अमेरिकी रंगभेद विरुद्ध का आन्दोलन और नेपाल की रंगभेदी दुकान : कैलाश महतो
कैलाश महतो, नवलपरासी | वैसे रंगभेद का भौतिक रुप सन् १९४८ से शुरू होता है । यह भेद नीतिगत रुप से दक्षिण अफ्रिका और दक्षिण पश्चिम अफ्रिका में जड पकडा था । इसकी खात्मा दक्षिण अफ्रिकी नेता स्व. नेल्सन मण्डेला के नेतृत्व में सन् १९९० के शुरुवात में हुई ।
गुगल कहता है : “Apartheid is a system of institutionalised racial segregation.” रंगभेद एक पृथकतावाद ही है । यह विशेषत: दो प्रकार से मानव मस्तिष्क को प्रभावित करता है : नफरतीय और संस्थागतीय रुप में । यह किसी जात या समुदाय विशेष के मेहनत, संघर्ष व सत्कर्मों से चिढे हुए किसी जात, समुदाय या रंग विशेष के लोगों द्वारा निर्माण लिए गये नफरत है वह नफरत उन वर्गों के लोगों द्वारा कालान्तर में संस्थागत कर दिया गया ।
सन् १८८१ और १९१४ के बीच यूरोपीय शक्तियों द्वारा अफ्रीकी अधिकांश भूभागों पर आक्रमण करके उन पर अधिकार, औपनिवेशीकरण, और उन भूभागों को हड़प लेने को अफ्रीका का विभाजन कहा जाता है । इसे अफ्रीका के लिये हाथापाई और अफ्रीका पर विजय भी कहा गया है । इस समयावधि को ‘नव उपनिवेशवाद काल’ भी कहते हैं ।
सन १८७० में अफ्रीका के केवल १० प्रतिशत भूभाग पर यूरोपीय शक्तियों का अधिकार था । किन्तु १९१४ तक उसके ९० प्रतिशत भूभागों पर यूरोप का अधिकार हो गया । इस समयतक केवल अबीसिनिया (इथियोपिया) और लाइबेरिया ही अफ्रिका में स्वतन्त्र मुल्क के रुप में बचे थे।
सन् १८८४ में सम्पन्न हुए बर्लिन सम्मेलन को प्रायः अफ्रीका के विभाजन का आरम्भ बिन्दु माना जाता है । १९वीं शदी के अन्त में यूरोपीय साम्राज्यों के बीच जबरदस्त राजनीतिक एवं आर्थिक प्रतिस्पर्धा होने के बावजूद अफ्रीका को चालाकी पूर्वक शान्तिपूर्ण ढंग से बाँट लिया गया और इस चातुर्यपूर्ण बंटवारे ने उन्हें आपस में युद्धरत होने से भी बचा लिया ।
अफ्रीका का विभाजन यूरोप के राजनीतिक इतिहास में एक अत्यंत रोमांचक घटना मानी गयी है । विभाजन के महत्वपूर्ण कार्य को अत्यंत शीघ्रता से संपादित किया गया यद्यपि विभाजनकर्ता विभिन्न राष्ट्र और उसके आयामों पर आपस में मतान्तरित थे । फिर भी बिना कोई युद्ध लड़े इस कार्य को शांतिपूर्ण ढंग से उन्होंने बंटबारे को सफल बनाया । उस बंटबारे में यूरोप के बेल्जियम, इटली, बेलायत, पुर्चुगल, फ्रान्स, स्पेन और जर्मनी थे । वास्तव में रंगभेद यूरोप के उसी औपनिवेशिक अतिक्रमण से शुरू होता है ।
जब यूरोप अफ्रिका में शासन करना चाहा तो अफ्रिकी लोगों ने उसका जमकर विरोध किया । मगर प्राकृतिक सभ्यता और संस्कारों के साथ जी रहे अफ्रिकन लोगों पर आधुनिक हथियारों के बल पर यूरोप ने उनके विद्रोह को दबा दिया । उन्हें उनके अपने भूमियों से बंचित कर दिया । यूरोपियन साम्राज्य और उपनिवेश के विरोध में लडने बाले उन काले छाले के लोगों को देखकर गोरे लोग घबराने लगे । उनसे गोरों की दुश्मनी हो गई और उस दुश्मनी के कारण ही उनसे वे नफरत भी करने लगे । हकिकत यह है कि गोरों के विरोध में अगर वे लोग आवाज नहीं उठाते तो शायद उनके रंग से उनकी नफरत न होती । बाद में वही काला रंग विभेद का कारण बन गया और रंगभेद भयावह एक कलंक बना जो आने बाले कई शदियों के लिए मानव जीवन का एक क्रुर समस्या बन रहा ।
काले लोगों के लडाकूपन जिद्द के कारण उपनिवेशवादियों ने उन्हें राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक, शैक्षिक, सांस्कृतिक और अवसरों के क्षेत्र समेत में रोक लगाने, शोषण करने व विभेद खडा करने के उद्देश्यों से उन्हें बन्दी बनाने और कैद करके उनके साथ जानवरों से व्यवहारतक किया जाने लगा । यहाँतक कि उनका किसी वस्तुभाव और जानवर जैसे बिक्री किया जाने लगा । गोरे लोग काले लोगों के साथ अमानवीय अत्याचार करने लगे । अफ्रिकी मुल्कों से काले लोगों के हाथों और पेैरों में जानवरों के तरह जंजीरों से बाँधकर यूरोप और अमेरिका के बाजारों में बिक्री करने लगे । काले लोगों के लडाकूपन के त्रास से शुरू हुआ अभद्र एवं अमानवीय व्यवहार समय के क्रम में गोरो के लिए थप आय का श्रोत बन गया ।
शदियोंतक गोरों के क्रुर अत्याचार के शिकार रहे काले लोग उचित समय पाते ही उनके अमानवीय अत्याचारों के विरुद्ध पून: संगठित होकर लडाई के मैदान में दाखिल हो गए । गोरों ने उनके साथ सम्झौते किए और मानव अधिकार के नारों के साथ उन्हें भी मानव के रुप में स्थान देने की अन्तर्राष्ट्रिय कानून बनाये गये । असंख्य निर्मम हत्या, बलत्कार और अमानवीय प्रताडनाओं के विरुद्ध मार्टिन लूथर किंग जुनियर, अब्राहम लिंकन, महात्मा गान्धी, नेल्सन मण्डेला जैसे अनेक विभूतियों की अवतारों ने काले लोगों पर होने बाले अत्याचार व विभेदों को अन्त करने के राह बनाये । मगर दु:ख और आश्चर्य की बात है कि इस उत्तर आधुनिक काल में समेत कुछ छाले के गोरे और दिल के काले लोगों द्वारा रंगभेदी व्यवहार किये जाते हैं । अमेरिका जैसे अति समृद्ध और सभ्य देश में आज भी राज्य और प्रशासनिक निकायों में रंगभेद देखा जाना हैरान करने बाली बात है ।
लूटमारी के आरोप में पकडे गये एक काले अमेरिकी नागरिक जर्ज फ्लोइड द्वारा गोरे प्रहरी से उसका दम घुटने की बात बताने के बावजूद उनपर प्रहरी द्वारा हुए लापरवाही व दुर्व्यवहार के कारण अस्पताल पहुँचते पहुँचते उनकी मृत्यु हो जाता है जिसे अमेरिकी नागरिक रंगभेद का उदाहरण मानता है । उस काले अमेरिकी नागरिक के मौत से भडके लोगों को नियन्त्रण करने हेतु प्रहरी को शख्त रबैया अपनाने का राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प द्वारा जब निर्देश दिया जाता है, तो प्रहरी अधिकारी ने ट्रम्प से सतर्क रहने को कहा जाना अमेरिकी प्रहरी का मानवीयता के प्रति अटुट लगाव दर्शाता है । एक गोरा प्रहरी के अमानवीय कुकृत्य के विरोध में सारे गोरे और काले अमेरिकी जनता उतारु हो गई है । अमेरिका के लगभग सारे ५० राज्यों में जनता द्वारा करोडों की तोडफोड की जाती है, दर्जनों शहरें आग के लपटों में घिडी पडी है, कर्फ्यू के बावजूद लोग सरकार के खिलाफ सडकें और बाजार में हंगामा मचा रहे हैं । मगर वहाँ की सरकार और प्रहरी प्रशासन किसी पर गोली चलाने की न तो निर्देश देती है न सुरक्षाकर्मी खुद वह अपराध करने की हिम्मत दिखा रही है । प्रहरी समेत मानव अधिकार औ सुरक्षा का पूर्ण जिम्मेवारी समझ रही है । प्रहरी घुटने टेककर जनता से माफी मांगती है । यह एक तरफ अमेरिकी जनता की न्याय और मानवीय भावना की सर्वोत्तम तस्वीर है तो दूसरी तरफ अन्याय के विरुद्ध काला गोरा सब मिलकर लडने का अद्वितीय मिसाल भी है ।
नेपाल आज के संसार में मानवता के मामले में सबसे दरिद्र और व्यभिचारी मुल्क है जहाँ एक समान्य भिखारी से लेकर राष्ट्रपतितक में एक ही नश्लीय दुराभाव और विभेद है । मधेश के जन, जल, जंगल, जमीन, मेहनत और दाना पानी पर आश्रित नेपाल सरकार, उसके शासक, प्रशासक, कर्मचारीतन्त्र, सुरक्षा तन्त्र और समान्य गोरे पहाडी नेपालीतकों में मधेशी जनता के विरोध में साजिस करना, विभेद करना, अवसर से बेदखल करना अपना राष्ट्रवाद समझना है । मधेशी द्वारा राज्य से मौलिक हक अधिकार तथा राज्य में राज्य के सेवा करने हेतु मांगे जाने बाले न्याय संगत आवाज और आन्दोलन को भारतीय आन्दोलन का जामा पहनाकर मधेशी जनता के शर, सीने और कनपट्टियों पर गोली मारी जाती है । मगर यहाँ एक भी समाचारपत्र, टेलिभिजन या सञ्चार क्षेत्र मधेशी पर हो रहे बेरहम अत्याचार का विरोध नहीं करता । सरकारी कोई मानव अधिकार संस्था इसे कोई समाचार या मुद्दा नहीं बनाता । एक भी नागरिक समाज या पढेलिखे एलाइट लोग मधेश व मधेशी जनता के न्याय के पक्ष में बोलने की नैतिकता नहीं दिखाता ।
मधेश के हर न्यायिक आन्दोलन को नेपाली राज्य, उसका शासन, प्रशासन, मिडिया, मानव अधिकार आयोग, नागरिक समाज, बार एशोसिएसन, अदालत और आम पहाडी समाजतक ने मधेशी के उपर राज्य द्वारा होने बाले दमन, हत्या, बलत्कार, हत्या, विभेद, दोहन, शोषण आदि के विरुद्ध आवाज निकालने को यहमानवीय कर्तव्य नहीं समझते । मधेश में रहे बसे और मधेश के ही सब खाने पिने बाले पहाडी लोग उलटे मधेश आन्दोलन के विरोध में अफवाहें फैलाने के दुकानें खोल लेते हैं । न जाने रंगभेद का दुकान नेपाल में कबतक चलता रहेगा ! मगर अब यह भी तय ही है कि अगर मधेश बिरोधी पहाडी दुकानें समय से बन्द न हुए तो उन दुकानों की मधेश में खैर तो है नहीं, मधेश अपना रास्ता खुद तय करने का भी निर्णय ले सकता है ।

