जब बाँट ही लिया दिल की ज़ागीर, तब क्यों पूछते हो दिल किधर गया : संजय कुमार सिंह
संवेदनशील कवि, उपन्यासकार, कहानीकार संजय कुमार सिंह की जिन्दगी से जुडी कुछ कविताएँ । पढें और महसूस करें जिन्दगी को जीती हुई कविताओं को ।
1
यादों के बीच कोई दीवार नहीं होती
तुमने भुला दिया
फिर भी तुम्हारे कुशल-क्षेम के बारे में सोचता हूँ।
पहाड़ की तरफ जब जाती है हवा
तो कहता हूँ कोई संदेश लाना
पक्षी जब उड़ते हैं उस दिशा में
तो हसरत से देखता हूँ
और बादल जब घिरते हैं मन के आकाश में
कल्पना से इन्द्रधनुष बनाता हूँ।
इस बार
आम, लीची
और फूलों के बौर में
तुम्हें देखूँगा।
2
अफसोस
………
जब बाँट ही लिया दिल की ज़ागीर
तब क्यों पूछते हो दिल किधर गया
और
दुनिया किधर?
3
शर्त
……..
तुम कहो तो इस फूल के
टुकड़े कर दूँ!
मगर तब तुम्हें
सिर्फ रोना होगा।
4
वादा ख़िलाफ़ी
………..
आँखों में अगर पानी नहीं हो,
तो कितना आसान है
वादा ख़िलाफ़ी…
उस तरफ देखो ही नहीं
जिस तरफ
धुआँ उठता है।
अजनबी
…………
इतिहास की बिखरी हुई स्मृतियों में
माज़ी की कुछ तस्वीरें
परछाइयों की तरह भटकते लोग
/पूछता है कोई
तुम कौन?
तब मैं
इतिहास से निकल कर बाहर आ जाता हूँ
और चलने लगता हूँ जिन्दगी के फुटपाथ पर तन्हां।
अभिशाप
मैं तुमसे जब भी मिली
धरती और आकाश की तरह मिली
जैसे टूट कर मिलते हैं ग्रह-नक्षत्र
अनुभूति की आकाश-गंगा में!
सोचा,
मेरी ही कोख से जन्म लेंगी किसी दिन
सदियों की लुप्त वनस्पतियाँ
खिलेंगे दुर्भिक्ष में भी फूल
भर आएँगे
सूखी नदियों में जल
और पथरायी आँखों मे भी होगा सपनों का हरापन।
हमारे होने का पूरा मतलब
बहुत जरूरी है उन चीजों के बारे में सोचना
जैसे प्रेम का पूरा मतलब
एक पूरी कविता
अपनी आत्मा तक उतरने का
एक मात्र मार्ग
एक आवेग
जहाँ जिद्द से शुरू होता है जीवन
और कभी खत्म नहीं होता।
मेरा प्रेम
सशंकित था अपने समय से
फिर भी जिसके लिए संभव
अनुभूतियों की वह असंभव कल्पना
जाने किस पीड़ा से विस्फारित
एक रोज विस्मित हुई अपनी ही स्त्री के वक्तव्य से
मैंने लगभग आत्म-संवाद की मुद्रा में तब कहा खुद से
कि मैंने किस निर्लज्ज समय को जना अपनी कोख से
कि मैं खुद लज्जित हूँ!
संजय कुमार सिंह,
प्रिंसिपल,आर.डी.एस काॅलेज
सालमारी, कटिहार।
रचनात्मक उपलब्धियाँ-
हंस, कथादेश, वागर्थ, आजकल, पाखी, वर्त्तमान साहित्य, पाखी, साखी, कहन, कला, किताब, दैनिक हिन्दुस्तान, प्रभात खबर, आदि पत्र-पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित


