जनमत तो खिसका, जसपा अब किसका ? : कैलाश महतो
“जनमत तो खिसका, जसपा अब किसका ?” तो मधेश से सम्बन्धित प्रश्न है । मगर सवाल आगे भी है कि “नेपाल सरकार किसका ः नेपाल का ?, ओली का ? या विदेशी किसी पडोसी का ?
कैलाश महतो, पराशी | नेपाल के राजनीति में मौजूदा हालात के सारे मधेशी कहलाने बाले दल और नेता नेपाली शासकों के रखैल हैं । यह हर मधेशी दल और नेता में पाया जाता है, चाहे वो नेपाल के संसदीय राजनीति में हों या फिर स्वतन्त्र मधेश देश बनाने का बेहाया नाटक करने बालों का हों । दुर्भाग्य यह है कि एक भी मधेशी दल या नेता पवित्र नहीं है । किसी ने नीति बेची तो किसी ने मुद्दा, किसी ने चरित्र बेचे तो किसी ने नियत, किसी ने मधेश बेचा तो किसी ने मेशियत । और थोडे खुल्ले भाषा में तुलना की जाय तो जिन्हें समाज वेश्या कहता है, वे इन व्यभिचारी दासियों से हर हाल में प्रतिष्ठित होनी चाहिए । क्योंकि वेश्या शरीर से वेश्या होकर भी मन से स्वच्छ होती हैं । वे भयंकर किसी मजबूरी की शिकार होती हैं । किसी की जिन्दगी सँवारने और निर्माण के लिए वो कोठी तक की सफर कर लेती हैं जबकि रंगो रंग में चमचमाती किसी की रखैल इतनी निर्लज्ज, बेहाया और बदचलन होती है कि अपने घर, परिवार और समाज तक को धोखा देकर झूठी शान और सम्मान की रोब झाडती हैं ।
पूर्व मन्त्री जय प्रकाश गुप्ता की एक तथ्य कहावत मधेशी नेतृत्वों का चरित्र और हालात को प्रस्तुत करने में काफी है । उन्होंने मधेशी दल पर ही एक तथ्य को उजागर करते हुए कहा था कि कुछ दशक पहले मधेश के किसी गाँव में जवानी में मदहोश में मटक मटक कर बलखाते हुए रास्ते चलने बाली एक निम्न हैसियत की लडकी को देखकर उसके ही पडोसी एक महिला तपाक से बोलती है, “हैगे छौरी, केतबो मटैक मटैक आ बलैख बलैख के चलबे, त तोहर जवानी के पहिलका रस गाँव के राणा साहब ही लुटतौ, तोहर घर बाला नै ।”
जेपी जी ने भले ही आज से कुछ दशक पहले के गाँवों में रहे राणा, ठाकुर, चौधरी, सिंह, राठौर, चौहान, देवान, मालिक, महाजन या जमिन्दार साहबों द्वारा गाँवों के जवान होती महिलाओं पर नियम लगाकर, मालकियत दिखाकर, रखैल बनाकर, दासी बनाकर, धाक धम्की दिखाकर, या प्रेम दिखाकर ही हों ः अपने वश में रखकर उनकी शोषण करते थे । स्थिति आज भी वही है । फर्क सिर्फ इतना है कि कल्ह शोषण के शिकार हो रही महिलाओं ने अपनी वजूद और प्रतिष्ठा को समझकर मालिकों के चालाकी और अत्याचारों के विरुद्ध एक होकर अपने और अपने बच्चियों को सुरक्षित कर रही हैं । मगर मधेश के नाम पर मधेशियों की मुक्ति की दलिल देने बाले मधेशी नेता खस पहाडी शासकों के इतने बडे रखैल बन जायेंगे, इसकी कल्पनातक मधेश ने नहीं की थी । मधेशी इन बेहाये नेताओं की रुप, रंग, आवाज और लिवास फिर ऐसे हैं, मानों वे कितने सती सावित्री हैं ।
कोई मधेश के अधिकार आन्दोलन को, कोई प्रभुसत्ता प्राप्त करने को, कोई समानुपातिक प्रतिनिधित्व आन्दोलन को, तो कोई स्वतन्त्र मधेश – अलग देश के मुद्दों के प्रोटिन, भिटामिन, मिनरल्स, क्याल्शियम और न्यूट्रिएन्ट्स पाकर खुब सूरत जवान होता है और अपने उस जवानी को चालाक, धनाढ्य, फरेबी, चतुर और बहुरुपिये खस शासको के राजनीतिक महलों में उसके दास, वेश्या और रखैल बनकर अपनी जवानी की सारी ताकत और सुन्दरता पद, पैसे, और सत्ता के लोभ में बेच देता है । कोई सरकार में जाने के लिए, कोई सरकार में जाकर संसद और सरकार दोनों जगहों से मधेश मुद्दों को उठाने के नाम पर, कोई मधेशी जनता का राजनीतिक और प्रशासनिक काम करने के नाम पर, कोई किसी गैर मधेशी पार्टी के चुनाव चिन्ह लेकर भी स्वतन्त्र उम्मीदवार बनकर चुनाव लडने के नाम पर, तो कोई जेल के चार दीवारों से मधेश मुक्ति के लिए ऐतिहासिक सहमति करने के नाम पर अपना नियत और चरित्र बेचता है, वहीं वो मधेश की भावना और अस्तित्व को बेच देता है ।
मधेश की गलियारों में, सडक और दूकानों में, दफ्तर और चौराहों पर और सबसे ज्यादा फेसबुक सामाजिक संजालों पर आजकल “जनता समाजवादी पार्टी” ‐जसपा) और स्वतन्त्र मधेश गठबन्धन को बेचकर बनाये गये “जनमत पार्टी” ‐जपा) की चर्चा है ।
मधेश में एक कहावत है “हरबडी के वियाह, कनपट्टी में सेनुर” । जिस ओली ने सालभर पूर्व तत्कालीन समाजवादी और राजपा को तोडने के लिए एक अध्यादेश लाया था, आज उसी ओली के चरण में जसपा का एक समूह नतमस्तक हैं, वहीं उस ओली के सरकार में मन्त्री रहे जसपा के दूसरा समूह ओली के विरुद्ध खडा होते हुए भी चारो मुँह चित दिख रहे हैं ।
दोनों समूह के अपने अपने दावे हैं । ओली के पक्ष में खडे समूह मधेश मुद्दों को सम्बोधन कराने के ख्वाब में मधेश को उल्लू बनाने में है तो ओली के विपक्ष में रहे समूह का ओली द्वारा अपमान के साथ सरकार से निकाले जाने का पीडा बोध है जिसे वह मधेश मुद्दों से जोडने के कोशिश में है । मगर एक्सरे किया जाय तो ना तो नियत के आधार पर, न संविधान और संसद के मौजूदा गणितीय आधार पर ही वह संभव है । राजेन्द्र महतो जी बनियागिरी से ज्यादा राजनीति को समझते नहीं । मगर महन्थ जैसे कानुन के ज्ञाता भी इस बात को जब ना समझे तो फिर आश्चर्य की बात जरुर है । आश्चर्य की थप बात यह है कि इन दो नेताओं ने ओली का नाम तक को खतरा का संकेत मानते थे । यहाँ तक कि इन दोनों की तत्कालीन राजपा ने ०७४ के पहले चरण बाले चुनाव तक को पूर्ण बहिष्कार किया था और ओली के कट्टर दुश्मन दिख रहे उपेन्द्र जी समर्थन में जाकर चुनाव का सहयोग किये थे ।
राजेन्द्र, उपेन्द्र और महन्थ जी को इतना तो बुद्धि होनी ही चाहिए थी कि मुद्दाविहीन सत्ता संघर्ष का नाटक कर एकता के चादर में लिपटे मधेशी नेताओं को तोड फोडकर माधव और ओली एक हो जाते हैं । देर से ही क्यों न हो, इतिहास प्रमाणित करेगा ही कि उपेन्द्र पर सवार कोई बाबुराम भट्टराई नामक प्रेत ने भी मधेशी एकता को नाकाम किया था ।
उहापोह की स्थिति अब यह है कि जिस जसपा का नेता होने का महन्थ और उपेन्द्र जी दावा कर रहे हैं, सही में वो जसपा है किसका ? किसका रहेगा ? चलेगा या बिखरेगा ? उससे मधेश का कोई मुद्दा सम्बोधन होगा भी या नहीं ?
जनमत में रहते और उसे छोडने के बाद सत्ता और प्रतिपक्षी सारे दल हमें अपने अपने पार्टियों में ससम्मान आने का प्रस्ताव किये । जबाव में हमने यही कहा कि सम्मान ही देने हों तो मधेश मुद्दों को व्यवहारिक सम्बोधन हो, हम वहाँ बिना किसी पद और अवसर के भी काम करेंगे । उसी सिलसिले में जसपा के अध्यक्ष ने हमारे मुलाकात में कहा कि महाभारत युद्ध समाप्ति के बाद विधवा तथा पिताविहीन महिलाओं के साथ भिल्ल समुदाय के लफंगों द्वारा किये जाने बाले दुव्र्यवहार और अत्याचार से बचाने देने के लिए वे श्रीकृष्ण और पाण्डवों के पास गईं । भिल्ल के विरुद्ध श्रीकृष्ण और पाण्डवों समेत ने अपने अपने शक्ति और यन्त्रों का प्रयोग करना चाहे । मगर वे नहीं सके । उसी तरह, उन्होंने कहा, मौजूदा कोई भी मधेशी दल अगर यह चाहे कि मधेश के मुद्दों को पूरा कर लें तो श्रीकृष्ण और पाण्डवों के असमर्थता को समझ लेना पर्याप्त है । वैसे ही तत्कालीन राजपा के अध्यक्ष मण्डल के सदस्य और जसपा के एक वरिष्ठ नेता से मधेश मुद्दों पर बात करने पर उन्होंने बडे इमानदारी से कहा, कैलाश जी, “मधेश मुद्दा के अब हम सब केवल बात कैर सकै छी, समाधान देना मुश्किल छै । एहने बात उठाइब के राजनीति कैर रहल छी । की करबै ?”
नेपाल सरकार के पूर्व मन्त्री, तत्कालीन राजपा के वरिष्ठ उपाध्यक्ष और नव निर्मित रहे जसपा के एक केन्द्रिय नेता के अनुसार जसपा कर्कला ‐अरुवा÷अरुइ) का पात है, जिस पर पानी टिक ही नहीं पाने की बात कही थी ।
सदभावना, संघीय समाजवादी फोरम, समाजवादी, तमलोपा, राजपा और जसपा पर मधेश का मुद्दा छोडने, बेचने, चुनाव लडने, सत्ता में जाने, पार्टी से मधेश शब्द हटाने, व्यक्तिगत लाभ के लिए राज्य और सरकार से अनेक सहमति सम्झौता करने का आरोप लगाने बाले महान् वैज्ञानिक, यूवा इंजिनियर्स, डाक्टर्स और बुद्धिमानों, जो सख्त घडी में कहीं दिख नहीं रहे थे, की पार्टी कहे जाने बाले “जनमत पार्टी” ने भी वही काम किया है । तुलनात्मक रुप में उन मुद्दे बेचुवों से भी कम समय में स्वतन्त्र मधेश के मुद्दों को बेचकर मधेश शब्द तक को इतने जल्द किसी ने नहीं दुत्कारा था । कुछ शब्दों में कहें तो वह मधेश से हमेशा के लिए खिसक जायेगा, अगर होश अब भी नहीं सम्भाले तो ।



