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घोषणापत्र ! जनता को मूर्ख बनाओ, अपना स्वार्थ साधो और मौज करो : बिम्मी शर्मा

 

घोषणापत्र है स्थानीय निकाय के चुनाव का । पर उसमे चांद और मंगल ग्रह पर जाने की बात लिखी गई है ।

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बिम्मी शर्मा, वीरगंज, १ मई (व्यग्ँय )

यह घोषणापत्र का मौसम है । जैसे यह आम का भी मौसम है आम के पेड़ मे आम लटक रहा है । उसी तरह राजनीति के पेड़ में घोषणापत्र नाम का फल खूब पैदाईश हो रहा है । आम तो प्राकृतिक रूप से पेड़ पर फलता है पर घोषणापत्र को विभिन्न राजनीतिक दल और इस के नेता खूब उगाते हैं । चाहे यह घोषणापत्र नाम का फल स्वाद में जैसा भी हो, सड़ भी जाए पर कोई बात नहीं । इस को झूठ की जमीं पर बोआई और कटाई कर के देश और जनता को उल्लु बनाया जाता है ।

यह राजनीतिक दल और इस के नेता गण घोषणापत्र को ऐसे शान से बनाते और जनता को दिखाते हैं इन पर कार्य योजना या अमल यह खुद के पैसे से करेंगे । स्क्रिप्ट राईटर जैसा अंट, शंट लिख कर सपनों के संसार में गोते लगाने जैसा बनाया जाता है घोषणापत्र जिसका यथार्थ की पथरीली जमीन से दूर दूर तक कोई वास्ता नहीं हैं । हवा, हवाई योजना को अमली जामा तो पहना नहीं सकते इसी लिए घोषणापत्र में जो भी मन में आता है लिख देते हैं । किसी के बाप का क्या जाता है । न हिगं लगे न फिटकरी बस जनता को मूर्ख बनाओ और अपना स्वार्थ साधो और मौज करो ।

और मूर्ख जनता भी मूफ्त में मिल रही रेवड़ी की तरह घोषणापत्र को भी चाट रही है । मूर्ख जनता यह क्यों नही समझती की विभिन्न राजनीतिक दलो का यह घोषणापत्र उनके दल के नेताओं के लिए जीविका का साधन यानी पोषणपत्र है और यह घोषणापत्र को साकार करने के लिए देश के नागरिकों द्वारा अपने खून, पसीने की गाढी कमाई जो विभिन्न टैक्स के रूप में सरकार लेती है । उसी के जरिए से यह घोषणापत्र सार्थक होगा । इन नेताओं के घर में कोई पैसे का कूंवा तो है नहीं कि उसी से बाल्टी भर पैसा पानी की तरह उलीच कर अपने घोषणापत्र को पूरा करने में लगाएगें । तरबुजे के उपर चाकू गिरे या चाकू के उपर तरबुजा । कटना तो आखिर तरबुजे को ही है । जनता की भी हालत वही है । चुनाव हो, घोषणापत्र का कार्यान्वयन हो आखिर में पैसा तो जनता की अंटी से ही जाएगा न ।

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इन राजनीतिक दलों का घोषणापत्र पढ़ कर या सुन कर अच्छी, खासी नींद आ जाती है । जिनको नींद न आने की बिमारी हो वह रात में एक बार यह घोषणापत्र पढ़ ले तो खर्राटें भरने लगेगा । कहीं नींद की दवा बनाने वाली दवा कंपनियों में ताला न लग जाए ? यह घोषणा पत्र इतने मनोयोग से लिखा और पढा जाता है कि जैसे कोई हनुमान चालीसा या सत्यनारायण भगवान की कथा हो । बहुत सें लोगों को जैसे इन धार्मिक और पौराणिक कथाओं पर बिश्वास नहीं होता उसी तरह देश के बहू संख्यक नागरिकों को इन राजनीतिक घोषणापत्र में रत्ति भर भी बिश्वास नहीं है ।

यह राजनीतिक घोषणापत्र हाथी के दिखाने के अलग और खाने के अलग दांत जैसा ही है । बच्चों को आईस क्रीम और टॉफी दे कर ललचाने जैसा ही है यह घोषणापत्र । जैसे बच्चों को बर्फ खाने को दो तो तुरतं पिघल कर खत्म हो जाता है । इस में देने वालों का क्या दोष है ? बर्फ की प्रकृति ही है पिघलने की उसी तरह घोषणापत्र आकर्षक बना कर बच्चों की तरह जनता को आकर्षित किया जाता है । उस को पूरा करने का ठेका इन नेताओं ने थोडे ही लिया है । घोषणापत्र बना दो, चार दिन पढिए, समाचार लिखिए उसके बाद यह घोषणापत्र कुडेदान में जा कर राज करेगा । जो इसकी नियति ही है ।

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घोषणापत्र है स्थानीय निकाय के चुनाव का । पर उसमे चांद और मंगल ग्रह पर जाने की बात लिखी गई है । शहर, सड़क और मुहल्ले की सरसफाई, स्ट्रीट लाईट, सार्वजनिक शौचालय के बारे में इन घोषणापत्रों में कुछ नहीं है । इस में है तो प्रत्येक नागरिकों की वार्षिक आमदानी हजारो रुपएं नहीं डलर और हजारों मेगा वाट बिजली का उत्पादन । इतने या उतने मेगा वाट बिजली के उत्पादन की बात यह नेता गण अपने घोषणापत्र में ऐसे करते हंै जैसे कोई सरकारी नल से पानी न आने पर घर में चापाकल गाड़ कर पानी की व्यवस्था करता है । धत । जिन राजनीतिक दलों को राष्ट्रीय और स्थानीय चुनाव के बीच का फर्क नहीं मालूम है वही सडे, गले नेता गण सब हम पर राज करते हैं ।

बिजली उत्पादन ही नहीं समुद्र में जहाज चलाने का शेख चिल्ली का सपना भी इन राजनीतिक घोषणापत्र में समेटा गया है । जिस देश में तीसरे मूल्क से आया हुआ सामान भी पड़ोसी के जहाज में उधार ले कर या किराए पर ले कर काम चलाया जाता है उस देश में तलवार की तरह तेज धार की जीभ वाले नेता समुद्र में जहाज चलाने का मुगेंरी लाल के हसीन सपने खुद भी देखते हैं और दूसरों को भी दिखाते है । इन घोषणापत्रों में राजनीतिक दल और इन के नेता आश्वासन ऐसे बांटते है जैसे सत्य नारायण की कथा के बाद प्रसाद । प्रसाद से पेट नहीं भरता उसी तरह इन आश्वासनों से भी देश के नागरिकों का पेट नहीं भरता । बस इन के दल के कार्यकर्ता और हनुमान ही इन आश्वासनों को अपने लिए राशन का कोटा बना कर जनता से ही पैसे ऐठंते है ।

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राजनीतिक दल और इनके नेताओं का काम ही है भाषण और आश्वासन दे कर वोट बटोरना । जो भाषण से पिघल जाए तो काम बन गया । नहीं तो खुद के चुनाव में जीतने पर यह करने या वह करने का आश्वासन दे कर पिघलाया जाता है । जो पत्थर दिल मतदाता है वह तो पिघलेगा नहीं तब उसको नगद नारायण से खुश किया जाता है । यानी कि वोट के बदले नोट दे कर मतदाता को अपनी तरफ खिंचा जाता है । वह मतदाता ही क्या जल्दी पिघल जाए या खींच कर इन राजनीतिक दलों के पास चला जाए । इसी लिए घोषणापत्र तो दूर का ढोल है । जो बजेगा भी तो जल्दी सुनाई नहीं देगा । आखिर में यह घोषणापत्र देश के सर्वसाधारण नागरिकों के लिए शोषणपत्र ही तो है जिस पर चुनाव में वोट दे कर अपने ही शोषण के लिए देश के नागरिक राजी, खुशी दस्तखत कर देते हैं ।

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