कुल २५, २१, १८, १२ मुद्दे क्रमशः कार्यान्वयन नहीं किया है । यह आँकड़ा अपने आप मे लज्जास्पद ही नही चिन्ताजनक भी है । जिम्मेदार कहलाने वाली राजनीतिक दल के नेता मन्त्री का पद हासिल करते हैं और सार्वजनिक सरोकार के मुद्दों का अनदेखा करने का मतलब आमजनता की भावनाओ से खेलने जैसा माना जाना चाहिए । इतना ही नहीं यह अवस्था आमजन में न्यायालय की निरीहता का प्रत्यारोपन करवाता है और अदालत का फैसला न मानने से भी होगा ऐसी नकारात्मक भावना का प्रवेश कराता है आमजनता के जेहन मे । और ऐसी परिस्थिति के कारण नेपाली न्यायालय का भद्दा नमूना विश्व के समक्ष प्रस्तुत कर रहा है ।

न्यायालय से सम्बन्धित प्रतिपादित सिद्धान्तों की कमी नहीं है । एक सिद्धान्त है कि न्याय सिर्फ सम्पादन कर देने से नहीं होता, किया गया न्याय दिखना भी चाहिए । कहा यह भी जाता है कि कानून सिर्फ साधन है, अपने आप में साध्य नहीं है और होना भी नहीं चाहिए । कानूनरूपी साधन का साध्य का अर्थ ही न्याय होता है । कानूनी पण्डित लॉर्ड डेनिंग के अनुसार कानूनी शासन का दो पक्ष होता है । पहला तो कानून शक्ति का स्वेच्छाचारी प्रयोग को होने से रोकता है । दूसरा शक्ति का स्वेच्छाचारी प्रयोग अगर होता है तो कानूनी उपचार प्रदान करता है । स्वेच्छाचारी प्रयोग का अर्थ यह होता है कि अदालत वा न्याय सम्पादन करने वाली अर्धन्यायिक निकाय हो या दूसरा, प्रचलित कानून या स्थापित नजीर के बर्खिलाप के आधार पर न्याय सम्पादन करता है तो उसको स्वेच्छााचारी प्रयोग कहा जाता है । फैसलों को अगर अक्षरशः पालना नही किया गया है तो उसे न्यायालय प्रति दिखाया गया स्वेच्छाचारिता के रूप मे लेना चाहिए । और ऐसा होना लोकतन्त्र मे विधि के शासन के ऊपर सीधा प्रहार के रूप में लेना चाहिए ।

इसी सन्दर्भ मे न्यायपालिका के स्वतन्त्रता सम्बन्धी संयुक्त राष्ट्रसंघीय आधारभूत सिद्धान्त के अनुसार न्यापालिका की स्वतन्त्रता राज्यद्वारा प्रत्याभुत किया जाएगा और संविधान में या देश के कानून में इसकी व्यवस्था की जानी चाहिए कह कर स्पष्टीकरण किया गया है । न्यायपालिका का स्वतन्त्रता का आदर और परिचालन करना सभी सरकारी और अन्य संस्थाओ का दायित्य भी माना जाता है । नेपाल मे न सिर्फ अदालत बल्कि आम जनता को न्याय मिले कहकर आशा लगाए संबैधानिक संस्थाओ की ओर से की गयी सिफारिस भी सिंह दरबार के रद्दी टोकरी में फेकने की प्रथा है ।

राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग २०७३÷०७४ (बिसं) के प्रतिवेदन को देखा जाय तो मानव अधिकार उल्लंघन, हनन से सम्बन्धित मुद्दो में नया और पुराना मुद्दा के ऊपर अनुसन्धान कर के क्षतिपुर्ति एवं कानूनी कारवाही के लिए किए गए सिफारिसों का कार्यान्वयन नही किया गया है । आयोग ने नेपाल सरकार को किए सिफारिसो में केवल १४.३ प्रतिशत पूर्ण कार्यान्वयन, ४७.९ प्रतिशत आंशिक कार्यान्वयन और ३७.८ प्रतिशत सिफारिस के ऊपर किसि भी प्रकार का सम्बोधन ही नही किया गया है ।

नेपाल के न्यायालय में वास्तव मे समस्या भी कुछ ज्यादा ही है । जिसका यथोचित समाधान आवश्यक है । जैसे कि फैसला कार्यान्वयन का अर्थपूर्ण तरीके से कार्यान्वयन करने के लिए न्यायालय के पास सक्षम और निडर जनशक्ति का अभाव होना । यह इस अर्थ में कि न्यायालय सम्बद्ध कर्मचारी भी राजनीतिक दल के अघोषित भातृ संगठन ट्रेड यूनियन से जुड़ना । यह यूनियन भी एक प्रकोप की तरह है । राजनीतिक दल के नेता वा दल विशेष के साथ सम्बन्धी मुद्दा हो तो अपने नजदीक के नेताओं के इशारे पर काम करती है ।

 

दूसरा कारण कहे तो कार्यपालिका की ओर से आवश्यक सहयोग न होना । उसीतरह अदालत के फैसला बमोजिम फैसला लागु हुआ या नहीं हुआ उसके पीछे के कारण और समाधान के उपाय के बारे में अध्ययन मुल्यांकन अदालत की लापरवाही भी एक कारण माना जा सकता है । वैसे ही अदालत से हुए फैसले का मुद्दा अन्तिम हो जाने के बाद भी न्याय प्राप्त करने में देरी लगना ही है और यह मानसिकता अभी भी जारी है । समग्र मे कहा जाय तो फैसला कार्यान्वयन के प्रति राजनीतिक दल, कर्मचारी प्रशासन, कार्यपालिका लगायत आम जनता उत्तरदायी न होने में फैसला व्यवहार में अनुवादित न होना वर्तमान समय की प्रमुख चुनौती के रूप मे माना जाता है । और यह समझना कठिन भी नहीं है ।

यथार्थ क्या है कि मुद्दा के सिलसिला मे सक्षम अदालत ने फैसला कर पुनरावेदन करने का रास्ता बन्द हो जाने के बाद कानून मुताबिक न्याय प्रदान करवाना, फैसला मुताबिक कार्य करबाना, कैद दण्ड हुआ है तो उसी के अनुसार करबाना, दिवानी (सिविल) अधिकार स्थापित करवाने के बाद फैसला के मुताबिक उस फैसला को स्थापित करवाना फैसला कार्यान्वयन होता है । स्वतन्त्र न्यालय से फैसला हो जाने से सिर्फ निर्णय प्रभावकारी नहीं हो जाता है जबतक उस निर्णय को व्यवहारिक रूप मे अनुवादित न हो जाए । फैसला का कार्यान्वयन ही सही मायनों में न्याय प्राप्ति होता है ।

महामारी के चपेट मे परे नेपाली न्यायालय का सही उपचार कहा जाय तो इसको राजनीति से पुर्ण रूप मे स्वतन्त्र रखना होगा । यह कहने का मतलब लेखक द्वारा न्यालय के उपर कोई आधारहीन लांछना लगाने का उदेश्य बिल्कुल भी नही है । यद्यपि, न्यायालय के भीतर भ्रष्टाचार और राजनीतिक प्रभाव बढ़ता ही जा रहा है और यह बात स्वयं न्यायालय के वर्तमान न्यायाधीश, पुर्व न्यायाधीश और नेपाल बार एसोसिएसन के पदाधिकारी लगाते आ रहे हैं । अदालत में न्याय का खरीद बिक्री होता है यह अभिव्यक्ति अकसर सुनने और पढ़ने को मिलता है, न्याय आबद्ध व्यक्तित्वों की तरफ से । और इस का जड़ कहा जाए तो अदालत मे बिचोलियो का दबदबा और राजनीतिक हस्तक्षेप को ही माना जाता है । देश हित के विषय मे अलगथलग रहने वाली राजनीतिक दल न्यायालय में न्यायमुर्ति के नियुक्ति के समय एकसाथ नजर आते हैं । भागबंडा के आधार पर न्यायमुर्तियों की नियुक्ति की जाती है । और यह एक खुला सत्य है । न्यायमुर्ति कहलाने वाले भी अपना तबादला और प्रमोशन के लिए नेताओं के चौकठ पर दस्तक देने से पीछे नहीं हटते । और अवस्था ऐसी ही रही तो न्यायालय को स्वतन्त्र निकाय कहने का नैतिक सामथ्र्य किसी के पास बाकी नही रह पाएगा ।

राजनीतिक से संरक्षित न्यायालय (पोलिटिकली प्याट्रोनाइज्ड जुडिसियरी) से आम जनता को सार्थक न्याय की कल्पना करना भी मुशकिल होना तय है । और फैसला कार्यान्वयन न होना तो आम बात होगी । परंतु ऐसी परिस्थिति के कारण नेपाल जैसे देश मे साँस लेती शिशु गणतन्त्र को कुपोषित बनाने के रास्ते पर देश आगे बढता चला जाएगा ।

महान दार्शनिक जोन लाक ने १६९० के अपने प्रतिपादन मे कहा था कि जहाँ कानून का अन्त होता है, वहाँ अराजकता शुरु होती है और यह एक आधारभूत सत्य है । कानून का पालन न होना, सर्वोच्च का फैसला बाध्यकारी कानून के तरह पालन न करना कानूनी शासन व्यवस्था के उपर एक खुला प्रहार है । सार्बजनिक सरोकार के मुद्दों में आए फैसला कार्यान्वयन न करने का मतलब त्रिणमुल जनता जो कि देश के करदाता भी होते है उनके दर्द पर नमक लगाने जैसा होता है । आम जनता न्यायालय को न्याय प्राप्ति का अन्तिम स्थल के रूप में लेते है । फैसला न मानने बाले जो कोई भी हो उसपर अवहेलना मुद्दा लगा कर हो या कोई कानूनी हथकण्डे का प्रयोग कर के हो, फैसला कार्यान्वयन करवाना ही होगा और न्यायालय की प्रतिष्ठा की रक्षा करनी होगी ।

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