ए खुद गर्ज-यों निहाल न करते : लक्ष्मण नेवटिया
उस अदृष्य के प्रति *ए खुद गर्ज-यों निहाल न करते*
हम तुमसे कभी ,
सवाल न करते,
तुम यदि मेरा इतना
ख्याल न करते।
क्यों करते हो यार
मुझे बेपनाह प्यार
जब तय थी जुदाई
फिर निढ़ाल न करते।
तुम दिखते नहीं,
कभी भी कहीं,
हाँ मेरे दिल में ,
छुपे रहते हो यहीं।
मेरे मन को भाई,
तेरी ये प्रेम सगाई,
पर अपना बना
यों-बेहाल न करते।
अब कहाँ जाऊं ‘
औऱ किससे पूछूं
इस तेरे लगाए
प्रेम रोग की दवा,
जब लाईलाज था ,
तेरा लगाया मर्ज,
तो ए खुद गर्ज ,
यों निहाल न करते ?

विराटनगर -९

