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सत्ता प्राप्ति के आन्दोलन के चलते अर्थतन्त्र को दाव में नहीं लगाना चाहिए ।

 

लिलानाथ गौतम । संविधानसभा विघटन के बाद राष्ट्रपति द्वारा वर्तमान सकरारको ‘कामचलाउ’ घोषित कर दिया है । जिसके कारण बाध्यतावश डा बाबुराम भट्टराई के नेतृत्ववाली सरकार ने गत आसाढ़ में सिर्फ एक तृतीयांस बजट लाया था । उस बजट की समायवधि कार्तिक मसान्त मे समाप्त होनेवाली है । उस के बाद बजट अभाव के कारण ही देश की दैनिक शासन–प्रशासन सञ्चालन में अवरोध हो जाने की विश्लेषण सम्वन्धित क्षेत्रों से हो रहा है । लेकिन बजट आएगा या नहीं, इसकी कोई गारेन्टी नहीं है ।
ऐसी अवस्था में सरकार तो पूर्ण बजट लाने की तयारी में जूट रही है । लेकिन सरकार परिवर्तन की प्रमुख मुद्दा बनाकर आन्दोलन में रहे प्रतिपक्षी दल कोई भी हॉलात में बजट नही आने देने की बात कर रही है । कुछ अर्थविज्ञ पहले की तरह ही इस बार भी अध्यादेश के माध्यम से आंशिक बजट लाने का सलाह सरकार को दे रहे हैं । लेकिन बजट के साथ सरोकार राखनेवाले अन्य क्षेत्र हो वा निजी क्षेत्र, सभी ने सहमति जुटाकर पूर्ण बजट लाने पर जोड़ दे रहा है । ऐसी अवस्था में भावी बजट किस तरह से कब आएगा, कहना मुश्किल है । इतना होते हुए भी देश के समग्र परिस्थियों को सहज सञ्चालन के लिए बजेट अपरिहार्य है ।
हाँ, आज सभी के लिए सरकार का परिवर्तन प्रमुख मुद्दा बन रहा है । लेकिन इसी मुद्दा को लेकर आर्थिक और विकास के दृष्टिकोण से देश को बन्दी बनाना किसी भी जिम्मेवार राजनीतिक दल का कर्तव्य नहीं है । भितर मन में जो कुछ हो, अगर सहमति बन जाए तो सरकार से हट जाने की बात स्वयं सत्ताधारी लोग कर रहे है । इसके लिए सत्ताधारी के तरफ से नये प्रधानमन्त्री का उम्मेदवार खड़ा करने के लिए भी प्रतिपक्षी दल को आग्रह किया है । लेकिन प्रतिपक्षी दलों के बीच भावी प्रधानमन्त्री किस को बनाया जाए, इस बात पर एकता नहीं है । भावी सरकार के नेतृत्व के लिए अपने भितर रहे विवाद को छुपाकर प्रतिपक्षी दल सिर्फ प्रधानमन्त्री को सत्ता से गिराने की बात कर रहे है । और राजनीतिक गतिरोध के सम्पूर्ण कारण वर्तमान सत्ता गठबन्धन को मानकर उसी तरह के हौवा पिट रहे है । इस तरह अपनी कमजोरी को छिपाकर नये प्रधानमन्त्री का उम्मेदवार खडा करने में असफलसिद्ध होना और अत्यावश्यक बजट में रोक लगाने की बात करना उचित नहीं होगा । प्रतिपक्षी दलों की यह कमजोरी को सामान्य नहीं माना जा सकता । क्योंकि प्रतिपक्षी दल के तरफ से प्रधानमन्त्री का नया उम्मेदवार समय में खड़ा होता तो यह सरकार अब तक नहीं रहती ।
दूसरी बात सत्ता में जो रहते है, वे वहाँ से नहीं हिलना चाहते है । यह आरोप नहीं, अब तक नेपाल के राजनीति में स्थापित नजिर है । इस बात को जानते–जानते भी सिर्फ सत्ताधारी को आरोप लगाना और अपने तरफ से गतिरोध अन्त्य के लिए कुछ नहीं करना प्रतिपक्षी दलों का स्वार्थपूर्ण राजनीति है । ऐसी अवस्था अपने स्वार्थ के लिए बजट को बन्धक बनाना राजनीतिक बेवकुफी सिवाय कुछ नहीं हो सकता ।
इसीतरह प्रतिपक्षी दल के अलवा कोई भी सरोकारवाला पक्ष बजट रोकने के पक्ष में नहीं–दिखाइ पड़ता । निजी उद्योग–व्यासायियों ने तो चेतावनी भी दिया है– ‘अगर पूर्ण बजट नहीं आएगा तो हम लोग सरकार को कर नहीं देगें । इसीतरह विभिन्न दातृ निकायों से भी पूर्ण बजट के लिए चेतावनीयुक्त दबाव ड़ाल रहे है । उन लोगों ने चेतावनी दिया है कि पूर्ण जबट नहीं आने पर दातृनिकाय से हो रहे सहयोग प्रभावित हो सकता है । अर्थ के साथ जुडे अन्य जानकारों ने भी बजट नहीं आएगा तो मुलुक में आर्थिक अराजकता हाबी होने की चेतावनी दे रहे है । ऐसी अवस्था में सत्ता प्राप्ति से प्रेरित आन्दोलन के चलते अर्थतन्त्र को जुवा के दाव में नहीं रखना चाहिए । इसीलिए हो सके तो सरकार परिवर्तन के बाद ही पूर्ण बजट लाने की बातावरण निर्माण करें, अगर ऐसा नहीं होगा तो वर्तमान सरकार को ही पूर्ण बजट लाने की अनुमति प्रदान करें । अपने व्यक्तिगत और पार्टीगत अहम् को मध्यनजर करते हुए बजट को बन्धक बनाना जिम्मेवार राजनीतिक दल तथा व्यक्ति के लिए शोभनीय कार्य नहीं है ।

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