रूसी सेना में नेपाली: भाड़े के सैनिक या मानव तस्करी के पीड़ित ?
काठमांडू, 28 मई 2026 । नेपाल इंस्टीट्यूट फॉर इंटरनेशनल कोअपरेशन एंड इंगेजमेंट (एन.आई.आई.सी.ई.) ने 28 मई 2026 को ललितपुर के हाथ्तीवन स्थित अपने सभागार में “रूसी सेना में नेपाली: भाड़े के सैनिक या मानव तस्करी के पीड़ित?” विषय पर एक अंतरक्रिया कार्यक्रम आयोजित किया। कार्यक्रम में रूस–यूक्रेन युद्ध के दौरान रूसी सेना में नेपाली नागरिकों की बढ़ती भागीदारी तथा उससे जुड़े कानूनी, मानवीय और भू-राजनीतिक प्रभावों पर व्यापक चर्चा की गई।
कार्यक्रम की शुरुआत करते हुए एन.आई.आई.सी.ई. के डॉ. प्रमोद जैसवाल ने रूस–यूक्रेन युद्ध पर नेपाल की विदेश नीति और दृष्टिकोण पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि नेपाल की नीति उसकी संप्रभुता, भौगोलिक अखंडता और स्वतंत्रता के प्रति दीर्घकालीन प्रतिबद्धता पर आधारित है। उन्होंने स्पष्ट किया कि यूक्रेन के प्रश्न पर नेपाल की कूटनीतिक स्थिति किसी बाहरी शक्ति के दबाव से नहीं, बल्कि नेपाल के मूल विदेश नीति सिद्धांतों के अनुरूप तय हुई है।
डॉ. जैसवाल ने यह भी कहा कि नेपाली युवाओं का विदेशी सेनाओं में भर्ती होने का प्रमुख कारण सामाजिक और आर्थिक दबाव है। उन्होंने इस बढ़ती प्रवृत्ति के पीछे रोजगार संकट, आर्थिक असुरक्षा और सीमित अवसरों को महत्वपूर्ण कारण बताया।
कार्यक्रम में यूक्रेनस्थित संस्था “ट्रुथ हाउंड्स” की माया टोमाक ने रूसी सेना द्वारा विदेशी नागरिकों की भर्ती से संबंधित अपने अनुसंधान के निष्कर्ष प्रस्तुत किए। उन्होंने कहा कि अधिकांश नेपाली नागरिक सुरक्षा और आर्थिक अवसरों की कमी के कारण भर्ती होने को मजबूर हुए। उनके अनुसार, रूस द्वारा विदेशी नागरिकों की भर्ती एक वैश्विक प्रवृत्ति के रूप में विकसित हो चुकी है और कम से कम 130 देशों के नागरिक इसमें शामिल हैं।
अनुसंधान के अनुसार लगभग 28 हजार विदेशी नागरिक रूसी सेना में भर्ती हो चुके हैं। माया टोमाक ने बताया कि वर्ष 2023 में विदेशी भर्ती की संख्या लगभग 3,800 थी, जो 2025 तक बढ़कर लगभग 14 हजार पहुंच गई। उन्होंने कहा कि यह भर्ती प्रत्यक्ष रूप से तथा रूस में रह रहे प्रवासियों को लक्षित करके की जा रही है।
उन्होंने बताया कि सामाजिक और आर्थिक रूप से कमजोर लोगों को आकर्षक वेतन, नागरिकता तथा आसान प्रक्रिया का प्रलोभन देकर भर्ती किया जाता है। भर्ती की प्रक्रिया अक्सर दोस्तों, रिश्तेदारों या सोशल मीडिया के माध्यम से प्रारंभ होती है। इसके बाद रोजगार और आर्थिक लाभ का लालच देकर लोगों से रूसी भाषा में अनुबंध पर हस्ताक्षर करवाए जाते हैं, न्यूनतम सैन्य प्रशिक्षण दिया जाता है और फिर उन्हें युद्ध के अग्रिम मोर्चे पर भेज दिया जाता है।
कार्यक्रम में युद्ध के दौरान पकड़े गए नेपाली युद्धबंदियों (POW) की स्थिति पर भी चर्चा हुई। माया टोमाक ने युद्धबंदियों से हुई बातचीत का उल्लेख करते हुए कहा कि उनमें से अधिकांश सामाजिक और आर्थिक रूप से कमजोर पृष्ठभूमि से आते हैं तथा मानव तस्करी और धोखाधड़ी का शिकार बने हैं।
उन्होंने कहा कि अंतरराष्ट्रीय मानवीय कानून के अनुसार रूसी सेना में कार्यरत विदेशी नागरिकों को उनकी राष्ट्रीयता से अधिक युद्धरत पक्ष के सैनिक के रूप में देखा जाता है। युद्धभूमि में पकड़े गए व्यक्तियों को युद्धबंदी का दर्जा दिया जाता है तथा उन्हें अंतरराष्ट्रीय रेडक्रॉस समिति (ICRC), संयुक्त राष्ट्र तथा जेनेवा कन्वेंशन के तहत आवश्यक संरक्षण और पहुंच प्रदान की जाती है।
माया टोमाक ने यह भी कहा कि नेपाली युद्धबंदियों की स्थिति को एक समान तरीके से नहीं देखा जा सकता। कुछ युद्धबंदी स्वदेश लौटना चाहते हैं, जबकि कुछ अब भी रूस के प्रति सकारात्मक धारणा रखते हैं। हालांकि अधिकांश ने अवसर मिलने पर तुरंत नेपाल लौटने की इच्छा व्यक्त की है। उन्होंने कहा कि यह स्थिति नेपाली युद्धबंदियों की स्वदेश वापसी प्रक्रिया को और जटिल बनाती है।
कार्यक्रम में कूटनीतिक समुदाय के सदस्य, पूर्व सुरक्षा अधिकारी, शिक्षाविद्, नीति विशेषज्ञ तथा विभिन्न क्षेत्रों से जुड़े व्यक्तियों की उपस्थिति रही। चर्चा के निष्कर्ष में वक्ताओं ने वैश्विक संघर्षों के दौर में कमजोर वर्गों के शोषण को रोकने के लिए मजबूत आप्रवासन शासन, अंतरराष्ट्रीय सहयोग, कानूनी जवाबदेही और जनचेतना बढ़ाने की आवश्यकता पर जोर दिया।



