Mon. Sep 16th, 2019

घटनाएँ लज्जित करके सिद्ध करती है, हम मानव नहीं जीव मात्र है : मुरली मनोहर तिवारी 

मुरली मनोहर तिवारी (सीपू ), बीरगंज | तमिलनाडु के वेल्लोर में ४६ साल के एक दलित एन कुप्पन की मौत हो गई थी, कथित अगड़ी जाति के लोगों ने उस कथित दलित के शव को अपनी जमीन से होकर श्मशान घाट के लिए ले जाने की इजाज़त नहीं दी। यहां पर कथित दलितों के लिए अलग श्मशान है। तमिलनाडु में कथित दलितों को आधिकारिक तौर पर आदि द्रविड़ार कहा जाता है। वेल्लोर जिले के वानियाम्बड़ी में कथित अगड़ी जाति के लोग रहते हैं, जहां कथित दलितों को उनकी ज़मीन पर चलने की इजाज़त नहीं है। शव को श्मशान पहुंचाने के लिए एक नदी पर बने २० फीट ऊंचे पुल से रस्सी से बाँधकर नीचे लाना पड़ा। इसके बाद शव का अंतिम संस्कार किया गया। जो मरा हुआ है उसे रास्ता नहीं मिला, लेकिन जो समाज में जिन्दा होकर भी मरा हुआ है, उसका क्या किया जाए ?

ओडिशा में ऐसा ही दिल दहला देने वाला वीडियो वायरल हुआ है, जहां एक लड़का अपनी मां की लाश को साइकिल पर बांध कर ले जाता नजर आ रहा है। लड़के की मां का देहांत हो गया था मगर चूंकि यह परिवार कथित छोटी बिरादरी का था, इसलिए कोई भी उसकी मदद को सामने आया। जिस लड़के का वीडियो वायरल हुआ है उसका नाम सरोज बताया जा रहा है और उसकी उम्र १७ साल है। सरोज की मां जिसकी उम्र ४५ साल थी, उसकी मौत तब हुई जब वो पानी भरने गई और गिर गई। बात जब अंतिम संस्कार की आई, तो पूरे गांव में कोई ऐसा नहीं था, जो सरोज की मदद के लिए सामने आता, वजह सरोज की जाति थी। सरोज कथित छोटी जाति से था, गांव वालों के इस रुख से सरोज आहत तो ज़रूर हुआ मगर उसने हार नहीं मानी। उसने मां की लाश को साइकिल से बाँधा और उसे लेकर करीब ५ किलोमीटर तक पैदल यात्रा की और उसे लेकर जंगल गया जहां उसने अपनी मां का अंतिम संस्कार किया है। करपाबहल गांव की यह घटना जातिवाद की क्रूरतम कहानी बयान कर रही है। यदि ये कहानी सच है, तो जातिवाद ख़तम करने के तमाम प्रयासों पर गंभीर सवाल खड़े होते हैं। ओडिशा और तमिलनाडु की ये घटना बताती है कि जातिवाद और आरक्षण की सियासत से कोसों दूर है ज़मीनी हकीक़त। ओडिशा और तमिलनाडु से आ रहा ये वीडियो साफ बताता है कि इंसानियत के दावे कितने खोखले हैं।

हम विकास की बात करने लगे, आधुकनिकता की बात करने लगे, मुद्दों को जात पात से परे ले जाकर देखने की बात करने लगे, यानी नेताओं के भाषणों में हमें वो ख्वाब दिखाए गए, जिनको यदि अमली जामा पहना दिया गया तो एक ऐसा समाज निकल कर हमारे सामने आएगा, जो वर्तमान कि अपेक्षा कहीं बेहतर,कहीं ज्यादा सशक्त होगा। कल्पना और वास्तविकता में फर्क है। वास्तविकता यही है कि आज भी हम अपने को कथित छोटी जाति-बड़ी जाति के बंधनों में बांधे हैं, जिसके चलते हमें अपने घर की लाशों को अपने कंधे पर रखकर या फिर उन्हें अपनी साइकिल पर बांध कर, इस आस में इधर उधर भटकना पड़ता है कि शायद कोई आए और हमारी मदद कर दे।

जो सवाल हमारे सामने खड़ा हो रहा है वो ये कि आखिर हम किस दिशा में जा रहे हैं ? क्या हम जात पात के बंधनों में इस हद तक जकड़े हैं कि हमें इस बात का ख्याल ही नहीं है कि मानवता भी कोई चीज है। जो सुलूक सरोज के साथ हुआ है,उसने कहीं न कहीं हमें आईना दिखाया है और बताया है कि अभी भी हमें विकासशील से विकसित बनने में एक लंबा वक़्त लगेगा। हम किस तरफ जा रहे है ? हम लोगों का भविष्य क्या होगा इसपर कुछ कहना अभी जल्दबाजी है। मगर जो घटनाएं घटित हो रही उसने हमें साफ बता दिया है कि हम इंसान नहीं बल्कि वो जीव हैं जिनमें न इंसानियत है और न ही किसी की मदद करने का ज़ज़्बा।

ज़ाती पँति कुल धर्म बड़ाई | धन बल परिजन गुण चतुराई ||

भगति हीन नर सोहइ कैसा | बिनु जल बरिद देखिअ जैसा ||

नावधा भागती कहउँ तोहि पाहि | सावधान सुनू धरू मन माही ||

प्रभु श्री राम कहते है, “मैं तो केवल एक भक्ती ही का संबंध मानता हूँ, ज़ाती, पाँति, कुल, धर्म, बड़ाई, धन, बल, कुटुम्ब, गुण और चतुरता – इन सबके होनेपर भी भक्ति से रहित मनुष्य कैसा लगता है, वैसे ही जैसे जलहिन बादल “

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