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पाकिस्तानी प्रधानमंत्री का मास्टरस्ट्रोक : प्रेमचन्द्र सिंह

 

प्रेमचन्द् सिंह, लखनऊ, 4अप्रैल । पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान क्रिकेट के प्रसिद्ध एवं माहिर खिलाड़ी रहे हैं और अपने काबिलियत के बदौलत वर्ष-1992 में अपने नेतृत्व में विश्वकप का खिताब जीतकर पाकिस्तानी क्रिकेट टीम का नाम रौशन किया। प्रधानमंत्री खान का आकर्षक व्यक्तित्व और ईमानदार चेहरा पाकिस्तानी आवाम के बीच खासा लोकप्रिय है। क्रिकेट की पारी के बाद करीब 22 वर्षों से अधिक के कालखंड में राजनीति की पारी की संघर्ष ने खान साहब को कुशल वक्ता, लोकप्रिय नेता तथा निपुण संगठनकर्ता बना दिया जिसके कारण उनकी यह दूसरी पारी कई कौतुहलपूर्ण राजनीतिक करिश्माओं से भरा पड़ा है। खान साहब का पाकिस्तानी आवाम के बीच इतना मजबूत और बृहत जनाधार है जितना कभी पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी (पीपीपी) के मुखिया स्वर्गीय जुल्फिकार अली भुट्टो और बाद में उनकी बेटी बेनजीर भुट्टो की हुआ करता था। अब पीपीपी का जनाधार सिंध प्रांत तक तथा पाकिस्तान-मुस्लिम- लीग (नवाज) पार्टी यानी पीएमएलएन पार्टी का जनाधार पंजाब प्रान्त तक सीमित रह गया है। खान साहब पाकिस्तान- तहरीक- ए-इंसाफ (पीटीआई) पार्टी के संस्थापक हैं और अपने बलबूते पर पीटीआई को पाकिस्तान की केंद्रीय सत्ता तक पहुंचाने के साथ ही पंजाब और खैबर पख्तूनखां प्रांतों में सत्तासीन करने में सफल रहे हैं, पाकिस्तान के शेष दो प्रांतों – सिंध प्रान्त में पीपीपी और बलूचिस्तान में बलूचिस्तान अवामी पार्टी (बीएपी) की सरकार है। राजनीति की कला में तो इमरान खान माहिर हो गए हैं, लेकिन उनमें प्रशासनिक क्षमता की कमी सबकी नजरों में खटकती रही है। इमरान खान एक ऐसे प्रधानमंत्री है जो एक साथ पाकिस्तान की सभी विपक्षी दलों और सेना के निशाने पर है। देश के नाम संदेश में अभी हाल ही में प्रधानमंत्री खान ने अमेरिका को उनकी सरकार गिराने में सूत्रधार की भूमिका का जिक्र करते हुए एक पत्र का खुलासा किया, जिसके मजमून का किसी को अभी तक कुछ पता नहीं है। अमेरिका ने इसे सिरे से नकार दिया है। खान साहब (प्रधानमंत्री)अब लगातार भारत की नीतियों की तारीफ कर भारत के प्रशंसक बन गए हैं। इतना तो जरूर है कि खान साहब की विदेश नीति ने पाकिस्तान में भूचाल ला दिया है, पाकिस्तान को अमेरिकी तथा अरब देशों के खेमों से खींचकर चीन तथा रूस के खेमा में ला खड़ा किया है। रूस-यूक्रेन युद्ध के मध्य खान साहब की रूस यात्रा इसका प्रमाण है। ऐसे में पाकिस्तान के सेनाध्यक्ष जनरल कमर जावेद बाजवा का यूक्रेन का खुला समर्थन और अमेरिका-चीन के प्रति वफादारी का राग अलापना खान सरकार और सेना को आमने- सामने ला खड़ा कर दिया है। विपक्षी पार्टियों द्वारा उनके खिलाफ लाए गए अविश्वास प्रस्ताव को पाकिस्तान के नेशनल असेंबली में उपसभापति द्वारा यह कहते हुए खारिज किया गया कि विदेशी ताकतों के शह पर चुनी गई सरकार को गिराने की साजिश असंवैधानिक है। इसके बाद प्रधानमंत्री खान ने नेशनल असेंबली को भंग कर चुनाव कराने की सिफारिश राष्ट्रपति को भेजा है और राष्ट्रपति ने नेशनल असेंबली भंग कर दी है। उधर विपक्षी दलों ने नेशनल एसेंबली में अपनी ओर से नया सभापति तथा शहबाज शरीफ को नया प्रधानमंत्री बनाया है। मौजूदा हालात में  पाकिस्तान में दो प्रधानमंत्री और नेशनल असेंबली में दो सभापति हो गए हैं। पाकिस्तानी सेना का कहना है कि उसका इस मामला से कुछ लेना-देना नही है। यह संवैधानिक संकट अब सुप्रीमकोर्ट में पहुंच गया है और उसकी सुनवाई 4 अप्रैल,2022 के लिए मुकर्रर की गई है।

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पाकिस्तान में एक दृश्य रूप से सरकार की सत्ता (स्टेट) है और एक अदृश्य सत्ता (डीप स्टेट) है जो सरकार को बनाने और गिराने की भूमिका में रहता है, साथ ही पाकिस्तान की

सरकार की अहम निर्णयों को प्रभावित करता है। पाकिस्तान एक इस्लामिक गणतंत्र है, इसलिए मध्यपूर्व के कुछ अरब देशों के एक खास समूह (खासकर सऊदी अरब, यूएई, कतर आदि) की प्रभावी भूमिका पाकिस्तान में होना स्वाभाविक है। अमेरिका का गहरा प्रभाव पाकिस्तान में है, पाकिस्तान के कुलीन वर्ग खासकर राजनीतिज्ञों और सैन्य अधिकारियों का धन और आवासीय ठिकाना अमेरिका और उसके नेतृत्व वाले नाटो देशों  में हमेशा से रहा है,उनके बच्चे भी उन्ही देशों में पढ़ते रहे हैं। अब तो चीन की भी अच्छी खासी पैठ पाकिस्तान की सत्ता- प्रतिष्ठानों की गतिविधियों पर दिखता है। पाकिस्तान के धार्मिक मौलानाओं और उनके आतंकी संगठनों का पाकिस्तान के सत्ता के गलियारों में जो प्रभाव है,वह जगजाहिर है। पाकिस्तान के लोगो के जेहन में बैठा है कि  इस्लामीक देश पाकिस्तान का जन्म ही हिंदुओं के साथ खूनी संघर्ष के फलस्वरूप हुआ है, ऐसे में पाकिस्तान को अपने जन्मजात दुश्मन हिंदु देश भारत से रक्षा के लिए एक मजबूत इस्लामिक सेना की जरूरत हमेशा रहेगी और ऐसे में पाकिस्तानी  सेना का वहां की सरकार पर प्रभाव लाजमी है। मोटे तौर पर ये पांच हितधारक पाकिस्तान में अदृश्य सत्ता (डीप स्टेट) की भूमिका में है। इन सबमें सबसे कारगर अदृश्य सत्ता पाकिस्तान की सेना है,ऐसा इसलिए क्योंकि आवाम की नजर में हिंदुओं से इस्लाम की रक्षा केवल पाकिस्तान की सेना ही कर सकती है और कोई नही। इसलिए पाकिस्तान की सेना पाकिस्तानी आवाम के लिए मसीहा से कम नहीं है और पाकिस्तानी सेना का सबकुछ अमेरिका एवं यूरोप के देशों में है, इसलिए पाकिस्तानी सेना अमेरिका एवं पश्चिमी देशों के मोहरा से अधिक कुछ नहीं है।

पाकिस्तान की सेना हमेशा पाकिस्तान में अपना कठपुतली प्रधानमंत्री तथा सरकार का गठन कराती है, इसके लिए वे पाकिस्तानी आवाम की अपने प्रति अगाध विश्वास के साथ ही कई और असरदार हथकंडे आजमाती रहती है। जुल्फिकार अली भुट्टो को प्रधानमंत्री बनाने वाला फिल्डमार्शल अयूब खान थे। वर्ष-1971 में पाकिस्तान के दो टुकड़े होने के बाद पाकिस्तानी सेना की तौहीन देश के अंदर भी हद पार कर चुकी थी और तत्समय पाकिस्तान के राष्ट्रपति जनरल याहिया खान की फजीहत चरम पर था। ऐसे माहौल का फायदा उठाकर जुल्फिकार अली भुट्टो पाकिस्तान के राष्ट्रपति बन गए और पाकिस्तानी सेना को आंखे दिखाने लगे।अमेरिका को अफगानिस्तान के मामले में पाकिस्तान की सेना की जरूरत वर्ष- 1978-79 हुई और इस मौके का फायदा उठाकर जनरल जियाउल हक जुल्फिकार अली भुट्टो को फांसी पर लटका दिया और स्वयं पाकिस्तान का राष्ट्रपति बन बैठा। जनरल जियाउल हक नवाज शरीफ को पहले पंजाब प्रांत का मुख्यमंत्री बनाया, फिर बाद में पाकिस्तानी प्रधानमंत्री की कुर्सी तक पहुंचने का मार्ग प्रशस्त किया। नवाज शरीफ ने परवेज मुशर्रफ को पाकिस्तानी सेना का सेनाध्यक्ष बनाया और जब नवाज शरीफ फौज को आंखे दिखाने लगे तो जनरल मुशरफ ने उन्हें सत्ता से बाहर कर खुद राष्ट्रपति बन बैठा। इससे पहले मुशर्रफ बेनजीर भुट्टो की हत्या कराकर नवाज शरीफ की तरफदारी की और उनकी ताजपोशी में मदद की। जनरल कमर जावेद बाजवा ने इमरान खान को प्रधानमंत्री बनवाया और जब इमरान खान फौज और उसके आकाओं को नजरंदाज करना शुरू किया, तो  इमरान खान को सत्ता गवाने की स्थिति में ला खड़ा किया। पाकिस्तान की घरेलू सत्तानीति का यह पैटर्न बार-बार दोहराया जाता है और आज भी यही प्रतिकृति साकार होती दिख रही है। लेकिन फर्क केवल इतना है कि इस बार खान साहब के मसले में सेना के अंदर दो फांट हो चुका है, कुछ कोर कमांडर खान साहब के साथ है तो कुछ अपनी वफादारी जनरल बाजवा के साथ दिखा रहे हैं।

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खान साहब ने अमेरिका और यूरोपीय देशों को अफगानिस्तान में जिस बेवफाई से बेआबरू होकर भागने पर मजबूर कर दिया, उसे तो अमेरिका और उसके नाटो सहयोगी यूरोपीय देश कभी नही भूल पायेंगे। आग में घी का काम खान साहब की बेगम साहिबा बुशरा बेगम की करतूतों ने कर डाला। बेगम साहिबा को पाकिस्तान में ‘पिंकी पिरनी’ ही आमतौर पर कहते हैं और वह अपनी जादुई टोटकों के लिए काफी मशहूर हैं। पिंकी पिरनी के टोटकों का ही कमाल है कि जनरल बाजवा के संस्तुति के बाबजूद भी डायरेक्टर जनरल इंटर सर्विस इंटेलिजेंस एजेंसी (डीजी आईएसआई) फैज अहमद हमीद को खान साहब ने पेशावर कोर कमांडर के पद पर दो माह तक ज्वॉइन करने नही दिया और लेफ्टिनेंट जनरल नदीम अंजुम को करीब दो महीने तक डीजी आईएसआई बनने नही दिया। बस क्या था गर्म तवे पर रोटी सेंकने के लिए अमेरिका ने अपना आज्ञाकारी पाकिस्तानी फौज की जिन्न को मुख्य भूमिका में ला दिया। यहीं से खान साहब की बिदाई की पटकथा पाकिस्तान फौज ने लिखनी शुरू कर दी। रही–सही कसर पिंकी पिरनी के टोटकों ने पूरा कर दिया जब खान साहब ने लेफ्टिनेंट जनरल फैज हमीद को फिर से डीजी आईएसआई बनाने की बात छेड़ दी। पाकिस्तान की फौज को अपने ऐसोआराम के लिए धन चाहिए और आवाम को दिखाने के लिए हमेशा नए-नए खिलौने (लड़ाकू साजो-समान) चाहिए। इन सबके लिए पाकिस्तानी सरकार को धन चाहिए और खान साहब ने अरब देशों, अमेरिका तथा यूरोपीय देशों और चीन से धन आने के सारे मार्ग बन्द कर चुके हैं, ऐसे में सेना की ख्वाइशों को पूरा करना खान साहब के लिए मुश्किल है। पाकिस्तान को कोई कर्ज देने को तैयार नहीं है और बाहर से निवेश की कोई गुंजाइश नहीं है। चीन से प्राप्त कर्ज की अदायगी की किस्त चुकाने तक के पैसे पाकिस्तान के पास नही है, ऐसे में चीन की पाकिस्तान में सीपीईसी (चीन पाकिस्तान आर्थिक गलियारा) सहित सारे प्रोजेक्ट ठप पर गए हैं।पाकिस्तान की आर्थिक स्थिति बद से बदतर हो चुकी है। एक अमेरिकी डॉलर की कीमत करीब 185 पाकिस्तानी रुपए के पार हो गई है।

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खान साहब ने पाकिस्तान में इस्लामिक राष्ट्रवाद के प्रबल पक्षधर के रूप में आवाम के समक्ष अपने को पेश करने की भरपूर कोशिश कर रहे हैं, अपने दिल में इस्लाम और दिमाग में पाकिस्तान वाली छवि प्रस्तुत की है। खान साहब पाकिस्तान को रियासत- ए-मदीना बनाने का एलान कर चुके हैं और इस सपने को पूरा करने में पाकिस्तान के भ्रष्टाचारी नेताओं और विदेशी ताकतों को सबसे बड़ा अड़चन बता रहे है।इसके समर्थन में देश के बाहर भी संयुक्त राष्ट्र संगठन (यूएनओ) के सामान्य सभा में इस्लामोफोबिया के विरुद्ध प्रस्ताव पास कराकर अपनी इस्लाम-परस्ती की दावेदारी मजबूत कर चुके हैं। अपने प्रतिद्वंदी पीएमएलएन पार्टी के नवाज शरीफ परिवार, पीपीपी पार्टी के भुट्टो परिवार और कट्टर देवबंदी मौलाना फजलुर रहमान (जमीयत-उलेमा-ए-इस्लाम पार्टी के अध्यक्ष) सहित विपक्ष के अन्य कद्दावर नेताओं के भ्रष्टाचारी चरित्र को स्मरण कराना खान साहब अपने जलसों में भूलते नही है।आनेवाले दिनों में पाकिस्तान की संवैधानिक संस्थाओं पर इन सब करिश्माई तेवर का असर देखना बेहद ही दिलचस्प होगा, फिलहाल सभी विपक्षी पार्टियां खान साहब सरीखे ऑलराउंडर के सामने टिक नहीं पा रहे हैं।

  “उसूलों पर जहाँ आंच आये टकराना जरूरी है
    जो जिंदा हो तो जिंदा नजर आना ज़रूरी है “

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