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माँ से ही अस्तित्व की पहली आशा : ममता सिंघी

 

  माँ

घर आते ही उसकी एक झलक मिल जाए
एक छोटी सी फूंक चोट की मरहम बन जाए
उसका हर स्पर्श एक आश्वासन दे जाए
खुद कितनी भी डांटे – मारे
पर किसमें इतनी हिम्मत
जो उसके लाडले को कोई और हाथ भी लगाए।

परीक्षाएं हमारी , नींद माँ ने उडाई
हमारी छोटी सी सफलता पर भी देती ऐसे बधाई
जैसे जंग जीतकर गढ आया कोई सिपाही ।

आँचल में उसके कितना सुकून समाया
जैसे तपती दुपहरी में वृक्ष की शीतल छाया।

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कच्ची माटी मैं मुझे सुंदर घट का आकार दिया
प्यार से, अनुशासन से, शिक्षण से, प्रशिक्षण से,
संस्कारों के सिंचन से मेरे व्यक्तित्व का विकास किया।

उसकी हर दुआओं में मेंने खुद को ही पाया,
अपनी इच्छाएं काटकर हमारी फरमाइशों को पूरा किया ।

माँ से निःसृत निःस्वार्थ प्रेम की परिभाषा
माँ से ही अस्तित्व की पहली आशा
मृत्यु से संघर्ष कर, कितने दर्द सहकर हमें जना
माँ बनकर ही मैंने तेरी विशालता को जाना माँ ।

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माँ के ऋण से उऋण हो सकते नहीं कभी
पर माँ का दिल ना दुखाएँ यह संकल्प कर सकते सभी।।

ममता सिंघी
विराटनगर

 

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