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सिक्किम में डा. कायस्थ लिखित पुस्तक विमोचन

 

इसाबेला गुरुङ, ग्यांगटोक, 22 मई :डॉ. विधुप्रकाश कायस्थ द्वारा लिखित ‘कुन्जांग ग्यात्सो भूटिया (एवरेस्टर) – स्टोरी ऑफ सिक्किम्स विज़नरी माउंटेनियर’ नामक जीवनी पुस्तक का विमोचन खेल एवं युवा मामलों के मंत्री राजू बस्नेत ने ‘एवरेस्ट डे सिक्किम–2026’ समारोह के दौरान किया। यह कार्यक्रम सिक्किम माउंटेनियरिंग एसोसिएशन (SMA) द्वारा शुक्रवार को गंगटोक में आयोजित किया गया था।

सोनम ओंग्मु भूटिया द्वारा प्रकाशित यह पुस्तक पाठकों के लिए पेपरबैक तथा ई-बुक दोनों रूपों में उपलब्ध है।

सभा को संबोधित करते हुए डॉ. कायस्थ ने वर्ष 1965 के माउंट एवरेस्ट अभियान से जुड़ी अपनी व्यक्तिगत स्मृतियाँ साझा कीं। उन्होंने सिक्किम के महान पर्वतारोही स्वर्गीय सोनम ग्यात्सो के अभियान का उल्लेख करते हुए कहा कि उस समय न तो उचित हवाई संपर्क था और न ही काठमांडू से कई क्षेत्रों तक मोटर योग्य सड़कें उपलब्ध थीं। उन्होंने याद किया कि नौ वर्ष की आयु में उन्हें सफल अभियान दल के स्वागत समूह का हिस्सा बनने का अवसर मिला था। उन्होंने यह भी स्मरण किया कि उस स्वागत समारोह में नेपाल के लिए भारतीय राजदूत राज बहादुर उपस्थित थे।

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लेखक ने बताया कि इस जीवनी को पूरा करने में लगभग नौ महीने लगे तथा उन्होंने 1979 में सिक्किम की अपनी पहली यात्रा से लेकर अब तक के अपने लंबे संबंध का भी उल्लेख किया।

डॉ. कायस्थ ने कहा कि इस जीवनी को लिखना चुनौतीपूर्ण था क्योंकि इसमें कुन्जांग ग्यात्सो भूटिया की लगभग तीन दशकों लंबी पर्वतारोहण यात्रा को समाहित करना था, जिसकी शुरुआत  1996 से हुई थी। उन्होंने कहा कि जीवनी लेखन के लिए विषय के जीवन की गहरी समझ आवश्यक होती है, जो अन्य प्रकार के लेखन से भिन्न है।

लेखक ने यह भी बताया कि पुस्तक केवल पर्वतारोहण अभियानों का दस्तावेज़ नहीं है, बल्कि यह पर्वतारोहियों के व्यक्तित्व, संघर्षों तथा कुन्जांग ग्यात्सो भूटिया के प्रारंभिक जीवन और कठिनाइयों को भी उजागर करती है। उन्होंने अनुशासन, साहस और दृढ़ संकल्प को पर्वतारोहण में सफलता के तीन प्रमुख तत्व बताया।

सिक्किम के पर्वतारोहण इतिहास पर बोलते हुए डॉ. कायस्थ ने कहा कि इसका इतिहास लगभग 1848 तक जाता है, जब वनस्पतिशास्त्री जोसेफ डाल्टन हूकर ने खांगचेंद्जोंगा क्षेत्र में 5,000 मीटर से अधिक ऊँचाई वाले क्षेत्रों की वनस्पतियों का अध्ययन किया था। उन्होंने इसे सिक्किम में पर्वतारोहण से संबंधित सबसे प्रारंभिक दर्ज गतिविधि बताया।

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पुस्तक में सिक्किम की पर्वत श्रृंखलाओं का भी विस्तृत दस्तावेजीकरण किया गया है। उन्होंने बताया कि राज्य में लगभग 374 पर्वत हैं। कार्य की विशालता के कारण 130 पर्वतों की विस्तृत जानकारी ही शामिल की जा सकी है, जिसमें उनकी ऊँचाई, अक्षांश, देशांतर और संक्षिप्त विवरण शामिल हैं। इनमें से पाँच शिखर 5,000 मीटर से अधिक ऊँचाई वाले अल्पाइन प्रकार के हैं।

उन्होंने आगे बताया कि 15 पर्वतों को पवित्र माना जाता है तथा उन पर चढ़ाई प्रतिबंधित है। ये भूटिया और लेपचा समुदायों की स्थानीय आस्थाओं और भावनाओं से जुड़े हुए हैं। इन परंपराओं की संवेदनशीलता और जटिलता के कारण उनकी विस्तृत कथाएँ पुस्तक में पूरी तरह शामिल नहीं की जा सकीं।

शेष पर्वतों में से 95 का उल्लेख किया गया है, जिनमें 74 के नाम पहले से हैं जबकि 21 अभी भी अनाम हैं।

डॉ. कायस्थ ने आग्रह किया कि इन अनाम पर्वतों को स्थानीय एवं स्वदेशी नाम दिए जाने चाहिए, ताकि उनकी मूल पहचान संरक्षित रह सके। वैश्विक नामकरण परंपराओं का उल्लेख करते हुए उन्होंने माउंट एवरेस्ट का उदाहरण दिया, जिसे सगरमाथा और चोमोलुंगमा के नाम से भी जाना जाता है। उन्होंने खांगचेंद्जोंगा की मौलिक पहचान बनाए रखने की अपील करते हुए कहा कि उसका नाम “पाँच शिखरों” की अवधारणा का प्रतिनिधित्व करता है।

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क्षेत्र के वैश्विक महत्व पर प्रकाश डालते हुए उन्होंने कहा कि खांगचेंद्जोंगा को “मिश्रित विश्व धरोहर स्थल” (Mixed World Heritage Site) के रूप में मान्यता प्राप्त है, जो प्राकृतिक और सांस्कृतिक विरासत का दुर्लभ संगम है। उन्होंने कहा कि विश्वभर में ऐसे स्थलों की संख्या सीमित है और इसमें इसका शामिल होना एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है।

डॉ. कायस्थ ने आगे कहा कि यह पुस्तक भविष्य की पर्वतारोही पीढ़ियों के लिए एक मार्गदर्शिका के रूप में भी कार्य करने का प्रयास करती है। अंत में उन्होंने उपस्थित सभी लोगों को उनके समर्थन और इस कृति को स्वीकार करने के लिए धन्यवाद दिया।

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