Mon. Jun 15th, 2026
English मे देखने के लिए क्लिक करें

किसान आंदोलन : ओपन यूनीवर्सिटी आफ माइक्रो मैनेजमेंट : वीरेन्द्र बहादुर सिंह

 


वीरेन्द्र बहादुर सिंह । नानी पालकीवाला ने अपनी ‘विट एंड विजडम’ नामक पुस्तक के पेज नंबर 121 पर लिखा है: लीडर्स हेल्प पीपल टू बिलीव इन देमसेलव्स एंड इन द पॉसिबिलिटीज ऑफ द फ्रयूचर।
इस बात को किसान आंदोलन के नेताओं ने साकार कर दिखाया है। आज तक कभी यह नहीं कहा गया कि भारत उद्योगप्रधान देश है। शिक्षाप्रधान या टोना-टोटकाप्रधान देश है। दुनिया में इतने अवकाश कहीं नहीं होते, जितने अवकाश भारत मेें होते हैं। फिर भी यह नहीं कहा जाता कि भारत अवकाशप्रधान देश है। कहा तो यही जाता है कि ‘भारत कृषिप्रधान देश है।’ कृषि में ‘कुछ’ ऐसा तो जरूर है, जिसकी वजह से भारत की कृषिप्रधान देश के रूप मे पहचान मिली है। यह ‘कुछ’ क्या है, इसकी जानकारी तो हमें नहीं है, क्योंकि हम आम आदमी हैं, खास नहीं। आम आदमी और खास आदमी के बीच काफी फर्क है, पर मूलभूत फर्क यह है कि आम आदमी को अपने जीवन के बारे मेें जो पता नहीं होता, वह सब कुछ खास आदमी को पता होता है। जबकि बेचारे आम आदमी को तो यह भी पता नहीं होता कि अपने जीवन को बनाए रखने के लिए जिंदगी में उसे क्या-क्या पता होना चाहिए। हां, खास आदमी को इसकी और इस तरह की सभी जानकारियां जरूर होती हैं।
दिल्ली मे चल रहे किसान आंदोलन को खत्म करने के लिए दिल्ली पुलिस ने जब वाटरकैनन से पानी फेंका तो एक न्यूज चैनल की श्रद्धालु एंकर ने डिबीट मेें बैठे एक राजनीतिक विश्लेषक से पूछा कि दिल्ली में पहले से ही पानी की कमी है और उस पर इतनी ठंड मेें किसानों पर इतना ज्यादा पानी बहा दिया गया। इस संदर्भ में आपका क्या कहना है? इस पर उस विश्लेषक ने अपनी विश्लेषकता का विलक्षण परिचय कराते हुए कहा कि मैं आपका कोई नेता या प्रवक्ता नहीं हूं कि इस बारे में कुछ कह सकूं। यह सवाल तो आपको केजरीवाल से पूछना चाहिए। एंकर ने उस विश्लेषक की बुद्धिमत्ता को देख कर बात साफ करते हुए एूछा कि मैं यह जानना चाहती हूं कि इस बारे में आप क्या सोच रहे हैं? विश्लेष महोदय थोड़ी राहत महसूस करते हुए बोले कि इस मुद्दे पर मेरा सिर्फ यही कहना है कि किसान हमारे भाई हैं, वे जनता का एक हिस्सा हैं। पानी पर पूरी जनता का समान अधिकार है। जनता के हिस्से मेें आने वाला पानी, जनता के ही एक हिस्से के लिए उपयोग मेें लाया गया तो इसमें गलत क्या है? बात रही कि इतनी ठंउी में ठंडे पानी की तो इसमेें पुलिस का कोई कुसूर नहीं है। दिल्ली सरकार ने गरम पानी की व्यवस्था की होती तो यह सवाल ही नहीं खड़ा होता। पुलिस गरम पानी किसानों पर फेंकती। पुलिस का काम है पानी फेंकना, पानी ठंडा है या गरम, इस विषय पर सोचना उसका काम नहीं है। हां, इस मौसम मेें पानी ठंडा होना चाहिए या गरम, कितना गरम होना चाहिए, इस विषय पर सोचने की जिम्मेदारी स्वास्थ्य विभाग और मौसम विभाग के अधिकारियों की है।
अब कौन कहता है कि राजनीतिक डिबेट में बुद्धिवर्धक और ज्ञानवर्धक चर्चाएं नहीं होतीं। हमारे सामान्य दिमाग में ऐसी असामान्य बातें घुसती ही नहीं, यह अलग बात है। किसानों का यह आंदोलन सही है या गलत, जो हो रहा है, वह ठीक है या गलत, इस पर कुछ भी कहने का हमारा सहज अधिकार नहीं है, क्योंकि हम न तो कोई नेता-प्रवक्ता हैं, न कोई राजनीतिक विश्लेषक। पर किसानों के इस आंदोलन को इंडियन मैनेजमेंट के एक विभाग ने अध्ययन करके यह निष्कर्ष निकाला है कि जिन्हें हम पूरी तरह किसान-फार्मर कह कर ‘टका’ भर भाव देने की समझ से भी ‘सीमित’ रखा है, उन किसानों का मैनेजमेंट सचमुच यूनिक कहा जा सकता है। सिक्के के दो पहलू होते हैं। (शोले वाले सिक्के को छोड़ कर) जिज्ञासु व्यक्ति सिक्का कोई भी हो, (चलता हो या न चलता हो, असली हो या नकली) उसकी पॉजिटिव साइड देखनी चाहिए। हम लगभग जिज्ञासु ही हैं, इसलिए इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं कि हम पॉजिटिव साइड ही देखेंगे।
क्राउड मैनेजमेंट किसे कहा जाता है, जिसे यह देखना-जानना हो तो बड़े संप्रदायों में, बड़े संस्थानों में या आरएसएस जैसे बड़े संगठनों में देखने जाना चाहिए। अब इसमें इस किसान आंदोलन की एकता को भी शामिल करने का मन हो रहा है, इस तरह शिष्टबद्ध रूप से यहां क्राउड मैनेजमेंट देखने को मिल रहा है। भीड़ से शिष्टता की अपेक्षा की जा सकती है? हां, इस किसान आंदोलन को देख कर निश्चित रूप से कहने को मन हो रहा है कि भीड़ भी अनुशासन में रह सकती है। क्योंकि इस भीड़ का नेता और हर सदस्य अपने पद, पदवी, प्रतिष्ठा और पैसे के घमंड से मुक्त होकर खुद को एक सामान्य आदमी मान रहा है। बाकी भीड़ को मैनेज करना कोई साधारण काम नहीं है। यह मुश्किल काम किसान आंदोलन के धैर्यवान नेताओं ने बड़ी सहजता से कर दिखाया है। इसका एक कारण यह भी है कि आंदोलन के नेता सूटेड-बूटेड-सफारीधारी-डिग्रीधारी-सर्टिफिकेटधारी या सो काल्ड एजूकेटेड नहीं हैं। इसमें ऐसा भी कोई नहीं होगा, जो लीडरशिप करते समय व्यक्तिगत स्वार्थ, पूर्वाग्रह या लोभ-लालच-धमकी के द्रावण में पिघल कर आंदोलन को साधन बना दे। लगता है ये लोग क्राउड मैनेजमेंट की अपेक्षा पहले सेल्फ मैनेजमेंट में विश्वास करते हैं। क्योंकि ये सभी लोग जमीन से जुड़े लोग हैं, आसमान से नहीं।
इस आंदोलन में दूसरा ध्यान देने वाला पहलू यह है कि आंदोलनकारियों ने ‘फूड एंड वाटर’ मैनेजमेंट कुशलतापूर्वक कर दिखाया है। आंदोलन के नाम पर जो मिले खा लो, इस बात पर इन किसानोें ने विश्वास नहीं किया। किसी को भी होमसिकनेस न परेशान करे, इसके लिए ‘सरसो द साग’ और ‘मक्के द रोटी’ भी यहां सुलभ कराई गई है। हिम्मत, साहस, खमीरी, खुमारी और खुद्दारी की बात यह है कि इन लोगों ने सरकारी भोजन को विनम्रतापूर्वक अस्वीकार कर दिया है। ये लोग समझते हैं कि भोजन भले ही सरकारी कहा जाए, पर वह तैयार तो जनता के पैसे से ही हुआ है न? यह इसलिए समझा सका है क्योंकि ये लोग आम आदमी हैं, खास आदमी नहीं।ं आम आदमी जमीन से जुड़ा होता है, जबकि खास आदमी जमीनों के साथ जुड़ा होता है।
सुविधा मैनेजमेंट कैसा होता है, इसका लाइव डेमोंस्ट्रेशन इस किसान आंदोलन ने हमें सिखा दिया है। आंदोलन स्थल पर ही मोबाइल चार्जिंग स्टेशन, गारमेेंट्स स्टोर, एक आंदोलन स्थान से दूसरे आंदोलन स्थल पर आने-जाने के लिए इंटरनल ट्रांसपोर्ट सर्विस, टैªक्टर, बाइक या अन्य वाहन के लिए सर्विस स्टेशन जैसी सुविधाएं यहां उपलब्ध हैं। यह बात तो समझ मेें आती है, पर अगर कोई किसान अपना अंडरवेयर्स, कंघी, रूमाल, मोजा या तौलिया जैसी चीज लाना भूल गया है तो इसे भी फाइवस्टार होटल द्वारा उपलब्ध कराने का काम भी इन लोगों ने कर दिखाया है। और हां उपयोगवाद के इस समय में ये सारी सुविधाएं फ्री आफ चार्ज उपलब्ध कराई जा रही हैं। फ्री आफ चार्ज इसलिए कि यह आंदोलन सभी किसानों का अपना, अपने लिए और अपने द्वारा किया जा रहा है। राजनीतिक पार्टियों के महाधिवेशन या महासम्मेलन या महाकार्यकसरिणी या महाचिंतन शिविर या इसी तरह किसी महानुभावों का महामेला जैसा महाक्राउड नहीं है, वेल डिसिप्लंड है।
सरकारी साधनों या संसाधनों के बिना भी सिक्योरिटी मैनेजमेंट किस तरह किया जा सकता है, यह भी इन आंदोलनकारियों से सीखा जा सकता था। किसी असंतुष्ट आत्मा या विघ्नसंतोषी जीवात्मा इस आंदोलन का अनुचित लाभ न उठा सके, इसके लिए किसानों ने द्विस्तरीय व्यवस्था भी बना कर दिखा दी है। इसके लिए निहंग और स्वयंसेवक रातदिन एक किए हुए हैं।
वीरेन्द्र बहादुर सिंह
जेड-436ए, सेक्टर-12,
नोएडा-201301 (उ0प्र0)
मो-8368681336

About Author

आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *