विवाहित बेटी का अंश हक , समानता का अधिकार या भावी सामाजिक कुरीति का आधार ? : कृतिका यादव
कृतिका यादव, हिमालिनी, अंक अगस्त ०२६ । नेपाल सिविल संहिता २०७५: विवाहित बेटी का अंश हक
कानून और समाज की भूमिका
नेपाल की मुलुकी देवानी संहिता २०७४/ लागू होने के साथ ही नेपाली समाज में संपत्ति अधिकार और पारिवारिक संरचना को लेकर एक नई बहस छिड़ गई है । इस कानून के तहत२०७५ बेटियों को पैतृक संपत्ति (अंश) में समान हक दिया गया है । लैंगिक समानता और मानवाधिकारों के दृष्टिकोण से यह कदम ऐतिहासिक और प्रगतिशील प्रतीत होता है । परंतु जब हम इस कानून को नेपाल के जमीनी धरातल, विशेषकर मधेश क्षेत्र और पारंपरिक पारिवारिक व्यवस्था के प्रकाश में देखते हैं, तो इसके कई जटिल, व्यावहारिक और नकारात्मक पहलू सामने आते हैं ।
सकारात्मक एवं सैद्धांतिक पक्ष (प्रगतिशील दृष्टिकोण)
लैंगिक समानता की दिशा में कदम ः सदियों से चली आ रही उस व्यवस्था पर यह कानून चोट करता है, जहाँ बेटी को केवल ‘पराया धन’ माना जाता था ।
संरक्षणात्मक दृष्टि ः इस कानून का मूल उद्देश्य उन महिलाओं को सामाजिक और आर्थिक सुरक्षा देना था जो वास्तव में पीडि़त, विधवा, तलाकशुदा या असहाय स्थिति में मायके की तरफ आस देखती हैं ।
संवैधानिक प्रावधान ः नेपाल के संविधान ने लिंग के आधार पर भेदभाव का अंत किया है, और यह कानून संविधान की उसी भावना का प्रतिनिधित्व करता है ।
व्यावहारिक चुनौतियाँ, दुरुपयोग और सामाजिक–आर्थिक दुष्प्रभाव
यद्यपि कानून की मंशा समानता स्थापित करने की थी, परंतु व्यावहारिक धरातल और अदालती नजÞीरों के प्रकाश में इसके गंभीर परिणाम सामने आ रहे हैं ः
२०७५ की ‘कट–ऑफ तिथि’ का विरोधाभास और सर्वोच्च अदालत की नजÞीरें ः
नेपाल सर्वोच्च अदालत ने मुलुकी देवानी संहिता २०७५ के लागू होने के बाद अपने कई महत्वपूर्ण निर्णयों (नजÞीरों) में यह साफ किया है कि कानून का प्रभाव भविष्यवर्ती (Prospective) होता है, भूतप्रभावी (Retrospective) नहीं । अदालत के सिद्धांतों के अनुसार, २०७५ भाद्र १ से पूर्व विवाहित बेटियों का अपने पिता की संपत्ति में अंश का कानूनी दावा नहीं बनता ।
इसके कारण एक ही घर में “बहन बनाम बहन” का भेदभाव पैदा हो गया है । जिस बड़ी बहन की शादी २०७५ से पहले हुई, वह अदालत की नजÞीरों के तहत पैतृक संपत्ति से पूर्णतः वंचित रह जाती है, जबकि २०७५ के बाद विवाहित छोटी बहन को बड़ी खर्चे की पढ़ाई के साथ, दहेज की मांग और विवाह के खर्चो के बाद भी संपत्ति में हिस्सा मिल जाता है । यह विसंगति बहनों के बीच वैमनस्यता का बीज बो रही है ।
कानून की मूल मंशा का दुरुपयोग (जनकपुर केस स्टडी)ः
कानून इसलिए बनाया गया था कि विपत्ति के समय असहाय बेटी को अपने पिता के घर में सम्मानपूर्वक आश्रय मिल सके । परंतु आज इसका दुरुपयोग समृद्ध वर्ग द्वारा किया जा रहा है । जनकपुर (धनुषा जिला अदालत) का मामला इसका जीवंत उदाहरण है– जहाँ पिता भाई भाभी ने बेटी को लगभग ₹७० लाख खर्च करके MBBS कराया, फिर डॉक्टर से शादी कराने में ₹५०–६० लाख अतिरिक्त खर्च किए । बाद में ससुराल पक्ष बहू को MD के नाम पर नए कानून नेपाल सिविल संहिता २०७५ नाम पर मायके से पैतृक संपत्ति में हिस्सा माँगने के लिए अदालत भेज दिया । यह घटना दर्शाती है कि कानून सुरक्षा कवच न बनकर अनुचित वित्तीय दबाव का साधन बन रहा है ।
दोहरे अंश का विरोधाभास और न्यायिक नजÞीरें (Double Share Inequality)ः
सर्वोच्च अदालत ने अपने विभिन्न ऐतिहासिक फैसलों (जैसे रीता भण्डारी विरुद्ध श्री ५ को सरकार एवं अन्य) में संपत्ति अधिकार के संतुलन पर जोर दिया है । वर्तमान व्यावहारिक स्थिति में, २०७५ के बाद विवाहित महिला मायके (पिता) से अंश की हकदार बनती है और विवाह के बाद पति/ससुराल की संपत्ति में भी उसका विधिक अधिकार स्थापित होता है । वहीं दूसरी ओर, बेटा केवल अपने पिता की संपत्ति में ही हकदार है । यह व्यवस्था बेटों–बहू के प्रति एक नए प्रकार की असमानता पैदा कर रही है ।
भइया,Y भाभी और बच्चों का अनदेखा उत्पीड़न ः
इस व्यवस्था में सबसे बड़ा अन्याय उस भाई, उसकी पत्नी (भाभी) और उनके बच्चों के साथ हो रहा है । भाई अपनी पत्नी और बच्चों की जरूरतों का त्याग करके बहन की महँगी शिक्षा और शादी में सर्वस्व लगा देता है । लेकिन सब कुछ लुटाने के बाद, जब वही बहन पुनः संपत्ति का बंटवारा माँगती है, तो सबसे अधिक आर्थिक और मानसिक संकट उस भाई के परिवार को झेलना पड़ता है और भाई की शादी भी खतरे में आ जाती है ।
कृषि भूमि का विखंडन
नेपाल की तराई और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पूरी तरह कृषि पर निर्भर है । यदि शादी के बाद दूरदराज के क्षेत्रों में बसी बेटियां भी खेतों में हिस्सा लेंगी, तो उपजाऊ भूमि छोटे–छोटे टुकड़ों (fragmentation) में विभाजित हो जाएगी । इससे आधुनिक खेती असंभव हो जाएगी और ग्रामीण अर्थव्यवस्था ध्वस्त होगी ।
देखभाल और कर्तव्यों की अनदेखी ः
अधिकारों की बात करते समय कर्तव्यों को भुला दिया गया है । आमतौर पर बुजुर्ग माता–पिता का भरण–पोषण और देखभाल घर पर रहने वाला बेटा–बहू करते हैं । यदि बेटी केवल संपत्ति में अंश लेती है लेकिन माता–पिता के भरण–पोषण के दायित्व से मुक्त रहती है, तो यह सरासर अन्याय है ।
समाधान और व्यावहारिक संशोधन की आवश्यकता
इस कानून को न्यायसंगत बनाने और पारिवारिक ताने–बाने को टूटने से बचाने के लिए निम्नलिखित संशोधनों की तत्काल आवश्यकता है ः
संरक्षण–आधारित वर्गीकरण (Need-based Provision)ः मायके की संपत्ति पर अंश का अधिकार केवल उन बेटियों तक सीमित किया जाना चाहिए जो वास्तव में पीडि़त, असहाय, तलाकशुदा, विधवा या परित्यक्ता हैं ।
विवाह एवं शिक्षा व्यय का वैज्ञानिक समायोजन ः यदि कोई महिला मायके से संपत्ति में हिस्सा चाहती है, तो उसकी शिक्षा, विवाह और उपहारों पर परिवार द्वारा किए गए कुल व्यय का पारदर्शी मूल्यांकन करके उसे कुल अंश से घटाने का वैधानिक प्रावधान होना चाहिए ।
‘एक स्थान से अंश’ का संतुलन ः यदि विवाहित महिला को ससुराल की संपत्ति में पूर्ण अधिकार प्राप्त है, तो मायके की संपत्ति में उसका हक केवल आपातकालीन/विशेष स्थितियों में ही होना चाहिए ।
माता–पिता के भरण–पोषण का समान दायित्व ः यदि संपत्ति में अधिकार समान है, तो बुजुर्ग माता–पिता की देखभाल, इलाज और भरण–पोषण का कानूनी दायित्व भी पुत्र और पुत्री दोनों पर समान रूप से लागू होना चाहिए ।
निष्कर्ष
कानून का उद्देश्य समाज में समानता लाना होता है, न कि बहन–बहन में भेद करना और परिवारों में मुकदमों का बीज बोना । नेपाल सिविल संहिता २०७५ का अंश संबंधी प्रावधान यदि बिना इन व्यावहारिक संशोधनों के लागू रहता है, तो यह महिला सशक्तिकरण के नाम पर पारिवारिक बिखराव का कारण बनेगा । समय की माँग है कि विधायिका अदालत की नजÞीरों, २०७५ की कट–ऑफ विसंगति और जनकपुर जैसी घटनाओं से सबक लेते हुए इस कानून पर पुनर्विचार करे, ताकि वास्तविक पीडि़त महिलाओं को संरक्षण भी मिले, बहनों का आपसी प्रेम भी बचे और भाईभाभी–बहन का पवित्र रिश्ता भी सुरक्षित रहे ।

लेखिका


एक बात बताओ लडका लडके कि शादि होति हे बिना दहेज के लडकि बादमे बोलति हेया नहि भी मेरी मरजी से विवाह नहि हुइ हे जबर्जस्ती तो वो लडकि शुराल मे बवाल करति हे या कुछ नयाब तरिका जिससे लडका परेशान या उसके परिवार परिशान होते हे ।के वाद लडकि अपने माइके जाति हे वहाँ से कोचिङग लेति अब इतने पेसे दो नहि तो झुठे मुकसदमे मे फसाउङगी जो कि आजकल एक गिरोह हे उसमे (महिला सङगठन,वकिल,समाजिक अभियनता,पत्रकार ) एसब मिलके लडके को डराते है। पेसा दो नहि तो दहेज का केस लगवाएङगे ए कयो हो रहा हे.? 90% केस झुठौ हे भारत सरकार ने यहि डाटा कोरट से निकलवाया हे। दुसरि बात लडकि लडका मे विवाद बहोत बड गया लडकि खुद बोलति हे मे इनडिोेनडट हु । लडके के मा बाप पसनद नहि हे उनकि परोपरटि चाहिऐ ? जब दहेज लिया नहि तोएलिमनि कयो? ओर जब लडके के घर मे रहोगि तभी तो आपनलका हक हे नहि तो कयो तुम अपने आषिक के साथ बिना शादि के रहो लिव इन मे पेसा पति से लो इसकि समपति 50% ले फिर दुसरे के साथ यहि करेगि ए कुरिति हे समाज जो आज कल वयपार बन गया हे। ईश पर कोइ महिला अधिकार करमि बात नहि करति जेसे हि महिला के मायके कि बात आइ तो याद आ गया ए समाजिक भेदभाव कुरिति हे वाह जी🙏😀 मेरा साफ बात रहोगि तो हि सममान मिलेगा समपति पसिने कि कमाइ कि हराम कि नहि चाहे जो भी हो पेतिकृ हो या कमाइ किस होटल का खाना नहिखाते उसका बिल लडका कयो भरे भरे कोइ मजा किसि के साथ एसा नहि चलेगा समान कि बात हो लडके कि समपति मे अङस लगेगा तो लडकिके भी मायके मे अङस लगेगा।