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सुशील कोइराला तब और अब

 

डा. उमारानी सिंह:‘केशव, कहि न जाई क्या कहिए, देखता तब रचना विचित्र अति, समुझि मन ही मन रहिए, केशव, कहि न जाई क्या कहिए !’
shusil koirala
एक मशहूर कवि की ये पंक्तियां हमें स् मरण दिलाती हैं किर् इश्वर की सृष्टि को हम समझ नहीं सकते। न ही सृष्टि को न ही उसके गढÞे मनुष्य को। कौन कब बदल जाएगा, इसे हम जान नहीं सकते।

एक ऐसा ही चरित्र नजर आता है, सुशील कोइराला जी का। तब मेरे मन में भावना आती है- सुशील कोइराला तब और सुशील कोइराला अब। प्रजातन्त्र की लडर्Þाई के पहले से मैंने उन्हें देखा है, परखा है और समझा है। हर कदम पर उन का रंग बदलते हुए देख कर मुझे आर्श्चर्य हुआ है। प्रजातन्त्र की लडर्Þाई शुरु होर् गई थी, मेरे पति जेल में थे। प्रजातन्त्र की लडर्Þाई में मेरे पति ने अपना तन, मन धन यों कहिए कि अपना र्सवस्व दान कर दिया। हम लोग र्सवहारा बन गए, मुझे बिहार में नौकर ी करनी पडÞी। नेताओं का व्यक्तिगत नमक भी नहीं खाया है। उल्टे हमने इन्हें दिया ही है। लेकिन हमारे योगदान और बलिदान का कोई मूल्यांकन नहीं है। ये कर्ुर्सर्ीीर बैठ कर सत्ता का सुख भोग रहे हैं।

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और इधर से उधर अमीरों, बडÞे-बडÞे नेताओं, उनकी परियों, परिवारों और अपने सगे-सम्बन्धियों को ही टिकट बाँटते, सभासद बनाते और बडÞे-बडÞे ओहदों पर रखते हैं। राम-लक्ष्मण और अन्य अमर शहीदों की याद आती है। उनकी माँ और पत्नियों का आज क्या हाल होगा – देश में प्रजातन्त्र आया। मेरे पति -इन्द्रदेव सिंह) को टिकट मिला, परन्तु मेरे पति के व्यक्तित्व से इन नेताओं को डÞर था कि कहीं ये इनसे आगे न बढÞ जाएं। इसलिए इन लोगों ने गजेन्द्रनारायण सिंह को प्रतिद्वन्द्वी बना कर खडÞा कर दिया। इस तरह मेरे पति को पराजित करने में इन नेताओं का भरपूर हाथ है। यदा-कदा आवाज उठती आई है कि मधेशी लोगों के साथ ये लोग सौतेला व्यवहार करते हैं। और एक दूसरे के प्रति राजनीति कर अपना मतलब साधते हैं। आज मैं सब तरह के मूल्यांकन करती हूँ, तो यह सही नजर आता है। एक देश में अनेक प्रदेश होते हैं, इसका मतलव यह नहीं है कि भेद-भाव का रुख अख्तियार किया जाए। मैं जनता को आहृवान करती हूँ कि वे इस भेद-भाव को दूर कर ने में आगे आएं।

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प्रजातन्त्र के सही मूल्य का आकलन हो। पढÞे-लिखे विद्वान लोगों का देश में कद्र हो। विद्वता हर क्षेत्र की कसौटी होनी चाहिए। चन्दा लेकर, वोट खरीद कर, गरीबों को सता कर वोट खरीदना किसी भी तरह से उचित नहीं प्रतीत होता। अन्यथा, फिर कोई तानाशाह आएगा, तानाशाही कायम होगी और प्रजातन्त्र का नामोनिशान मिट जाएगा। अन्त म ंे म ंै उन शहीदा ंे का े बार-बार नमन करती ह,ंू जिन्हानंे े दशे क े लिए अपन े का े अपिर्त कर दिया, जिनका उद्देश्य सत्ता-सुख नहीं, वरन् देश के लिए अपने आप को समर्पित कर जनता का कल्याण करना था। J

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