Tue. Jul 14th, 2020

खुद के लिए सशक्त हो रही है अब नारी !

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डा0श्रीगोपालनारसन एडवोकेट

भले ही देश दुनिया मे अभी भी महिला उत्पीड़न के मामले पहले से अधिक सामने आ रहे हो,भले ही महिला उत्पीड़न की खबरे पहले से अधिक सुर्खियां बन रही हो,लेकिन यह सच है कि बदलते दौर में महिलाओं ने खुद के लिए सशक्त होना शुरू कर दिया है।महिलाओं में अन्याय का प्रतिवाद करने की हिम्मत पैदा हो रही है।महिला उत्पीड़न के मामले भी इस लिए अधिक सामने आ रही है क्योंकि मीडिया की सक्रियता सोशल मीडिया के आ जाने से कही अधिक बढ़ी है और अब मामला दबने की गुंजाइश कम रह गई है।जिसे महिला हित मे अच्छा माना जा सकता है।हालांकि आजकल ज्वलन्त मुद्दों और सुविधाओं के लिए भी महिलाएं खुलकर आवाज उठा रही है।जैसे घर मे शौचालय नही है तो बनवाओ तभी होगी शादी।इसीप्रकार शादी के लिए दहेज की शर्त न मानने और स्वयं दहेजलोभी दूल्हे को ठुकराने का साहस भी महिलाओं ने दिखाना शुरू कर दिया है।शराब पीकर घर आने वाले पति के हाथों पीटने के बजाए पति को छोड़ सिर उठाकर जीने का संकल्प लेने में अब महिलाओं को कोई संकोच नही है।जनप्रतिनिधि चुने जाने पर अपने दायित्व में पति या अन्य परिजनों की दखलंदाजी स्वीकार न करने जैसे अनेक कदम उठाकर आज की नारी सशक्त हो रही है।शिक्षा से लेकर स्वयं के पैरों पर खड़े होने तक मे आज की नारी स्वयं को गौरवान्वित महसूस कर रही है।नारी को भोग की वस्तु मानने वालों में आम समाज के लोग ही नही सभ्रान्त समाज के लोग भी शामिल है। जिस आशाराम को दुनिया बापू कहकर सम्मान देती रही वही बापू नारी की अस्मितता को तार तार करने वाले व्याभिचारी निकले। इसी तरह एक न्यायाधीश द्वारा प्रशिक्षु महिला अध्विक्ता का किया गया देह शोषण का मामला हो या  एक सम्पादक  द्वारा अपनी ही पत्रकार साथी के साथ किया गया बलात्कार का मामला हो, इन सब धटनाओं से देश भर में नारी के असुरक्षित होने का संदेश गया है । हालांकि सच यह भी है कि देेेश में शायद ही ऐसा कोई गांव -शहर या बस्ती हो ,जहां नारी स्वयं को पूरी तरह से सुरक्षित महसूस कर सके।  वह भी तब जब नारी के बिना समाज की कल्पना नही की जा सकती।पुरूष प्रधान कहे जाने वाले इस समाज में नारी देवी के रूप में पुजनीय कही जाती है।  जब नारी को सम्मान देने की बारी आती है तो लोगो का पुरूषोत्व जाग उठता है और नारी फिर भोग्या समझ ली जाती है। हालाकि देश में  रानी लक्ष्मीबाई समेत अनेक ऐसी विरांगनाएं हुई हैं, जिन्होंने राष्टभक्ति और बहादुरी का इतिहास रचा तथा नारी को आत्मस्वाभिमान के सिहासंन पर बैठाया। वहीं नारी को ममता की मूरत बताते हुए उसे कोमल हृदय कहा जाता है।लेकिन फिर भी नारी का सम्मान और उसका अस्तित्व खतरे में है,आज भी नारी को या तो कन्या भ्रूण हत्या के रूप में जन्म लेने से पहले ही समाप्त किया जा रहा है या फिर उसे दहेज की बलिवेदी पर जिंदा जला दिया जाता है। हद तो यह है कि नारी को जन्म लेने से पहले ही मार डालने और अगर जिंदा बच जाए तो विवाह होने पर दहेज के लिए प्रताडित करने में अधिकतर नारियों की भूमिका रहती है। हालांकि कहीं कहीं पुरूष भी पति देवर जेठ व ससुर के रूप में नारी को प्रताडित करने से बाज नहीं आते। यही कारण है कि देश में कन्या भू्रण हत्याओं के आंकडे दिल दहलाने वाले हैं। सन 2001 से 2012 तक प्रतिदिन करीब दो हजार तक कन्या भ्रण हत्याएं हुई है। जबकि हकीकत इससे भी कहीं ज्यादा भयावह हो सकती है, क्योंकि निजी अस्पतालों और घरों में की जा रही कन्या भ्रूण हत्याएं इससे कहीं ज्यादा है। इसी कारण पुरूषों की तुलना में नारी की संख्या लगातार घट रही है।वही हरियाणा ,उत्तर प्रदेश व राजस्थान में भी हालात कुछ अच्छे नही है. ब्लात्कार, घरेलू हिंसा, दहेज के कारण मौत और जबरदस्ती शादी के मामले इन दोनों राज्यों में काफी देखने को मिल रहे हैं. नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़ों को देखकर एकबारगी ऐसा लगता है कि इन राज्यों में जैसे लड़कियों का होना आज भी किसी गुनाह से कम नही हैपिछले दिनों हरियाणा के जींद में 15 साल की बच्ची के साथ दरिंदगी की गई. वहीं पानीपत में 11 साल की मासूम बच्ची से रेप. उसके बाद बच्ची की हत्या और फिर उसके शव के साथ 4 घंटे तक रेप. पिंजौर के पास 10 साल की मासूम के साथ 50 साल के पड़ोसी ने रेप किया.।इतना ही नहीं फरीदाबाद में तो हद ही हो गयी. ऑफिस से घर लौट रही एक लड़की को सरेआम अगवा किया गया. फिर चलती कार में 2 घंटे तक गैंगरेप किया और सड़क पर फेंककर भाग गए. ये सब हरियाणा में महिलाओं की बदतर होती स्थिति का एक नमूना मात्र है।भ्रूण हत्या और कम लिंगानुपात के लिए बदनाम हरियाणा में महिलाओं की स्थिति आज भी अच्छी नहीं है. नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो, 2016 के आंकड़ों पर गौर करें तो उस साल राज्य में 1187 महिलाएं बलात्कार का शिकार हुईं. वहीं 3314 महिलाओं को घरेलू हिंसा का सामना करना पड़ा.इस राज्य में शादी के लिए 821 महिलाओं का अपहरण किया गया, जबकि दहेज के कारण 260 महिलाओं को अपनी जान की कीमत चुकानी पड़ी.महिलाओं के प्रति होने वाली हिंसा और अत्याचार के मामले में राजस्थान ने बाकी राज्यों को काफी पीछे छोड़ दिया है. नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो, 2016 के आंकड़ों के मुताबिक, राजस्थान में महिलाओं के साथ रेप की 3656 वारदात हुईं. जबकि घरेलू हिंसा के 13,814 मामले दर्ज किए गए. जबरदस्ती शादी के लिए 1979 महिलाओं को अगवा किया गया। सन 1901 में 1000 पुरूषों के सापेक्ष महिलाओं की संख्या 972 थी, जबकि वर्ष 1991 में घटकर 927 तक पहुंच गई। हालांकि 2001 में यह संख्या प्रति 1000 पुरूष के सापेक्ष थोडी बढोत्तरी के बाद 933 हो गई है। लेकिन मौजूदा समय में भी यह आंकडा पुरूषों की संख्या में कापफी नीचे है। जिससे समाज में स्त्री पुरूष की संख्या का संतुलन बिगड गया है। संतुलन बनाए रखने के लिए महिला पुरूष दोनों को लगभग बराबरी पर आना होगा। गांव की अपेक्षा शहरों में महिलाओं पर संकट कुछ ज्यादा हावी है, तभी तो गांव में प्रति 1000 पुरूष की सापेक्ष महिलाओं की संख्या 939 है, जबकि शहर में प्रति 1000 पुरूषों के सापेक्ष महिला संख्या घटकर 894 पर पहुंच गई है, जो नारी को दुनिया में न आने देने की नाजायज कोशिशों का आईना है।इसी तरह महिला पर अत्याचार के मामले भी लगातार बढ रहे है।एक साल के भीतर नारी अत्याचारों में 10 प्रतिशत से अधिक की बढोत्तरी हुई है।  देशभर में महिला उत्पीडन की 81 हजार 344 घटनाएं प्रकाश में आई है। महिला उत्पीडन की सबसे ज्यादा घटनाएं 22 प्रतिशत से ज्यादा त्रिपुरा में हुई, वहीं पश्चिमी बंगाल में भी महिला शोषण के 16 हजार 112 मामले सामने आए हैं, जिससे इन राज्यों की हकीकत का पता चलता है। उत्तर प्रदेश में भी महिला उत्पीडन की घटनाएं बडे राज्यो में सबसे ज्यादा है। सन 2008 की अपेक्षा 2009 में महिला उत्पीडन की वारदातों में 4 प्रतिशत से ज्यादा की बढोत्तरी हुई, वहीं 2009 से 2012 में 10 प्रतिशत से ज्यादा का ग्राफ बढना गंभीर चिंता का विषय है। आज तो हालात और भी खराब है। आए दिन महिला शोषण,महिला हिंसा और महिलाओं के साथ भेदभाव की धटनाओं में बढोतरी से नारी जाति पर संकट के बादल मडंरा रहे है।जिसे दूर करने की आवश्यकता है और यह तभी हो सकता है जब नारी को घर और बाहर दोनों जगह सम्मान व सुरक्षा मिले।यद्यपि कानून अपना काम कर रहा है।लेकिन जिस प्रकार निर्भया मामले में फांसी की सजा पाए अपराधी येन केन प्रकारेण मौत से बचने की कोशिश में समय को टालने में सफल हो रहे है।उससे नारी सुरक्षा व न्याय के प्रति चिंता का बढ़ना स्वाभाविक है।

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डा0श्रीगोपाल नारसन एडवोकेट

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