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बज्जिका पाण्डुलिपि पुरस्कार से सम्मानित हुए साहित्यकार अजयकुमार झा,

 

रौतहट। बज्जिका भाषा और साहित्य के आकाश में एक और गौरवपूर्ण नक्षत्र उदित हुआ, जब बज्जिका जगत के प्रतिष्ठित ‘विश्व–संजय बज्जिका पाण्डुलिपि पुरस्कार, 2026’ से महोत्तरी के सुप्रसिद्ध साहित्यकार अजयकुमार झा को अलंकृत किया गया। उनकी मौलिक एवं चिंतनपरक पाण्डुलिपि ‘दृष्टिकोण’ को उत्कृष्ट कृति घोषित करते हुए बज्जिका साहित्य संगम, रौतहट ने उन्हें यह सम्मान प्रदान किया।

पुरस्कार के अंतर्गत साहित्यकार झा को सम्मान-पत्र के साथ उनकी कृति की 51 प्रतियाँ भेंट की गईं। यह कृति सर्लाही के समाजसेवी महानन्द झा द्वारा स्थापित ‘विश्व–संजय बज्जिका साहित्य कोष’ के आर्थिक सहयोग से प्रकाशित की गई है। यह पहल न केवल साहित्य-साधना का सम्मान है, बल्कि बज्जिका भाषा की सांस्कृतिक चेतना को सशक्त बनाने की दिशा में एक महत्त्वपूर्ण कदम भी है।

ज्ञातव्य है कि संगम द्वारा गत वर्ष बज्जिका भाषा में रचित साहित्यिक, समीक्षात्मक तथा शोधपरक पाण्डुलिपियों का आमंत्रण किया गया था। निर्धारित अवधि में विभिन्न विधाओं की पाँच पाण्डुलिपियाँ प्राप्त हुईं। तीन सदस्यीय स्वतंत्र निर्णायक मंडल ने गहन मूल्यांकन के उपरांत साहित्यकार अजयकुमार झा की कृति ‘दृष्टिकोण’ को सर्वश्रेष्ठ घोषित किया।

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गरुडा नगरपालिका–5, महम्मदपुर स्थित गोपाल सेवा समिति भवन के समीप आयोजित गरिमामय समारोह में बज्जिका साहित्य समाज, सर्लाही के अध्यक्ष रामचन्द्र महतो कुशवाहा, बज्जिका साहित्य संगम, रौतहट के अध्यक्ष किशुनदयाल श्रीकृष्ण, प्रतीक दैनिक के प्रधान संपादक जगदीशप्रसाद शर्मा, भारत के प्रतिष्ठित बज्जिका साहित्यकार मणिभूषणप्रसाद सिंह ‘अकेला’, अनिता–शिव प्रतिष्ठान, रौतहट के अध्यक्ष शिवचन्द्र साह, तथा विश्वराज अधिकारी एवं संजय साह मित्र ने संयुक्त रूप से पुरस्कार प्रदान किया।

कार्यक्रम में अमेरिका में रहकर भी बज्जिका साहित्य-साधना में निरंतर संलग्न विश्वराज अधिकारी ने पुरस्कार कोष की स्थापना, चयन प्रक्रिया तथा उसके संचालन संबंधी विस्तृत जानकारी प्रस्तुत की। कार्यक्रम की सचिव संगीता सहनी ने स्वागत उद्बोधन दिया, जबकि उपाध्यक्ष रेणु गुप्ता एवं सदस्य सहनी ने अतिथियों और प्रतिभागियों को गमछा ओढ़ाकर सम्मानित किया।

मुख्य अतिथि रामचन्द्र महतो कुशवाहा ने अपने उद्बोधन में कहा कि ऐसे सम्मान और पुरस्कार बज्जिका भाषा एवं साहित्य के संवर्धन में मील का पत्थर सिद्ध होंगे। वहीं भारतीय साहित्यकार मणिभूषणप्रसाद सिंह ‘अकेला’ ने नेपाल और भारत के मध्य बज्जिका साहित्यिक संबंधों के सतत विस्तार पर प्रसन्नता व्यक्त करते हुए कहा कि नेपाल में अंतरराष्ट्रीय स्तर के पुरस्कारों की स्थापना बज्जिका जगत के लिए ऐतिहासिक उपलब्धि है।

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कार्यक्रम में भारत के रामकिशोर सिंह ‘चकवा’, अवधेश तृषित, कामेश्वर मिश्र ‘घुमक्कड़’ तथा प्रवीणकुमार मिश्र सहित अनेक साहित्यकारों ने अपनी रचनाओं का पाठ एवं विचार-विमर्श प्रस्तुत किया। इस अवसर पर पाँच भारतीय साहित्यकारों को ‘अंतरराष्ट्रीय बज्जिका दूत सम्मान, 2026’ से विभूषित किया गया।

इसी क्रम में प्रतीक दैनिक के प्रधान संपादक जगदीशप्रसाद शर्मा, बज्जिकाञ्चल मीडिया प्रा. लि. के प्रमुख राजुकुमार श्रीवास्तव, बज्जिका साहित्य समाज, सर्लाही की उपाध्यक्ष शैलियादेवी ठाकुर, बारा जिले के चिउँटाहा विद्यालय के प्रधानाध्यापक दिनेशप्रसाद साह, तथा ऑनलाइन माध्यम से बज्जिका कार्यक्रमों का संचालन कर रहे संजय महतो राज को भी ‘अंतरराष्ट्रीय बज्जिका दूत सम्मान, 2026’ से सम्मानित किया गया।

किशुनदयाल श्रीकृष्ण की अध्यक्षता में सम्पन्न इस ऐतिहासिक आयोजन में मोरंग, महोत्तरी, सर्लाही, रौतहट, बारा और पर्सा जिलों के भाषासेवियों एवं साहित्यकारों की उल्लेखनीय उपस्थिति रही। भारत के बिहार राज्य के सीतामढ़ी, मुजफ्फरपुर और वैशाली से भी साहित्यकारों ने सहभागिता कर कार्यक्रम को अंतरराष्ट्रीय स्वरूप प्रदान किया।

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दो नए पुरस्कारों की घोषणा

पुरस्कार ग्रहण करते हुए साहित्यकार अजयकुमार झा ने भावविभोर होकर घोषणा की कि वे बज्जिका भाषा और साहित्य की सेवा में समर्पित साहित्यकारों एवं भाषासेवियों को सम्मानित करने हेतु एक नए पुरस्कार की स्थापना करेंगे।

इसी क्रम में बज्जिकाञ्चल मीडिया प्रा. लि. के प्रमुख राजुकुमार श्रीवास्तव ने भी अपने समाचार पत्र के वार्षिकोत्सव के अवसर पर प्रतिवर्ष प्रदान किए जाने वाले ‘बज्जिका पत्रकारिता पुरस्कार’ की स्थापना की घोषणा की। इन दोनों नई पुरस्कार योजनाओं का उपस्थित साहित्यकारों, भाषाविदों और साहित्यप्रेमियों ने हर्षोल्लास के साथ स्वागत किया।

उल्लेखनीय है कि बज्जिका भाषा एवं साहित्य के क्षेत्र में इससे पूर्व भी ‘तुलसी साहित्य पुरस्कार’, ‘अनिता–शिव अंतरराष्ट्रीय बज्जिका सर्वोच्च कृति पुरस्कार–सम्मान’ तथा ‘कवि सदानंद अंतरराष्ट्रीय बज्जिकासेवी पुरस्कार’ जैसे अनेक प्रतिष्ठित सम्मानों की स्थापना हो चुकी है। निःसंदेह, ये सभी प्रयास बज्जिका भाषा की समृद्ध परंपरा, साहित्यिक गरिमा और सांस्कृतिक अस्मिता को वैश्विक क्षितिज पर स्थापित करने की दिशा में स्वर्णिम अध्याय लिख रहे हैं।

अजयकुमार झा, जलेश्वर

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