वो तो नदी है, उसे मत बाँधो मर्यादा के अवगुंठन में, अपना मार्ग स्वयं प्रशस्त करेगी : शिप्रा
वो तो नदी है
वो तो नदी है
उन्मुक्तता उसकी फितरत है
मत बाँधो उसे
सीमाओं में
उसे बहने दो
चट्टानों से टकराकर
वो और निखरेगी
शून्य से अनन्त तक
अविरल, अबाध
अपने आँचल में
सहेजे, सभ्यता के
ना जाने कितने स्वरूप
अपना मार्ग
स्वयं प्रशस्त करेगी
उसे मत बाँधो
मर्यादा के अवगुंठन में
भूधर के वक्ष से
फूटती धार
दुर्गम घाटियों से
गुजरकर, अमृत रस बन
सदैव भिगोती है
धरा के सूखे अधर
प्रतिपल प्रत्याशा से परे
और बनती है
द्योतक, सृष्टि के
सातत्य की !
अपने विशाल हृदय में
समेटे झंझावातों – तूफानों को
समाहित हो जाती है
अंततः वारिधि में
और नियति की
उठती गिरती
लहरों संग
अठखेलियाँ करती
प्रहर्षित करती हैं
अखिल ब्रह्मांड को !
2
नव वर्ष
बीतती तारीख संग
बीत रहा है एक और वर्ष
होकर आतुर समाने को
काल के गर्भ में
जिसमें समाहित है
तिक्त – मधुर स्मृतियों के
अनगिनत पन्नें
और हर पन्नें में छिपी है
एक दास्तान, एक ही सीख
कि बटोर चल खुशियों को
अपने दामन में
और कर अंतर्दाह
दर्प, दंभ और संताप का
क्योंकि, उन पन्नों के बीच
फड़फड़ा रहा है
नव वर्ष का नवजात परिन्दा
और व्याकुल है
खोलने को हौले – हौले
अपने पंख इस आस में
कि आदम भी
गमले में महकना छोड़
करेगा रुख़ क्यारियों की ओर
और फिर होंगे गुलजार
बाग बगीचे
जिनमें खिलेंगी
हौसले की कली
ख्वाहिशों के फूल !
शिप्रा


