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भूकम्प और सरकार ! आँसूओं की क़ीमत, कौड़ियों में, अधिकार, बेड़ियों में : गंगेश मिश्र

 

barpak-1भूकम्प और सरकार…
अनिश्चितता,
भूकम्प और सरकार,
दोनों की,
समानांतर कायम रही।
आँसूओं की क़ीमत,
कौड़ियों में,
अधिकार,
बेड़ियों में।
पुनर्वास के नाम पर,
ब्रह्म-लूट,
ऊपर से प्रकृति का क़हर,
धरती हिलती रही।
निरीह-भयातुर,
राहत को आतुर,
ठंढ से ठिठुरते रहे,
एक और झटके का,
इन्तज़ार करते रहे।
सरकार आश्वासन,
प्रकृति झटकों पे,
झटके देती रही।

 गंगेश मिश्र,२४ अप्रिल , कपिलवस्तु  |

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