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2021-22 का बजट- राजनीतिक उड़न खटोला में सवार बजट है : वसन्त लोहनी

 

रंगी रंगी हवा भरे हुए विकास का बैलून उड़ा कर और तनिक सा चारा सबको फेंक कर वितरण मुखी बजट से जो चकाचक तस्वीर दिखाने की कोशिश किया है वह आने वाला चुनाव को लिहाजा किया है। 

2021-22 का बजट सबको चारा फेंके हुए वितरण मुखी बजट

वसन्त लोहनी, काठमांडू | बजट अनुमानित आय व्यय है और यह मुल्क के आवधिक योजना से जुड़ना चाहिए। इसलिए बजट को साल भर की योजना भी कहा जाता है। ओली सरकार के अर्थमंत्री पौडेल मार्फत अध्यादेश में प्रस्तुत करीब साढ़े 16 खरब के बजट को देखने के बाद सीधा कहा जा सकता है कि इसका मुल्क के पंचवर्षीय योजना के साथ कोई तालमेल नहीं है। बजट यथार्थ के नजदीक नहीं है। बल्कि सत्तासीन पार्टी का राजनीतिक उड़न खटोला में सवार है। बजट में 22% विकास खर्च होने की बात जो रखी गई है जो कि दिखावे का है। अगर सीधा कहा जाए तो यह सिर्फ जनता को बेवकूफ बनाने की हवा की महल है।

गत साल विकास के लिए  बिनियोजन किया गया रकम में से 14% भी खर्च करने के लिए सरकार नाकाम रही। वहीं सरकार करीब 3 खरब खर्च करने की बातें बजट में जनता से कर रही है। यह बिल्कुल नामुमकिन है। अलबत्ता नियमित खर्च सरकार पूरी की पूरी करेगी। इसके बावजूद जब गुलछर्रे उड़ाने के लिए रकम कम पड़ेगा तब अनेक बहाना में, अनेक शीर्षक में, विकास के लिए रखा गया पैसा निकालकर शासकों हम जनता के ही नाम लेकर आराम से खर्च करेंगे। ऐसी स्थिति बिगड़ती हुई मुल्क की आर्थिक स्वास्थ्य की द्योतक है। नेपाल के आर्थिक स्थिति अभी 2% से भी ज्यादा ऋणात्मक है।

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बजट का 2 खरब से ज्यादा रकम सावा और व्यास किस्तों में भुगतान करने में जाता है। इसी तरह 4 खरब प्रांतीय सरकार चलाने के लिए दिया गया है। खर्च के जुगाड़ के स्रोत में 10 खरब से ज्यादा राजस्व आमदनी और बाकी आंतरिक और बाह्य ऋण से पूर्ति करने की बात बजट में कही गई है। इस बात को अगर गौर करें तो राजस्व कितना होगा यह रेमिटेंस में आधारित है। यकीन के साथ कहा जा सकता है की अगर रेमिटेंस कम हो गया तो इतना राजस्व आमदनी हो नहीं पाएगी। इसी तरह 3 खरब के विदेशी ऋण आने की कोइ विश्वासपूर्ण आधार नहीं है।

अपने घर और जमीन बैंक में गिरवी रख कर लिया हुआ ऋण रकम से अगर आमदनी बढा ना सके और उसी रकम से खाते रहें तो निसंदेह है उस घर और जमीन को बैंक कब्जे में ले लेगी। आदमी टाट उलट जाएगा। मुल्क का भी ऐसा ही हाल हो जाएगा। मुल्क का स्वतंत्रता, आर्थिक और राजनीतिक निर्णय लेने का अधिकार कर्जा देने वाले के हाथ में चला जाएगा। इसीलिए कर्मचारी को तलब खिलाने के लिए विदेशी ऋण लेते रहेंगे तो वह दिन ज्यादा दूर नहीं है। अभी का बजट उसी दिन के रास्ता पकड़ कर चला हुआ है। इससे शासक को तत्काल सरकार चलाने में आसानी होगा लेकिन मुल्क डूबता चला जाएगा।

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विगत के अनुभव के आधार पर अगर देखा जाए तो बजट में 3 खरब के ऋण आने की जो बात कही है वह बेबुनियादी है। उतना ऋण रकम आएगा नहीं। यह बात यकीनन कहा जा सकता है। जब नहीं आएगा तो क्या होगा ? रकम पूर्ति करने के लिए सरकार केंद्रीय बैंक से और ज्यादा पैसा लेगी। जो महंगी अभी हम सब भुगत रहे हैं इससे कहीं ज्यादा महंगाई और बढ़ेगी। सरकार विकास नहीं कर पाएगी लेकिन अपने लिए तो वह खर्च और बढ़ती चली जाएगी। यह तो जगजाहिर हुइ बात है।

आयात और बढ़ता चला जाएगा। क्योंकि नेपाल के अर्थतंत्र दीर्घ कालीन सोच में टिका हुआ नहीं है। यह तो राजनीतिज्ञ, ब्यूरोक्रेसी और व्यापारी के मिलीभगत में संचालित होने की वजह से अभी जो चल रहा है वह ‘त्रिकोणात्मक लूटतंत्र’ है। इसके बदौलत मुल्क में अभी सुकुल गुंडा अर्थ तंत्र है। आयात बढ़ते चला जाना और निर्यात की संभावना न्यून होते चले जाने से व्यापार घाटा और ज्यादा होगा। अंततः इसका भार विनिमय दर पर पड़ेगा। तब किसी के बकवास भाषण से कुछ होने वाला नहीं है।

यहां पर फिर राजस्व की बात आती है। राजस्व बढ़ाने के लिए रेमिटेंस बढ़ना अनिवार्य है। जब रेमिटेंस बढ़ेगा तभी आयत राजस्व बढ़ेगा। इसका अर्थ यह है की नेपाली युवा ने मरुभूमि में बहाए हुए रगत और पसीने में यह बजट आधारित है। हमारे शासक के मौज करने का आधार बस यही  रगत और पसीना है।

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मुल्क की आमदनी में सर्विस सेक्टर का उल्लेख योगदान है। लेकिन इसको चलायमान भी रेमिटेंस ही करता है। अतः यह भी रेमिटेंस से ही जुड़ा हुआ है। करोना प्रकोप की वजह से इसका गति धीमा है। पहले नेपाल के आर्थिक वृद्धि दर कृषि में अड़ा हुआ था। अब यह रेमिटेंस पर है। जब तक कृषि में आधुनिकीकरण करके उसके बुनियादी पर नेपाल के अर्थतंत्र विकास नहीं होगा तब तक नेपाल के आर्थिक भविष्य बिल्कुल सुरक्षित नहीं है।

रंगी रंगी हवा भरे हुए विकास का बैलून उड़ा कर और तनिक सा चारा सबको फेंक कर वितरण मुखी बजट से जो चकाचक तस्वीर दिखाने की कोशिश किया है वह आने वाला चुनाव को लिहाजा किया है। इसीलिए इस बजट का ज्यादातर बातें बेबुनियादी है। क्योंकि अर्थतंत्र अपने नियम से, प्रणाली से और अपने गति में चलता है। राजनीतिक आतिशबाजी में नहीं। इसीलिए राजनीति के तहत रातो रात टोपी से कबूतर निकालने और चमत्कार दिखाने का बात नहीं है यह।

‘सदन के विश्वास गुमाया हुआ कामचलाऊ ही नहीं बल्की अवैधानिक सरकार है यह। इसीलिए इसका औकात ही नहीं है कि इस तरीके के बजट लेकर के आए।

अगर चेतना हो।

वसन्त लोहनी, काठमाण्डू

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