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फिर एक सांझ करती होगी मेरा इन्तजार : मनीषा गुप्ता

 

नमस्कार हिमालिनी पत्रिका का आभार जो आप लोगो के समक्ष अपनी लेखनी ले कर आती हूँ आज कुछ मनोभाव आप लोगो के समक्ष ले कर आई इसी उम्मीद से की आप के दिलो में इसके कुछ अंश जरूर बसर करेंगे मैं मनीषा गुप्ता

@कुछ खामोशी के अफ़साने बन

रात के साए कुछ अनसुलझी सी खामोशी
बहुत करीब तेरे होने का एहसास पर तुझ से मेरी दुरी यह भी तो एक सच है जो किसी कदम्ब के वृक्ष सा खड़ा है ।
चारो तरफ बर्फ की सी ठिठुरती तेरी याद मुझ से लिपट कर एक गर्माहट सी देती है ।
पर अचानक किसी स्वप्न के टूटने जैसा तेरे मेरे पास न होने का दर्द फिर एक कसमसाहट सी दे जाता है ।
काश समझा पाती तुम्हारे वज़ूद का अर्थ मेरे जीवन में उस धुरी सा है जो चारो तरफ घूम कर वापस वही आ जाती है ।
यूँ तो मुस्कराहट मेरे चेहरे की पहचान है पर एक खोखला सा वो अक्स जो ओस की बूंद पड़ने से रोज़ सुबह खिल उठता है एक बार फिर मुरझा जाने के लिए ।
सुनो आज क्यों फिर इतने बरसों बाद फिर एक लड़कपन सा जाग गया है एक अल्हड़ सा मन जो बुनने लगा है ।सतरंगी से खुबाब और उन खुबाबो को हकीक़त से दूर समझना ही नहीं चाहता …देखो अचानक ही उन सपनो की लालिमा मेरे मुख मंडल को आलोकिक्त कर देती है और अल्हड़ सी लड़की की तरह मैं शर्माने सकुचाने लग जाती हूँ ।
शायद इन पलों के कोमल एहसास को जी लेना चाहती हूँ , चाहती हूँ पंख फैला कर उड़ना खुले गगन में महसूस करना उस पल की ठंडक अपने चेहरे पर बटोर लेने की कसक जो सपने सिर्फ पलकों में कैद थे उनको पूरा कर एक बोझ से पलकों को रिहा करता हुआ मेरा मन तुमको जीना चाहता है , क्यों , आखिर क्यों आज इतने सालों बाद तुम मेरे उस खुबाब की ताबीर बन कर मेरे सोए हुए सपनो को जगाने आए हो गर जिंदगी की राह तुम संग थी तो क्यों फिर क्यों हमें मंजिल अलग मिली …जानती हूँ तुम्हारी सोच जो बहूत परिपक्व है पर मैं आज अपनी परिपक्वता को अलग रख कुछ बेवकूफियां नादानियाँ करना चाहती हूँ ।
जानती हूँ तुम मुझे सुन नहीं रहे देख भी नहीं रहे फिर भी
अपनी बात तुम तक पहुचाना चाहती हूँ बोलो क्या पूरा कर पाओगे मेरी इस नादानियों भरी मांग को जो इस रिश्ते की सत्यता नहीं स्वीकारती पर न सही मैंने तो तुमको स्वीकार लिया क्या वो काफी नहीं क्यों बँधु हर बार मैं ही सही गलत के बंधन में ।
पर हां , तुम तुम को नहीं बाँधूँगी अपनी इस अल्हड़ सोच में क्योंकि जानती हूँ तुम एक झरने की तरह बहते तो हो पर अपनी सीमाओं में बंध कर
लेकिन मैं आज सारे बंधनों को तोड़ कर उन्मुक्त नदी की तरह…….

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