असमय, यूँ हीं अचानक से : गंगेश मिश्र ” अनुरागी “
असमय, यूँ हीं अचानक से;
अनमने से, कथानक से;
विच्छेद हुआ,
ख़ेद हुआ, विवश बेचारे को;
चाह कर भी, जुड़ न सका;
ख़ुद से दूर हुआ।
संयन्त्र की ख़राबी नहीं;
अपितु, ज़रूरतों की ख़ुमारी में;
गृहस्थी की लाचारी में;
करे क्या ? दिल और चाहता है;
गृहस्थी कुछ और चाहती है;
उड़ना चाहो, उड़ ना पाओ;
मग़र, इक बात तो है;
सिखाती है;
ज़मीन से जुड़े रहना;
संयम और अनुशासन ।
औरों के खुशी के लिए;
जीने को जीना कहते हैं;
बस ! कुछ अपना ना समझे तो;
अपना समझते ही;
कुछ अपना नहीं रहता;
जैसे, सपना नहीं रहता;
हक़ीक़त में ।
ये नमक-तेल, ये मेल;
सब खेल है;
समझो तो ठीक है;
वरना नकेल है;
तिल भर हिल पाओ;
ख़ुद से मिल पाओ, तो ठीक;
नहीं तो जेल है।
** गंगेश मिश्र ” अनुरागी “

