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हिमालिनी 23वें वर्ष में, जो साथ चले या छोड़ गयें सभीको आत्मिक आभार : श्वेता दीप्ति

Shweta Deepti डा. श्वेता दीप्ति
 

दूसरों को गिराने की निकृष्ट सोच से बच कर अगर हम खुद को उठाने की ओर ध्यान दें, तो हमें हमारे गन्तव्य की प्राप्ति अवश्य होगी 

डॉ श्वेता दीप्ति, हिमालिनी,अंक जनवरी २०२०।संयम के साथ निर्भीकता का होना जरूरी है

।।यथा द्यौश्च पृथिवी च न बिभीतो न रिष्यतः। एवा मे प्राण मा विभेः।।१।।( अथर्ववेद)

अर्थात् जिस प्रकार आकाश एवं पृथ्वी न भयग्रस्त होते हैं और न इनका नाश होता है, उसी प्रकार हे मेरे प्राण! तुम भी भयमुक्त रहो ।व्यक्ति को कभी किसी भी प्रकार का भय नहीं पालना चाहिए । भय से जहां शारीरिक रोग उत्पन्न होते हैं वहीं मानसिक रोग भी जन्मते हैं । डरे हुए व्यक्ति का कभी किसी भी प्रकार का विकास नहीं होता । संयम के साथ निर्भीकता होना जरूरी है । डर सिर्फ ईश्वर का रखें । जहाँ आपकी नजरें नहीं झुके, जहाँ आपकी आत्मा पर कोई बोझ ना हो । जब आपके कर्म सही होंगे, तो आपको किसी भी प्रकार का भय नहीं होगा । दूसरे क्या करते हैं, दूसरे क्या सोचते हैं, इन बातों में अपना वक्त जाया ना कर, अगर हम यह देखें कि हम क्या कर रहे हैं और इससे हमें क्या फल मिलेगा तो निःसन्देह हमारी उन्नति के मार्ग प्रशस्त होंगे । दूसरों को गिराने की निकृष्ट सोच से बच कर अगर हम खुद को उठाने की ओर ध्यान दें, तो हमें हमारे गन्तव्य की प्राप्ति अवश्य होगी । आवश्यकता सिर्फ विश्वास की, उम्मीद की और हौसले की है ।

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२०२० जनवरी का यह अंक पूर्व वर्षों की ही भाँति कई विशेष सन्दर्भों पर आधारित है । जनवरी का अंक इसलिए हर वर्ष विशेष होता है क्योंकि, हिमालिनी प्रत्येक जनवरी अपने हिस्से अनुभवों का एक और वर्ष जोड़ लेती है । हिमालिनी ने सफलता के साथ अपने बाइस वर्ष पूरे किए हैं । इस सफर में जिनका साथ मिला, जो साथ चले या छोड़ गए उन सबका आत्मिक आभार । परिवर्तन सृष्टि का नियम है, इसलिए हर परिवर्तन को दिल से स्वीकार कर आगे की राह तय करनी चाहिए ।

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२०२० को नेपाल सरकार ने भ्रमण वर्ष घोषित किया है । हिमालिनी कई वर्षों से नेपाल के पर्यटन स्थलों के विषय में जानकारी मूलक आलेख प्रकाशित करती आई है । जनवरी का यह अंक नेपाल विजिट २०२० को समर्पित है ।

जनवरी इसलिए भी विशेष है क्योंकि यह महीना ‘विश्व हिन्दी दिवस’ का होता है, जो हिन्दी प्रेमियों के लिए महापर्व है । हिन्दी यानि वह सर्वसम्मत भाषा जो एक सूत्र में हमें बाँधती है, जो हर भाषा को सगी मानती है क्योंकि, हिन्दी का दिल बहुत बड़ा है और इसका सूर्य कभी अस्त नहीं होता —

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हिन्दी हमारी आन है, हिन्दी हमारी शान है
हिन्दी हमारी चेतना, वाणी का शुभ वरदान है ।

विश्व हिन्दी दिवस की शुभकामनाओं के साथ यह नववर्ष हमारी आकांक्षाओं को एक नई उड़ान दे ।
आइए नई उम्मीदें, नई ख्वाहिशें, नए सपने और नए कल के साथ नववर्ष का आगाज करें ।

डा. श्वेता दीप्ति
सम्पादक, हिमालिनी । पूर्व अध्यक्ष- केन्द्रीय हिंदी विभाग, त्रिविवि ।

 

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