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प्रचण्डपथ के प्रचण्ड विरोधी

 

लीलानाथ गौतम:कहने की आवश्यकता नहीं है- एमाओवादी अध्यक्ष प्रचण्ड, पद और शक्ति के बारे में अति महइभ्वाकांक्षी व्यक्ति हैं। दूसरी संविधानसभा के द्वारा पर्ूण्ा बहुमतसहित पहली पार्टर्ीीन कर हो सके तो कार्यकारी र ाष्ट्रपति और नहीं हो तो प्रधानमन्त्री ही होने का सपना उन्होंने देखा था। लेकिन जब चुनावी परिणाम आने लगे और एमाओवादी का पत्ता साफ होते दिखाई पडÞने लगा तो अध्यक्ष प्रचण्ड मानसिक रूप से असन्तुलित होने लगे। जिस के परिणामस्वरूप चुनाव में धाँधली होने का आर ोप लगाते हुए उन्होंने घोषणा किया कि अब माओवादी संविधानसभा परिणाम को स्वीकार नहीं करेगी और किसी भी प्रक्रिया में सहभागी नहीं होगी। लेकिन जनमत को अस्वीकार करने जैसे माओवादी निर्ण्र्ााका चौतर्फी विरोध होने लगा,prachanda-300x199 prachand+baidya

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चलो सत्ता कब्जा की तयारी करते है

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अन्तर्रर्ाा्रीय दबाव भी बढÞता गया कि वह जनमत को स्वीकार करे। उसके बाद धीरे से माओवादी नेतागण चुनावी परिणाम को स् वीकार करते हुए ‘ट्रयाक’ मे आने को बाध्य हुए हैं। जिसका पिछला परिणाम है- प्रमुख कहलाने वाले राजनीतिक दलों के बीच हुए चार सूत्रीय सहमति और उसके बाद माओवादी लगायत निर्वाचन परिणाम अस्वीकार करने वाले दलों के द्वारा समानुपातिक उम्मेदवारों की सूची निर्वाचन आयोग में पेश करना। शुरु में संविधानसभा के बाहर से ही चुनावी धाँधली के सम्बन्ध में उच्चस्तरीय छानबीन समिति बनाने के लिए माओवादी ने मांग की थी। उसने कहा भी था कि अन्यथा माओवादी पार्टर्ीींविधानसभा के किसी भी प्रक्रिया में सरीक नहीं होगी।

इसके लिए माओवादी ने मधेशवादी और कुछ छोटे दलों को इकठ्ठा कर संविधानसभा विरोधी मोर्चा बनाने की नाकाम कोशिश भी की। लेकिन माओवादी की इस कोशिश को असफल बनाने में कुछ मधेशवादी दलों का भी हाथ है। उधर कांग्रेस- एमाले माओवादी के इस प्रस्ताव को सुनना भी नहीं चाहते थे। पार्टर्ीीे भीतर भी विशेषतः डा. बाबुराम भट्टर्राई और नारायणकाजी श्रेष्ठ समूह ने दावाव डÞाला था कि एमाओवादी जनमत को स्वीकार करे और संविधानसभा में सहभागी होकर जनस्तर में अपनी मजबूती कायम र खने के लिए नई रणनीति अपनावे। ऐसे ही चौतर्फी दबाव के कारण धीरे-धीरे प्रचण्ड र ाह में आने लगे और जनमत को स्वीकार कर ने के निर्ण्र्ाामें पहुँचे हैं। लेकिन ‘फेससेभिङ’ के लिए उन्हें कुछ चाहिए था। चार सूत्रीय सहमति, विशेषतः प्रचण्ड और कुछ मधेशवादी नेताओं की ‘फेशसेभिङ’ के लिए ही की गई है। क्योंकि प्रचण्ड स्वयं भी जानते हैं कि उस चार सूत्रीय में उल्लेखित संसदीय समिति द्वारा ऐसा कुछ चमत्कारिक अध्ययन प्रतिवेदन आनेवाला नहीं है, जिससे माओवादी द्वारा प्रचारित चुनाव प्रचण्डपथ के प्रचण्ड विरोधी माओवादी हेडक्वाटर के भीतर शुरु यह द्वन्द्व भविष्य में पार्टर्ीीो किस ओर ले जाएगा, अभी कहना मुश्किल है। लेकिन इतना तो कहा ही जा सकता है कि डा. भट्टर्राई, अध्यक्ष प्रचण्ड के लिए गले की फांस बनते जा रहे हैं।

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विश्लेषण हिमालिनी l जनवरी/२०१४ घठ दो व्यक्तियों में से अगर एक झगडा न करें, तो झगडा हो ही नहीं सकता। सम्बन्धी धाँधली को सही साबित किया जा सके और माओवादी को नैतिक रूप में जीत का एहसास दिला सके। फिल हाल संविधानसभा निर्वाचन का चुनावी परिणाम और उसके द्वारा विकसित र ाजनीतिक घटनाक्रम एमाओवादी अध्यक्ष के लिए जितना अनपेक्षित है, उससे भी ज्यादा अनपेक्षित और चकराने वाली बात यह है कि पार्टर्ीीे अन्दर डा. बाबुराम भट्टर्राई के द्वार ा शुरु की गई नई राजनीतिक बहस। क्योंकि पार्टर्ीीेतृत्व पर प्रश्न उठाते हुए की गई बहस प्रचण्ड के लिए जी का जंजाल साबित हो रही है। क्योंकि यह बहस आसानी से निपटने वाली नहीं है। निकट भविष्य मे माओवादी के सांगठनिक अधिवेशन हो रहा है।

उस अधिवेशन के पर्ूव सन्ध्या में शुरु किए गए नेतृत्व की असफलता और परिवर्तन सम्बन्धी इस बहस को अर्थपर्ूण्ा रूप में देखा गया है। चुनावी असफलता और पार्टर्ीीेतृत्व लगायत कुछ विषय को समेटकर डा. बाबुराम भट्टर्राई द्वारा सामाजिक सञ्जाल फेशबुक मार्फ नेतृत्व को चुनौती देने के कारण ऐसी अवस् था आई है। अपन े फशे बकु पजे म ंे लिखत े हुए डा. भट्टर्राई ने अब पार्टर्ीीेतृत्व परिवर्तन की ओर संकेत किया है। उनका मानना है कि चुनावी असफलता के पीछे प्रमुख दोषी, पार्टर्ीीेतृत्व ही है। जिसको स्वीकार करने के लिए भट्टर्राई ने नेतृत्व समक्ष आग्रह भी किया है। फेशबुक पजे म ंे भट्टरार्इ कहत े ह-ंै ‘अब पार्टर्ी के भीतर सांगठनिक संरचना नये ढंग से करने की आवश्यकता है।’ इसक े लिए उन्हानंे े पार्टर्ी नते त्ृ व म ंे कार्इर्े भी व्यक्ति दा े कायर्क ाल से ज्यादा नहीं रहने का प्रावधान भी सुझाया है। पार्टर्ीीे अन्दर प्रभावशाली माने जाने वाले डा. भट्टरार्इ क े इस कथन न े करीब २३ साला ंे स े पार्टर्ी नते त्ृ व म ंे रह े अध्यक्ष पच्र ण्ड की आरे संकेत किया है। जिसके चलते स्वयं माओवादी कायर्क तार् भी बतात े ह ंै कि अब पच्र ण्ड द्वारा २३ साला ें तक उपभागे किया गया सिहं ासन खतर े म ंे ह।ै सा्र ते क े अनसु ार डा. भट्टरार्इ इस विषय म ंे अपन े निकट व्यक्तिया ंे स े सभु mाव भी ल े रह े ह।ंै लेकिन अध्यक्ष प्रचण्डको चुनौती देनेवाली ऐसी हरकत डा. भट्टरार्इ द्वारा पहली बार नही ं हर्इर्ु ह।ै पार्टर्ीीो लोकतान्त्रीकरण करने के सवाल को लेकर इससे पहले भी डा. भट्टर्राई ने कई बार प्रचण्ड को ऐसी चुनौती दी थी। जो जनयुद्धकाल म ंे हएु चनु वाङ बठै क स े अब तक जारी ह

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।ै डा. भट्टर्राई के लिए दर्ुभाग्य की बात यह है कि जब व े एसे ी हरकत करत े ह ंै ता े उन पर पार्टर्ी नते त्ृ व हथियाने का आरोप लगाया जाता है। इस बार भी ऐसा ही हो रहा है। लेकिन डा. भट्टर्राई जो करना चाहत े ह,ंै उसस े पच्र ण्ड का माथा चकर ान े लगता ह।ै एक ता े निवार्च न म ंे बरु ी तरह की अनपे िक्षत पराजय, उसक े बाद वषार् ंे स े कायम अपने नेतृत्व के ऊपर प्रश्नचिन्ह, इन सारी समस्याआ ंे म ंे जकड ेÞ हएु पच्र ण्ड का े समस्या स े बाहर आना आसान तो नहीं है, लेकिन राजनीति क े चतरु खिलाडीÞ पच्र ण्ड अब क्या करगंे ,े यह देखने की बात है। सिर्फभट्टर्राई ही नहीं, माओवादी के भीतर प्रचण्ड के ऊपर प्रश्न करते हुए नेतृत्व परिर् वर्तन की चाहना रखने वाले बहुत सारे हैं। ऐसी अवस्था में भट्टर्राई के द्वारा शुरु बहस ने प्रचण्ड को और मुसीवत पैदा कर दी है। स्मरणीय बात यह है कि पार्टर्ीीे आन्तरिक विवाद के कारण से ही हेटौडा महाधिवेशन द्वारा चयनित तथा निर्वाचित कार्यकारी पदाधिकारी को दूसरे संविधान सभा निर्वाचन से पर्ूव बर्खास्त किया गया था। उसके बाद अपने ही नेतृत्व में चुनावी मैदान में उतरे प्रचण्ड को आगामी माघ-फागुन में होने वाले तथाकथित सांगठनिक अधिवेशन का सामना करना पडÞ रहा है। जिसमें पार्टर्ीीे अन्दर हो रहे इस विवाद का भी सामना कर ना पडÞेगा। इसीलिए हो सकता है- डा. भट्टर्राई ने अधिवेशन की पर्ूवसन्ध्या मे पार्टर्ीीेतृत्व के ऊपर प्रश्नचिन्ह खडÞा करते हुए नई बहस की शुरुआत की है। सामाजिक सञ्जाल के मार्फ डा. भट्टर्राई ने यह भी बताया है कि राज्य का उच्च कार्यकार ी पद में कोई भी व्यक्ति दो कार्यकाल से ज्यादा नहीं रहेगा। भट्टर्राई का यह कथन भी कोई नयाँ नहीं है। उन्होंने इसी तरह की बात पहले भी की थी। ‘व्यक्तिगत रूप में समय के साथ-साथ मेरे द्वारा सही विचार प्रस्तुत हुआ है, उसके अनुसार जनता ने मुझ से ढÞेर सारी आशाएं भी रखी थी। लेकिन जो विचार और प्रतिवद्धता मेरे द्वारा हुआ था,

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व्यक्तिगत इच्छाशक्ति और सांगठनिक आधार कमजोर होने के कारण मैं उसे पूरा नहीं कर पाया’ डा. भट्टर्राई द्वारा फेशबुक में पोष्ट इस कथन से स्पष्ट होता है कि अब डा. भट्टर्राई सांगठनिक रूप में मजबूत होना चाहते हैं। यानी कि पार्टर्ीीेतृत्व के प्रति भी वे लालायित हैं। डा. भट्टर्राई के इस बात और माओवादी के भीतर जारी बहस को लेकर माओवादी के करीब माने जाने वाले कुछ विश्लेषकों का मानना है कि अब फिर माओवादी पार्टर्ीीmूट की ओर अग्रसर हो रही है। ऐसे तो विश्लेषकों ने इससे पहले भी कहा था कि मोहन वैद्य पार्टर्ीीे अलग होना माओवादी की असली फूट नहीं है, वास्तविक फूट तो तब होगी, जब प्रचण्ड और बाबुराम भट्टर्राई अलग होंगे। वैद्य और प्रचण्ड तो अपने स् वार्थ के मुताबिक कभी भी एक हो सकते हैं। खैर, भविष्य ही इस बारे में कुछ बता सकता है।र् वर्तमान विषय तो यह है कि डा. भट्टर्राई की पहल में शुरु हर्ुइ बहस का परिणाम क्या होगा- एमाओवादी का लोकतान्त्रिक रूपान्तरण होगा या सिर्फनेतृत्व हथियाने की भट्टर्राई की चाहना पूरी होगी – डा. भट्टर्राई करीब माने जाने वाले नेताओं की बात सुनें तो भट्टर्राई द्वारा शुरु की गई बहस बहुत पहले ही पार्टर्ीीें आनी चाहिए थी। अगर ऐसा होता तो दूसरे संविधानसभा निर्वाचन में बहुत कम सिट संख्या में रह कर तीसरे स्थान में पार्टर्ीीो नहीं र हना पडÞता। लेकिन प्रचण्ड के करीब माने जाने वाले नेता इस बात को स्वीकार नहीं करते हैं। उन लोगों का मानना है कि किसी भी बहाने डा. भट्टर्राई पार्टर्ीीेतृत्व हथियाने के खेल में हैं। चुनावी परिणाम के बाद माओवादी हेडक्वाटर के भीतर शुरु यह द्वन्द्व भविष्य में पार्टर्ीीो किस ओर ले जाएगा, अभी कहना मुश्किल है। लेकिन इतना तो कहा ही जा सकता है कि डा. भट्टरर् ाई, अध्यक्ष प्रचण्ड के लिए गले की फांस बनते जा रहे हैं। J

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