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कोरोना का कहर और छलकता राष्ट्रवाद : रणधीर चौधरी

 

रणधीर चौधरी, जनकपुरधाम, 29 मार्च2020 | भारत की ओर से कोरोना अर्थात कोभिड १९ रोकथाम तथा नियन्त्रण हेतु नेपाल के समक्ष प्रस्ताव पेश किया गया है । भारत वर्तमान में खुद  कोरोना से जूझ रहा है ऐसे में अपनी पडोसी के लिए ऐसा प्रस्ताव लाना भारत के लोकतान्त्रिक चरित्र को दर्शाता है और मानवता का एक उदाहरण भी प्रस्तुत करता है । पडोसी देशों में आवश्यकताअनुसार पूर्वाधार विकास और दक्ष जनशक्ति भी सहयोग किया जा सकता है ऐसा प्रस्ताव किया गया है जिसकी स्वीकारोक्ति नेपाल के विदेश मंत्री प्रदिप ज्ञवाली द्वारा किया गया है ।
नेपाली मिडिया मे आए खबर को आधार माना जाए तो मंत्री ज्ञवाली का कहना है कि नेपाल को अभी आरआरटी से भी अधिक उपचार के लिए स्वास्थ्य उपकरणों की आवश्यकता है । स्वास्थ्य सामग्री पर अधिक जोर है नेपाल का ।
बिल्कुल सही कहा मंत्री ज्ञवाली ने । नेपाल में उपकरण सामग्री की अधिक आवश्यकता है । नेपाल खुद से वैसा सामग्री बनाने मे सक्षम भी नही है । नेपाल ने सुरक्षा सामग्री तथा उपकरण खरीद के लिए नेपाली जहाज चीन भेज चुका  है जो कि सामग्री लेकर आ भी चुका । क्षणिक खुशी जरूर होगी कि सरकार आवश्यक उपरकण ला कर गरीब नेपाली जनता को कोरोना के कहर से बचाने का प्रयास तो कर रहा है ।
परंतु सूत्रों का माना जाए तो कोरोना जोखिम न्यूनिकरण उच्चस्तरीय समिति और स्वास्थ्य मन्त्रालय के योजना तहत सरकारी पैसा में जहाज चार्टर कर किसी अमुक व्यपारी का सामान लाने के लिए जहाज चीन भेजा  गया है । समाचार के मुताबिक चीन सरकार ने कोरोना भाइरस संक्रमण नियन्त्रण के लिए आवश्यक सभी सामान चीन की ओर से ही दिए जाने की बात थी । परंतु चीन से लेने  के जगह सरकार ने एसे गम्भीर मामलों में भी व्यपारीकरण को स्थान देना उचित समझा । गौरतलब है की दक्षिण एसिया में और खासकर नेपाल जैसे गरीब देशों में महामारी मे भी सरकार और सत्ता व्यक्तिगत मुनाफा के पीछे अपना उर्जा नष्ट करने मे स्वभिमान समझते हैं ।
स्पेन के राजधानी मे चीनी कम्पनी द्वारा निर्मित कोरोना भाइरस (कोभिड– १९) परीक्षण की जानेबाली किट्स प्रयोग में रोक लगाया गया है । शाेधकर्ताओ की माने तो वह किट्स विश्वसनीय नही है । नेपाल को बारिकी से समझना होगा इन चीजों को ।
नेपाल मे अभी तीन तिहाइ की सरकार है, कम्युनिस्ट सरकार । जो अपने आपको जनतामुखी होने का दावा पेश करती है । जनता मुखी होना भी चाहिए । परंतु यह दावा सिर्फ शब्दो‌ं मे नही अपितु व्यवहार मे दिखना जरुरी होता है । किसी भी सरकार की असली परीक्षा तब प्रारम्भ होती है जब देश किसी संकट मे हो । और वैसे हालातो मे सरकार किस तरह से अपने जनता के हित मे काम करती है । चाहे सरकार लोकप्रियतावादी ही क्यू न हो । हाँ, ऐसे हालातों में किसी भी राष्ट्रवादी सरकार के लिए उनके कथित राष्ट्रवाद की अग्नि परिक्षा भी होता है ।
जिस तरह तीन महीनो से कोरोना ने विश्व को तबाह करते आ रहा है तीन महीनों में नेपाल को आवश्यक स्वास्थ्य उपकरण खरीद करने की आवश्यकता महसूस नही् हुवा और जब नेपाल मे कोरोना संक्रमित देखे जाने के बाद अचानक से खरीद प्रक्रिया का झण्झट भरी प्रक्रिया शुरु की गयी है इससे साफ पता चलता है कि नेपाल सरकार जनस्वास्थ्य प्रति कितने बफादार और संबेदनशील है । आज जिस तरह भारत का प्रस्ताव को यह कहकर टाला जा रहा है कि अभी कोरोना नियन्त्रण के लिए आवश्यक पूर्वाधार निर्माण की उतनी आवश्यकता नही है इससे तीन बातों का आकलन किया जा सकता है । पहला, कोरोना से लडने के लिए आवश्यक पूर्वाधार निर्माण के लिए नेपाल खुद सक्षम देश है । दूसरा, भारत अगर खुद आ कर यह निर्माण कार्य मे सहयोग करता है तो नेपाल के सिस्टम चला रहे कुलीनतन्त्र को इसमें कोई आर्थिक फायदा होने की सम्भावना नही है । तीसरा, अगर भारत के किसी भी प्रस्ताव को माना जाता है तो चीन को दुःख पहुँच सकता है । कोरोना के गृहनगर चीन की वजह से दुनिया मे तबाही मची है । चीन हमदर्दी की आड मे दुनिया को कोरोना से लडने के लिए अपना सहयोग जताता नजर तो आता है परंतु विश्वशक्ति बनने की लालसा को अग्रपंक्ति में भी रखता है । चीन एक कम्युनिष्ट देश है । कम्युनिस्ट शासन की बुनियाद होती है मानव नरसंहार । आनेबाले दिनो में यह अवश्य खुलकर आएगा की चीन से निकला भाइरस जो दुनिया मे तबाही मचाने में सफल हुआ वह आखिर प्रकृतिक था या चीन निर्मित जैविक हथियार ।
फिलहाल तो नेपाल को आवश्यक है कि देश को कोरोना से लडना । इसपे नियन्त्रण प्राप्त करना । अपने जनता मे बैठा कोरोना कहर से जनता को बाहर लाना । और साथ ही, भूराजनीतिक कदम को कुशलता से आगे बढाना । भारत की स्वतःस्फुर्त प्रस्ताव पर नेपाल को गहनता के साथ बिचार कर आगे बढने की आवश्यकता है ।

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