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डूबते नेपाल की अंतिम आशा – महंत ठाकुर : अजयकुमार झा

 
महन्थ ठाकुर, फाईल तस्वीर

अजयकुमार झा, जलेश्वर ।  नेपाल आज अस्थिरता, अन्योल और राजनीतिक संकट में घिरा हुआ है। कांग्रेस, माओवादी और एमाले जैसे नेपालको नेतृत्व प्रदान करेने वाली पार्टियों के द्वारा संविधानसभा मार्फत जिस संघीय लोकतांत्रिक गणतंत्रात्मक संविधान का निर्माण किया गया था, आज उसको व्यक्तिगत अहंकार और मूढ़ता के कारण नष्ट करने का प्रयास किया जा रहा है। निरंकुशता, उद्दंडता और भ्रष्टाचार को अपना शृंगार और संस्कार बनाए बैठे नेतागणों के लिए माओवादी युद्ध और लोकतंत्र के लिए प्राण न्योछावर करने वाले बीस हजार नेपाली वीर सपूतों का कोई मूल्य नहीं है। साहिदों के लाशों पर राजनीतिक महल खड़ा करनेवाले दुष्टों से देश के विकास और संरक्षण की आशा रखना ही मूढ़ता है, अज्ञानता है, भ्रम है, आत्महत्या है।
यहां के शासक, चाहे वो किसी भी पार्टी के क्यों न हो; उसे दो कौड़ी में खरीदकर कठपुतली की तरह नचाया जा सकता है, इसमें किसी को संदेह नहीं है। फिर भी हम गुलामों की तरह बार बार उसी नालायकों को अपना मालिक चुनते आ रहे हैं। क्या यह हमारी मूढ़ता और बैचारिक नपुंसकता नही है !
लेकिन हमें तो मधेसी और जनजाति के विरुद्ध में गदहों को भी बाप बनाने में शर्म नही आती है। नेपाल के एक समुदाय, जो सत्ता भोगी रहा है; वह चाहे जितना भी तर्क और सिद्धांत उगल ले लेकिन भीतर से सत्ता के लिए खुद के आत्मा तक को बेचने में भी नही शर्माता है। यहीं से शुरू होता है अमानवीय षड़यंत्र, असभ्यता का संचार और दासानुवृत्ति संस्कार का जन्म जो लोकतंत्र के लिए प्राणघातक माना जाता है।

अपनी कुर्सी और पद बचाने के लिए तथा अकूत संपत्ति कमाने के लिए शासक अपनी अनुयायियों के सहयोग से संविधान और कानून का उलंघन करना अपना अधिकार और हुकुमी प्रवृत्ति सार्वजनिक कर जनमानस में स्थापित करना चाहता है। नेपाल आज के समय में इसका उत्तम नमूना बनता जा रहा है। लेकिन दुर्भाग्य है इनका की मदारी लोग इन्हें चैन से रहने नही दे रहे हैं। मदारी भी भांति भांति के देश, प्रदेश, क्षेत्र, भाषा तथा संस्कार के होने के कारण सारे के सारे नेता, बुद्धिजीवी और विश्लेषक लोग भी कन्फ्यूजिया गए हैं ऐसा लगता है। ध्यान रहे! वर्तमान का सामूहिक कन्फ्यूजन देश को सामुहिक घात की ओर ले जा सकता है। सतर्कता, धैर्यपूर्वक समझदारी और कूटनीतिक दूरदर्शिता को आत्मसात कर ही अगला कदम उठाना सर्वहितकारी होगा, वरना भस्मासुर की तरह विनाश की ओर तो हम नचाते हुए जा ही रहे हैं।

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हमने राज्य संचालन के लिए जिस लोकतांत्रिक विधि को स्वीकार किया है, उसमे राजनीतिक दल का होना आवश्यक है। जनता में सुरक्षित राजनीतिक स्वतन्त्रता के अधिकार को सम्मान के साथ प्रयोग और पालन एक जिम्मेदार सरकार निर्माण करना दलों का ही काम है। लेकिन इसका मतलब ए नही है कि पार्टियों के नेतृत्व वर्ग हमारी राष्ट्रीय गरिमा को बार बार मूर्ख, असभ्य और हत्यारा के हाथों में सौंपता रहे और हम चुपचाप उसके गुण गाते रहें। नहीं, यह हमारी नपुंसकता है। वैचारिक खोखलेपन के प्रतीक है। गुलामी संस्कार के द्योतक है। एक विश्वविख्यात वीर नेपाली के संस्कार इतना घटिया नहीं हो सकता।
2046 के वाद इस देश के नेताओं और पार्टियों ने जनता को क्या दिया है? इसका गंभीर हिसाब हमे मागना चाहिए। यह हमारा अधिकार है। पिछले तीस वर्षों में हजारों नेता अरब पति हो गए, उनके वंशज धनवान हो गए, देशका उद्योग बिक गया, कल कारखाना नष्ट कर दिया गया, खेतीबारी विरान हो गया, जनता विदेशों में पाई पाई के लिए मोहताज हो गए, बहु बेटियों को विदेशियों के हाथों का खिलौना बना दिया गया और अब खुद विदेशियों के कठपुतली बनकर रिक्षबहादुर हो गए। क्या इन्हीं विशेषताओं के लिए प्रजातंत्र, लोकतंत्र और गणतंत्र की स्थापना हेतु आम जनता ने अपने प्राण न्यौछावर किए थे ? इन्हीं नालायको के करतूत के कारण अब नागरिक को यह लगने लगा है की राज संस्थाको विस्थापित कर हमने कही भारी भूल तो नहीं कर ली ! यह पश्चगामी विचार इन गुलाम अग्रगामियों के कारण अब प्रगतिगामी लगने लगा है। भारत के सेनापति और उत्तर प्रदेश सरकार ने कुछ संकेत भी दे दिए हैं, सुधरने के लिए। लेकिन हम तो प्रतिज्ञा कर बैठे हैं की, “हम नही सुधरेंगे।”
जिस प्रकार मुर्दे को देखकर गिद्ध, कुत्ते और कौवे चारो ओर से झपटना सुरु कर देते हैं,ठीक उसी प्रकार पिछले तीस वर्षों से नेपाल माता को इन जन्मों जन्मों के भूखे दरिंदों ने अपनी व्यक्तिगत स्वार्थपूर्ति हेतु नोचने का काम ही किया है। पार्टी तोड़ना, नया पार्टी बनाना, भोलेभाले जनता को बहकावे में झोंककर वलि का बोका बनाकर उसके खून पर राजनीति कर अपना भविष्य बनाना, कभी वैदेशिक हस्तक्षेप तो कभी भारत विरोधी तो कभी मधेसी विरोधी उग्रराष्ट्रवाद के आवाज को बुलंद कर देश को बेचना। इस प्रकार नेपाल के राष्ट्रीय स्वाभिमान तक को इन भेड़ों ने अपमानित करने में कोई कसर नहीं छोड़ा है।
ज्ञातव्य हो ! जो व्यक्तिगत स्वार्थ के लिए पार्टी तोड़ सकता है, काली गंडकी, कोशी, महाकाली बेच सकता है, वो कल्ह देश को नही बेचेगा इसका क्या गारंटी है?
सावधान! राजनीतिक सिद्धांत, आदर्श और नैतिकता की आशा इन अनपढ़, कुसंस्कारी तथा हत्यारों से करना शायद अबतक की सबसे बड़ी मूर्खता है हमारी। सुधरने की प्रतीक्षा का भी एक सीमा होता है। नेपाली शासक लोग निकृष्टताओं की सारी सीमा लांघ चुके हैं। अब मौलिक संशोधन के लिए अग्रसर होना ही एकमात्र उपाय बांकी रहा गया है वो है, गुणतंत्र की स्थापना ‘ ह, आप सही पढ़ रहें हैं। (गुणतंत्र) अर्थात प्राज्ञों, प्रबुद्धों, ज्ञानी और गुणियों तथा शिक्षा क्षेत्र में विशिष्टता हासिल किए हुए लोगों के द्वारा संचालित राजनीतिक प्रणाली। एक ऐसा राजनीतिक प्रणाली, जिस में विश्व शिक्षा क्षेत्र और प्रज्ञा मंच पर अपनी गुणवत्ता और व्यक्तित्व से उच्च सम्मान प्राप्त व्यक्तियों द्वारा नेपाल तथा नेपालियों के सुखदायी भविष्य तथा सुरक्षित अस्तित्व को मजबूती प्रदान करने के लिए पूरी समर्पण के साथ सक्रियता दिखावेगा। जिस के जीवन का मौलिक आदर्श, प्रतिष्ठा और राष्ट्रीय गरिमा होगा, न की आज के नेताओं की तरह पद और पैसा। और यदि यह भी असफल होता है, तो निष्कर्ष में यही माना जाएगा की नेपाल देश कहलाने के लायक ही नहीं है। अतः राज संस्था के हाथों में सौप दें, अथवा ठेका में दे, क्या फर्क पड़ता है। विदेशियों के लिए सहज सरकार बनाना और ठेका में देना, एक ही तो है।
आज के राजनीतिक पार्टी के प्रति जो आम धारणा बनती जा रही है, वो है, कानूनी व्यवस्था और मान्यताओं का मजाक उड़ाना तथा विस्थापन करना। धार्मिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, भाषिक, आर्थिक और सांप्रदायिक रूप से नागरिकों के बीच खूनी विभाजन का माहौल बनाना। रोग, महामारी में भी विभेदपूर्ण उपचार तथा सुविधा मुहैया कराना। और जनता को हर प्रकार से कमर तोड़कर, कमजोर बनाकर, दलित और निरीह बनाकर उसपर सदा के लिए शासन करना। तो प्रश्न उठता है, कि, क्या हम इसे लोकतांत्रिक शासन प्रणाली और कल्याणकारी शासक कह सकेंगे ? अगर हां ! तो स्वागतम् ! अगर नहीं, तो फिर आंदोलन ! गीता में श्री कृष्ण अर्जुन से कहते हैं, ” हे अर्जुन, इस जीवन को जीने का दो ही रास्ता है। पहला शुभ के साथ चलो, और दूसरा अशुभ के साथ हो लो।” अब यह हम पर निर्भर करता है कि हमने जीवन के गहिराई को कितना समझ पाया है। इतना तो सार्वभौम सत्य दिखाई देता है की रामायण और महाभारत धारावाहिक देखने के वाद नब्बे प्रतिशत से भी ज्यादा लोग राम और पांडव के पक्ष में खड़े हैं। क्योंकि ए लोग शुभ अर्थात सत्य अथवा कहें न्याय के लिए युद्ध कर रहे हैं, तो फिर आज पूरे देश के विद्वानों का जमीर कहां चला गया! मधेस विरोधी भावनाओं को भड़काने बाला चाहे जन हत्यारा ही क्यों न हो, खुले दिल से उसका समर्थन करना क्या संदेश देता है ? क्या आपके अंतस्तम में यह पाप शूल की तरह नहीं चुभता ? अवश्य चुभता है, आज तो वह नासूर हो गया है, यह जो चारो ओर तिलमिलाहट और अकुलाहट दिखाई दे रहा है, वैसे ही नही है। सदा से विदेशी कहने वाले मधेसी को आज प्रधानमंत्री के लिए खुशामद करना उसी पाप के प्रायश्चित का संकेत है। और खुशामद के वावजूद जिस पद के लिए नेपाली शासक लोग देश को बेचने तक का समझौता करने में नही हिचकते उस प्रधानमंत्री जैसे सर्वोच्च कार्यकारी पद को ठुकराने का हिम्मत एक मधेसी नेता के द्वारा अभिव्यक्त होना महामानव की ओर संकेत करता है। यही वह राजनीतिक संस्कार और मर्यादा है जिसका इंतजार कृष्णप्रसाद भट्टराई जी के वाद अब देखने सुनने को मिल रहा है। आज नेपाल के कांग्रेसी और माओवादियों को यह समझ में आ गया है, कि यदि चुनावी सरकार का नेतृत्व वर्तमान प्रधानमंत्री के हाथों में ही रहता है तो हमारा सफाया निश्चित है। हर हाल में पहाड़ और हिमाली क्षेत्र में एमाले पार्टी कांग्रेस और माओवादी के जड़ों को उखाड़ फेंकेगी, साथ ही तराई मधेस में भी जसपा और जनमत के साथ सहमति और समझौता के तहत कुछ सीटों पर दस्तक दे सकती है। इस प्रकार मधेसी पार्टी और एमाले के आंतरिक समझदारी के तहत वर्षों तक बड़ी सहजता से शासन किया जा सकता है। आज इसी भय के कारण कांग्रेस, माओवादी और एमाले विरोधी खेमा जसपा अध्यक्ष श्री महंत ठाकुर जी, जो एक सभ्य, निर्लोभी, विद्वान तथा जनकल्याणकारी राष्ट्रवादी मधेसी नेता हैं, को सर्वसम्मति से चुनावी प्रधानमंत्री बनाने के लिए तत्पर हैं। लेकिन ठाकुर को भी प्रधानमंत्री बनना आसान नही है, उनके अपने ही लोग उनके विरुद्ध षड्यंत्र शरू कर चुके हैं । अब देखते जाइये आगे आगे होता त् क्या ? यह राजनीति हैै कुछ भी हो सकता ।

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