कितना बदल गया संसार ! क्या प्रकृति अपने यौवनावस्था में लौट रही है ? : अंशु झा
अंशु झा , काठमांडू | वैश्विक स्तर पर फैला यह कोरोना वाइरस मानव प्राणी को तहस नहस करने पर लगा हुआ है । लाखों लोगों के जीवन को कोरोना वाइरस ने अपने पेट में ले लिया और करोडों को संक्रमित कर चुका है जिसके संक्रमण से बचने के लिये लोग गत कई महीनों से घर में बन्द है । इस बन्दी के कारण संसार में मानव का वर्चस्व दब गया है और प्रकृति अपने पूर्व रुप में परिणत हो रही है । वही सुन्दरता, वही निखार जो कभी दादी मां के आप बीती कहानी में सुना करती थी । अर्थात् मानो प्रकृति पुनः एकबार अपने यौवनावस्था में लौट गयी हो ।
जी हां, प्रकृति एक प्राकृतिक पार्यावरण है जो हमारे आस पास है । वह हमेशा हमारी मां की तरह हमारा खयाल रखती है और पालन पोषण करती है । हमें नुकसान से बचाने के लिये प्रकृति हमारे चारों तरफ सुरक्षात्मक कवच से घेर कर रखती है । हमलोग इतना काविल नहीं हैं कि उसके विना धरती पर रह सकें । फिर भी तीव्र बुद्धि वाला मनुष्य हमेशा प्रकृति के विरुद्ध ही कार्य करने पर तुला रहता । हमलोग प्रकृति को कितना भी तकलिफ दें पर वह आह तक नहीं करती है । इसी का गलत फायदा उठाकर मानव जाति प्रकृति के साथ अत्याचार पर अत्याचर करता आ रहा है । अपने निजी स्वार्थ पूर्ति के लिये किसी भी हद तक प्रकृति को चोट पहुंचाता है ।
इस बन्दी के कारण अब स्पष्ट हो गया है कि प्रकृति को बिगाडने वाला यह मनुष्य जाति ही है । जिसका अपना कोई अस्तित्व ही नहीं है । धरती पर मानव जाति बस एक अदना सा जीव है जो प्रकृति के बल बुते पर पल रहा है ।
मानव जाति जब घरों में बन्द है उस समय संसार पूर्ण रुप से स्वच्छ दिखाई दे रहा है । पशु पक्षी स्वतन्त्र हो गये है । चिडियां निडर होकर उन्मुक्त गगन में विचरण कर रही है । जंगली जीव जन्तु बिना भय सडकों पर घूम रहे हैं जो सडक कभी उसी का क्षेत्र था । जंगल हरे भरे हो गये हैं । हिमालय स्वच्छ हो गया है । वायुमण्डल पहले के तरह हो रहा है । ओजोन परत मोटा हो गया है अर्थात् प्रकृति पूर्णरुपेण अपने अतीत अवस्था में परिणत हो गई है । प्राप्त सूचना अनुसार समुन्द्र के किनारे लाखों कछुए ने अण्डा दिया है । इसका तात्पर्य सृष्टि बरकरार रहेगी । सृष्टि के चराचर प्राणी इस लकडाउन से प्रशन्न है । उसे भी स्वतन्त्रता का अनुभव हो रहा है । और वह अपने क्षेत्र का पूर्णरूपेण सदुपयोग कर रहा है । क्योंकि मानव जाति अभी घरों में कैद है ।
इस लकडाउन के कारण संसार के सारे उद्योग धन्धे, कल कारखाने, विद्यालय तथा विश्व विद्यालय बन्द हो गया है । जिससे लोग इन्टरनेट के माध्यम से सम्भवयोग्य काम घर से ही कर रहें हैं । बच्चे को इन्टरनेट के माध्यम से ही शिक्षा देने का कार्य किया जा रहा है । अर्थात् संसार का सारा कार्य बदल गया है । जहां लोग चन्द्रमा तक पहुंच चुके है वहीं के लोगों को घरों में कैद होकर रहना पड रहा है । सारे विज्ञान इस तुच्छ किटाणु के समक्ष असफल दिखाई दे रहा है ।
समग्र में एक अदृश्य वाइरस ने लोगों को घरों तक सिमित कर दिया है जो बहुत ही सोचनीय विषय है । इसलिये हमें प्रकृति का हमेशा खयाल रखना चाहिये । हमलोग अपने जन्म से लेकर मृत्यु तक प्रकृति का कर्जदार होते हैं । जीवन जीने के लिये सदैव हमें प्रकृति की आवश्यक्ता होती है । उसके बिना हम एक क्षण भी जीवित नहीं रह सकते हैं । अतः हमें ज्ञात रहे कि हम प्रकृति को कुछ नहीं दे सकते हैं तो उसका क्षति करने का भी अधिकार हमें नहीं है । हमें सदैव प्रकृति के साथ ही चलना चाहिये ।


