दिशाहीन मनुष्यता का निर्माण और वर्तमान संकट : अजय कुमार झा
अजय कुमार झा, जलेश्वर | आज के इस विकट परिस्थिति को हम गंभीरता से अध्ययन करेंगे, तो हमें पता लगेगा कि हमारी जो जीवन शैली थी उसे हमने खो दिया है। हमने आधुनिकता के अंधा अनुकरण के कारण परंपरागत कोहिनूर को कचरे में डाल दिया और कचरा उठाकर सीने से लगा लिया है। आज एक व्यक्ति अपने जीबन के महत्वपूर्ण 30 वर्ष शिक्षा में समर्पित करने के वाद भी उस गुरुकुलीय पद्दति के 20 वर्ष में उत्पादित व्यक्तित्व के तुलना में 10 प्रतिशत भी लायक नहीं हो पा रहे हैं।
गुरुकुल से दीक्षित प्रत्येक व्यक्ति में 20 वर्ष के शिक्षण प्रक्रिया के दौरान शारीरिक और मानसिक स्वास्थ तथा समरक्षण के लिए यौग, युद्ध कौशल, रोग की पहचान और चिकित्सकीय ज्ञान, जडीबुटी का अध्ययन, नाडी विज्ञान (नाडी के अध्ययन से रोग को पता लगाना) के साथ रोगों के मूल कारण में कफ़ज पित्तज और वायुज सम्बन्धी शास्त्रीय और प्रायोगिक ज्ञान, निरोगी जीबन हेतु रसायन तथा दैनिक जीबन में जड़ीबूटियों का ( ऋताहार, हिताहार,मिताहार) के अनुसार प्रयोग का बृहद ज्ञान, संतुलित जीबन शैली तथा वातावरण को बदलकर रोगों से मुक्ति दिलाने की क्षमता, मन्त्र शक्ति से व्यक्तित्व विकास तथा पर्यावरण शुद्धि का ज्ञान, वास्तु विज्ञान के साथ साथ ज्योतिष और खगोलीय विद्या का ज्ञान, शल्य चिकित्सा सम्बन्धी सुश्रुत संहिता का ज्ञान, गो-पालन तथा गो-चिकित्सा का सम्पूर्ण ज्ञान लगायत अनेकों दिव्य संस्कार से युक्त एक दैविक चेतना से संयुक्त महामानव का निर्माण होता था। क्या आजके अंग्रेजी शिक्षण पद्दति इसका 10 प्रतिशत भी आज के युवायों को दे पाने में सक्षम है? यदि नहीं, तो फिर, हम विकासोंन्मुख है या विनासोंन्मुख!
अंग्रेजो ने अपनी व्यापार और शासन विस्तार हेतु हमें हमारी दिव्य श्रोत से अलग कर जड़ता लाद दिया और हम उसकी षडयंत्र को सहजता से स्वीकार भी कर लिएँ। आज कोरोना के भठ्ठी में भस्म हो रहे यूरोप और अमेरिका पश्चाताप की अग्नि में भी जल रहा है। आज हमारा सनातन वैदिक शिक्षण वैज्ञानिक आधार पर भी चरमोत्कर्ष पर होता और मानवता को इस छोटीसी विषाणुओं के आगे मृत्यु वरन करने के लिए मजबूर नहीं होना पड़ता। वैसे आज भी दुनियाँ भारत की ओर ही आशा की दृष्टि से देख रही है। बाबा रामदेव के पतंजलि संस्थान की ओर ही सबकी दृष्टि लगी हुई है। जड़ी बूटियों का सहारा लिया जा रहा है। भयाक्रान्त यूरोप और अमेरिका अपनी सारी आधुनिकता और वैज्ञानिक शोध को असफल होते देख भौतिक सुविधाओं की धज्जियाँ उड़ा रहे हैं। जिसको पाने के लिए जीबन गवाँया उससे जीबन बचाने का कोई उपाय न देख लोग सिकंदर की भाँती किम्कर्तव्य विमूढ़ दिख रहे है। आज यह तथाकथित आधुनिक शिक्षा हमें जीवन के उस विन्दु पर लाकर खड़ा कर दिया है, जहाँ कभी भस्मासुर को किया था। शिक्षा वह है, जिससे हमारे जीवन आनेवाली छोटी बड़ी सभी बाधाओं से स्वतःस्फूर्त लड़ने की क्षमता से हमें गौरवान्वित करे। आज हम पूर्णतः पराधीन हैं। इस पराधीनता को हमने स्वतंत्रता का खोल लगा दिया है। आज एक विशिष्ट विद्वान् को अकेले गाँव में छोड़ दिया जाय तो, वे अपने को दो महीने भी नहीं संभाल सकेगा। सबसे ज्यादा विक्षिप्त और आत्म हत्या यूरोपेली और अमरीकी देसों में ही क्यों होता है? संसार में आज सर्वाधिक शिक्षित देस माने जाते है वो। फिर यह दुर्घटना क्यों? इसका मूल कारण उग्र भौतिकवादी शैक्षिक पाठ्यक्रम और जीवन का चरम लक्ष्य व्यापारी करण ही सामने आएगा। और यह महाविनास का द्योतक है। अतः अब मूल की ओर लौटने का समय आ गया है। भारत के गुरुकुलीन पद्धति को समझने तथा उसको आज के युग सापेक्ष बनाकर समाज के समक्षा उपस्थित करने का समय आ गया है। वर्षो पहले की गई राजनैतिक षडयंत्र और मूढ़ता को त्याग मानवता केन्द्रित जीवन के लिए आगे बढ़ने का समय भी अब हमारे सामने है।
भारत की गुरुकुलीय शिक्षण व्यवस्था को नष्ट करने के उद्देश्य से ही सन 1858 में भारतीय एजुकेषन एक्ट की रूपरेखा बनाई गई थी जिसके अनुसार कान्वेंट स्कूल और इस्लामिक मदरसे तो चलाये जाएंगे पर सनातनी गुरुकुल और संस्कृत भाषा पर प्रतिबन्ध लगाया जाएगा।इसकी ड्राफ्टिंग ‘लोर्ड मैकोले’ ने की थी लेकिन उसके पहले उसने यहाँ (भारत) के शिक्षा व्यवस्था का सर्वेक्षण कराया था। मैकाले का दो अंग्रेज अधिकारी जी डब्ल्यू लिटनर और टामस मारथो दोनों ने सन 1823 के आसपास लिटनर जिसने उत्तर भारत का सर्वे किया था।उसने लिखा है कि यहाँ 97ः साक्षरता है और टामस जिसने दक्षिण भारत का सर्वे किया था उसने लिखा कि यहाँ तो 100: साक्षरता है।
उस समय जब भारत में इतनी साक्षरता थी तब मैकोले का स्पष्ट कहना था कि भारत को हमेशा-हमेशा के लिए अगर गुलाम बनाना है और सनातन संस्कृति का अंत करना होगा। इनकी “देशी और सनातनी सांस्कृतिक शिक्षा व्यवस्था” को पूरी तरह से ध्वस्त करना होगा और उसकी जगह “अंग्रेजी शिक्षा व्यवस्था” लानी होगी और तभी इस देश में शरीर से सनातनी हिन्दू लेकिन दिमाग से अंग्रेज पैदा होंगे।
1858 के एक्ट में सबसे पहले गुरुकुलों को गैरकानूनी घोषित किया जब गुरुकुल गैरकानूनी हो गए तो उनको मिलने वाली सहायता जो समाज के तरफ से होती थी वो गैरकानूनी हो गयी और ठप कर दी गई। फिर संस्कृत भाषा को गैरकानूनी घोषित किया गया और देश के सारे गुरुकुलों को घूम घूम कर खत्म कर दिया गया उनमे आग लगा दी गई और उसमें पढ़ाने वाले गुरुओं को मारा- पीटा, जेल में डाला गया।
1850 तक इस देश में ’7 लाख 32 हजार’ गुरुकुल हुआ करते थे और उस समय देश में इतने ही गाँव थे ’7 लाख 50 हजार’, मतलब हर गाँव में औसतन एक गुरुकुल और ये जो गुरुकुल होते थे। वो सब के सब आज की भाषा में उच्च षिक्षा के हुआ करते थे उन सबमे 18 विषय और 64 कलाओं को पढाया जाता था और ये गुरुकुल समाज के लोग मिल के चलाते थे। आज से 70 वर्ष पहले तक भारत में गुरुकुल की संख्या 39567 थी, आज सिर्फ 34 रह गए। क्या, किसीने इसपर ध्यान देने की आवश्यकता समझी? नहीं, तो फिर 284 मदरसे से 42348 कैसे हो गए? इसाई मिसनरी के हजारों स्कुल कैसे खुल गए? जीबन दायिनी गुरुकुलका लोप हो गया। संविधान में धारा 28, 29, 30 हिन्दू विरोधी ऐक्ट को कैसे जगह दी गई? जबकि संविधान निर्माता ज्यादातर हिन्दू थे?
विल डुरांट (1885-1981) ने लिखा है:- “भारत से ही हमारी सभ्यता की उत्पत्ति हुई थी। संस्कृत सभी यूरोपियन भाषाओं की माँ है। हमारा समूचा दर्शन संस्कृत से उपजा है। हमारा गणित इसकी देन है। लोकतंत्र और स्वशासन भी भारत से ही उपजा है।” विल डुरांट (1885-1981) इन्हीं विल डुरांट ने एक पुस्तक लिखी उसमे लिखा जब ब्रिटिश भारत आए उस समय भारत में शिक्षा का ढांचा सुगठित था। बच्चे गुरुकुल में पढाई करते थे। ब्रिटिशों ने इस प्राचीन शिक्षा व्यवथा को ध्वस्त कर दिया। भारतीय युवाओं को इस प्रकार से जाल में फसाया की अगर आप वर्तमान शिक्षा पद्धति लेते हैं बजाय गुरुकुल शिक्षा पद्धति के तो आपको तत्काल सरकारी नौकरी दे दी जाएगी। इस सरकारी नौकरी के लालच में लोग गुरुकुल की बजाए मैकाले के स्कूलों में जाने लगे। जिससे गुरुकुल का अस्तित्व जाता रहा, साथ साथ भारत की बर्बादी की कहानी भी लिखाता रहा।
अंग्रेजो से पहले बख्तियार खिलजी नामक एक तुर्क मुस्लिम लूटेरा, जो बिमारी के कारण मरणासन्न हो गया था। हकिम जबाब दे दिया था। उस समय नालंदा के प्रमुख आचार्य राहुल श्रीभद्र ने उसे बचाया, जिसके उपहार स्वरुप उस नामक हराम आतंकी ने नालंदा विश्वविद्यालय को 1199 इस्वी में जला कर पूर्णतः नष्ट कर दिया।
इस प्रकार ज्ञान के असीम भण्डार नालंदा, विक्रमशिला, तक्षशिला लगायत के अनेकों हिन्दू विश्वविद्यालयों को नष्ट कर दिया गया।
बाँकी बचे गुरुकुलो को अंग्रेज तथा सेकुलर कांग्रेसीयों ने अस्तित्वहीन बनाकर समाज द्वारा पूज्यनीय हो गए।
आज भी नेपाल और भारत के लगभग 75 प्रतिशत लोग परंपरागत तरीके से परंतु अस्त-व्यस्त अवस्था में जीने को बाध्य हैं। आधुनिक वैज्ञानिक प्रविधि उनके लिए कुछ खास मायने नहीं रखते और नहीं सरकार के तरफ से उन्हें उस रास्ते पर ले जाया जा रहा है, बल्कि उन्हें अपनी जड़ को ही काटने पर मजबूर किया जा रहा है। ध्यान इस पर नहीं दिया जा रहा है कि जड़ तो कट जाएगा और आसमान को छू नहीं पाएंगे; फिर हम रहेंगे कहां! हम जिएंगे कैसे? इन बिंदुओं पर गंभीरता पूर्वक विचार किए बगैर ही हमने अधककचरे विज्ञान को सर पर लेकर नाचना शुरू कर दिया। और आज हम उसी विज्ञान के गुलामी के कारण सामूहिक मृत्यु को प्राप्त हो रहे हैं।
हमें गंभीरता से इस बात पर ध्यान देना होगा, विचार करना होगा, और मनन करना होगा कि यदि यह लक डाउन बढ़ता ही गया जो की संभावना है 3 महीना 4 महीना 6 महीना चला जाए तो शायद हम आम लोग सुरक्षित नहीं हो पाएंगे। कोरोना वायरस से लड़ने के लिए टीका को निर्माण करने में कम से कम 1 बरस लगेंगे। जनता तक इसे पहुंचाने में समय लगेगा। तब तक आम नागरिक के भविष्य का क्या होगा ? लोग भुखमरी से मर जाएंगे। समाज में लुट खसोट और मारकाट का भयानक दृश्य उत्पन्न हो जाएगा। आज भी कोई अपने को सुरक्षित महसूस नहीं कर पा रहा है। सरकार या कहें पुलिस प्रहरी कहाँ कहाँ पहुँच पाएगी! षडयंत्रकारी और आतंककारी प्रवृत्ति के लोग क्या चुप बैठेंगे? चावल-दाल, सब्जी, दूध, औषधि, आदि सामान्य वस्तुओ पर नही आज 100% लोग बाजार पर आश्रित हैं। इसीका परिणाम है यह तालाबंदी का पीड़ा। अतः अब हमें अब यह सोचने पर मजबूर करता है, कि हम अपनी परंपरागत जीवनशैली को आधुनिकीकरण न करके जड़ से ही काट दिया है। आज जिसके पास दसों बीघा जमीन है वह भी लाचार पड़ा हुआ है और जिसके बैंक में करोड़ों रुपया रखा है वो दाने-दाने को मोहताज हो रहे हैं। सरकार चाहे जितने वादे कर ले, दावे कर ले, वह हर एक व्यक्ति के पास नहीं पहुंच सकती। हर एक व्यक्ति के जीवन शैली को, खानपान को वह व्यवस्था नहीं कर सकती। इस अवस्था में आज अगर हम अपने ग्रामीण जीवन शैली में जीते रहते तो हमें कपड़ा और कुछ छोटी मोटी चीज के अलाबा बाजार पर आश्रित नहीं होना पड़ता। हम स्वच्छ जल, दूध, सब्जी, अन्न लगायत के जोबनोपयोगी अधिकाँश वस्तुएँ अपने फ़ार्म हाउस में उत्पादन करके इस तरह के वर्षों तक के बन्दी को बड़ी सहजता से झेल लेतें।
यह कोरोना वायरस का कोई हैसियत नहीं जो हमें नष्ट कर सके, परंतु हमने खुद अपनी जीवन शक्ति को, जीवन शैली को, ऊर्जा को नष्ट किया है। इस वैश्विक महामारी को दोष देकर हम शुतुरमुर्ग की तरह रेत में अपने सर को छुपा रहे हैं। लोगों के ताना से खुदके बेबकूफी को बचाने प्रयास कर रहे हैं। समस्या के जड़ में पहुँचने का प्रयास नहीं किया जा रहा है। सिर्फ तात्कालिक समाधान खोजकर बहादुरी दिखाई जा रही है। तात्कालिक वाह वाही लूटना घटिया मानसिकता का लक्षण है। हमें पूर्णकालिक समाधान खोजना चाहिए, या कहें की हमारे पूर्वज महर्षियों के द्वारा स्थापित समग्र जीबन शैली और शिक्षण पद्धतिको आज के समय सापेक्षता में अंगीकार करना होगा। यह मात्र हमें ही नहीं वल्कि समग्र मनुष्यता को सनातन जीवन शैलीको अपनाना होगा। अन्यथा आज जो खुदको धरती के स्वर्ग और सर्वोत्तम मानव मानते हैं, उनका यह दयनीय अवस्था कदापि नहीं होता। वे लोग शतप्रतिशत आधुनिक शिक्षा से संयुक्त हैं। सभी आधुनिक सुख सुविधा उनके कदमो तले है, फिरभी अदृश्य रोग के आगे घुटने टेक चुके हैं। जीबन से हार चुके हैं। प्रकृति के साथ क्रूर व्यवहार और नासमझी भरी दोहन के कारण आज पूरा ब्रह्माण्ड अस्तव्यस्त होने लगा है। यही आधुनिक मूढ़ता है। पृथ्वी से मिनट के भीतर प्राणिमात्र का सफाया हेतु अणुबम का निर्माण बेवकूफी नहीं तो और क्या है? मानव के द्वारा पृथ्वी और पर्यावरण के वरदान स्वरुप गायों का क्षणिक स्वाद के लिए निर्ममता पूर्वक क़त्ल करना पशुता से भी बदतर अवस्था का द्योतक है।
अतः अब यक्ष प्रश्न यह है कि मानव अपनी भूल का सुधार कैसे करे? प्रकृति के साथ एकात्मता, समन्वय और सह अस्तित्व का
भाव ही समष्टि में संतुलनकारक है, इसलिए हमारे पूर्वजों ने ऐसी रीति-नीति और परम्पराओं तथा जीवन शैली को अपनाया जो
प्रकृति के अनुकूल हैं। हिन्दू वैदिक जीवन पद्धति प्राकृतिक संसाधनों के अंधाधुंध दोहन की बात नहीं करती अपितु उसे समष्टि
के लिए उपयोगी बनाने की बात करती है। जैसे, पर्यावरण को प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से प्रभावित करने वाले समस्त कारकों की
देवता के रूप में आराधना ताकि वे संरक्षित और सुरक्षित रहें । जिस तरह से कई देशों के राष्ट्राध्यक्ष भारतीय रीति-नीति और
परम्परा अनुसार अभिवादन करते दिखे, इससे वैदिक सनातन हिन्दू संस्कृति की सार्वभौमिकता भी प्रकाश में आई है। यह कोई पहला
अवसर नहीं है; भारतीय संस्कृति-संस्कार और परम्पराएं प्रकृति के साथ एकात्म और उसके सूक्ष्म संवेगों से एकीकृत जीवन शैली को ही स्वीकार करता है। जहाँ आधुनिक विज्ञान अभी पहुंच नहीं पाया है और सबसे कष्टप्रद बात यह है कि लोग बिना अध्ययन-अनुभव के इन गूढ़तम आध्यात्मिक रहस्यों को समझे बिना इसे ‘पाखण्ड’ अथवा ‘अंधविश्वास’ का नाम दे देते हैं। इसके पहले योग- आयुर्वेद और प्राकृतिक चिकित्सा
के क्षेत्र में हिन्दू शैली का डंका बजा था । वैश्विक स्तर पर ऐसी स्वीकृति बनी थी कि आयुष्य सम्पन्न जीवन के लिए योग, प्राणायाम-आयुर्वेद और प्राकृतिक चिकित्सा पद्धतियां विशेष रूप से कारगर हैं और इनके द्वारा असाध्य से असाध्य रोगों का भी सहज निदान और उपचार सम्भव है।
सारांशतः मनुष्य को अपनी असीमित भोग वांछाओं पर अंकुश लगाना होगा। ‘मैं ही श्रेष्ठ हूं’, यह विचार अनुचित है। हमारी रीति-
नीति, परम्पराएं और मान्यताएं भले अलग-अलग हों, किन्तु सबके मूल में एक ही परमात्मा विद्यमान है इसलिए हमारा आहार-विहार
और जीवन पद्धति ऐसी हो जो प्रकृति और पर्यावरण के अनुकूल हो और उसमें सह अस्तित्व के भाव समाहित हों।


