रहने को सदा दहर में आता नहीं कोई, तुम जैसे गए ऐसे भी जाता नहीं कोई : कैफी आजमी
कैफ़ी आज़मी उर्दू के महान शायरों में से एक शायर थे इन्होने हिंदी फिल्म में कई गीत लिख कर भी फ़िल्मी जगत में अपना नाम बनाया | इनका जन्म 14 जनवरी 1919 में उत्तरप्रदेश के आजमगढ़ जिले में हुआ था इनकी रचनाओं के लिए भारत सरकार ने इन्हे कई तरह के साहित्यिक पुरूस्कार से सम्मानित भी किया इसके अलावा इन्हे फिल्मफेयर अवॉर्ड भी मिल चुका है व 1974 में भारत सरकार द्वारा उन्हें पद्मश्री से सम्मानित किया गया | इसीलिए हम आपको इनके द्वारा लिखी गयी कुछ बेहतरीन रचनाओं में से शायरियो के बारे में बताते है जो की आपके लिए काफी महत्वपूर्ण है |
मैं ढूंढता हूँ जिसे वह जहाँ नहीं मिलता
नई ज़मीं नया आसमां नहीं मिलता
बस्ती में अपनी हिन्दू मुसलमाँ जो बस गए
इंसाँ की शक्ल देखने को हम तरस गए
बेलचे लाओ खोलो ज़मीं की तहें
मैं कहाँ दफ़्न हूँ कुछ पता तो चले
मुद्दत के बाद उस ने जो की लुत्फ़ की निगाह
जी ख़ुश तो हो गया मगर आँसू निकल पड़े
क्या जाने किसी की प्यास बुझाने किधर गयीं
उस सर पे झूम के जो घटाएँ गुज़र गयीं
गर डूबना ही अपना मुक़द्दर है तो सुनो
डूबेंगे हम ज़रूर मगर नाख़ुदा के साथ
जो इक ख़ुदा नहीं मिलता तो इतना मातम क्यूँ
यहाँ तो कोई मिरा हम-ज़बाँ नहीं मिलता
रहें न रिंद ये वाइज़ के बस की बात नहीं
तमाम शहर है दो चार दस की बात नहीं
कोई तो सूद चुकाए कोई तो ज़िम्मा ले
उस इंक़लाब का जो आज तक उधार सा है
इसी में इश्क़ की क़िस्मत बदल भी सकती थी
जो वक़्त बीत गया मुझ को आज़माने में
मेरा बचपन भी साथ ले आया
गाँव से जब भी आ गया कोई
बस्ती में अपने हिन्दू मुसलमाँ जो बस गए
इंसाँ की शक्ल देखने को हम तरस गए
रहने को सदा दहर में आता नहीं कोई
तुम जैसे गए ऐसे भी जाता नहीं कोई
मुद्दत के बा’द उस ने जो की लुत्फ़ की निगाह
जी ख़ुश तो हो गया मगर आँसू निकल पड़े
पेड़ के काटने वालों को ये मालूम तो था
जिस्म जल जाएँगे जब सर पे न साया होगा
अब जिस तरफ़ से चाहे गुज़र जाए कारवाँ
वीरानियाँ तो सब मिरे दिल में उतर गईं
इतना तो ज़िंदगी में किसी के ख़लल पड़े
हँसने से हो सुकून न रोने से कल पड़े
झुकी झुकी सी नज़र बे-क़रार है कि नहीं
दबा दबा सा सही दिल में प्यार है कि नहीं

