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“एस मैन” की प्राथमिकता, कोई बर्खास्त, कोई इस्तीफा देने को मजबूर

 
साभार नयाँ पत्रिका

 काठमांडू, 2082 बैशाख 11 । प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली पर आरोप लग रहे हैं कि जो भी अच्छा काम करना चाहता है, उसे सहयोग देने की बजाय अपमानित और प्रताड़ित किया जाता है। इसके चलते कई मंत्री और अधिकारी इस्तीफा देने को मजबूर हुए हैं या उन्हें बर्खास्त कर दिया गया है।

तत्कालीन विद्युत प्राधिकरण के कार्यकारी निदेशक कुलमान घिसिंग का समर्थन करने वाले ऊर्जा राज्य मंत्री पूर्ण बहादुर तामांग (कान्छाराम) को बुधवार को बर्खास्त कर दिया गया। इससे 31 दिन पहले, सरकार ने कुलमान को पदमुक्त कर दिया था। घिसिंग ने उद्योगपतियों से बकाया 8 अरब रुपए वसूलने की कोशिश की थी, जिस कारण वे प्रधानमंत्री ओली और ऊर्जा मंत्री दीपक खड्का के निशाने पर आ गए। ओली और खड्का खुलेआम उद्योगपतियों के पक्ष में दिखाई दिए।

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सोमवार को शिक्षामंत्री विद्या भट्टराई ने भी इस्तीफा दे दिया। शिक्षा अधिनियम की मांग को लेकर तीन सप्ताह से आंदोलन कर रहे शिक्षकों के समर्थन में रही भट्टराई को प्रधानमंत्री ने सहयोग नहीं दिया, जिसके कारण उन्होंने इस्तीफा दे दिया। शिक्षकों का कहना है कि भट्टराई उनकी मांगों के प्रति संवेदनशील और सक्रिय थीं, लेकिन प्रधानमंत्री ने उनकी तैयार की गई समाधान योजना को खारिज कर दिया।

भट्टराई को लेकर ओली का रवैया पहले से ही असहयोगात्मक रहा है। त्रिभुवन विश्वविद्यालय के उपकुलपति डॉ. केशरजंग बराल की राजीनामा अस्वीकृत कर उन्हें फिर से पद पर नियुक्त करने की सिफारिश, विश्वविद्यालय की जमीन वापस लाने की जांच रिपोर्ट और सामुदायिक स्कूलों के हित में किए गए प्रस्तावों को प्रधानमंत्री ओली ने खारिज किया।

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उपकुलपति बराल ने 15 चैत्र को स्वास्थ्य कारणों से इस्तीफा दिया, लेकिन उन्होंने बताया कि प्रधानमंत्री के दबाव और अपमानजनक व्यवहार के चलते वे पद छोड़ने को मजबूर हुए। वे बताते हैं कि सुधार के प्रयासों में प्रधानमंत्री ने कोई सहयोग नहीं किया, यहाँ तक कि मुलाकात या फोन पर बात तक नहीं की।

मंगलवार को गवर्नर सिफारिश समिति के सदस्य और पूर्व गवर्नर विजय नाथ भट्टराई ने भी सरकार में बिचौलियों के प्रभाव का आरोप लगाते हुए इस्तीफा दे दिया। उन्होंने कहा कि गवर्नर की नियुक्ति में राजनीतिक हस्तक्षेप हो रहा है।

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प्रधानमंत्री ओली ने सरकार गठन के शुरू से ही प्रशासन में ‘यस मैन’ को प्राथमिकता दी। इसी कारण उन्होंने वरिष्ठता को नजरअंदाज करते हुए चौथे स्थान पर रहे एकनारायण अर्याल को मुख्य सचिव नियुक्त किया। इसके विरोध में वरिष्ठ सचिव तोयानारायण ज्ञवाली और तीसरे स्थान के सचिव दिनेश भट्टराई ने इस्तीफा दे दिया।

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