ये कैसा विकास ? निशा अग्रवाल
निशा अग्रवाल, हिमालिनी अंक मार्च । आज मैं नारी जीवन के उस पहलू पर लिखना चाहती हूँ जो नारी जीवन के लिए अभिशाप है । नारी जीवन का सबसे ज्यादा दर्दनाक और अभिशप्त पहलू । जहां नारी अपने जीवन का नरक भोगती है । पल–पल कुचली रौंदी जाती है । हर पल घुटती है, चिल्लाती है, मरती है, पर कोई नही जो उसे इस यातना से निकाल सके । वो ताउम्र यातनाओं के नाले में सड़ती है और वहीं मर जाती है ।
मैं बात कर रही हूं उस दुनिया में रहने वाली औरतों की जहां की औरतों को ‘सभ्य समाज’ की नारी भी तिरस्कृत नजरों से देखती है । बोलचाल की भाषा में उन्हें ‘धंधेवाली’ का नाम दिया गया है । ‘धंधेवाली’ यानी पुरूष की अनियंत्रित वासना की पूर्ति का साधन । पुरूषवर्ग उनका उपभोग करता है, उनका शोषण करता है, और इंसान से उसे एक वस्तु में तब्दील कर देता है । उन अंधी सड़ांध गलियों में जो दुर्गत नारी जाति की होती रही है या हो रही है या बेशक होती रहेगी, जब तक ‘पुरूष’ ‘महापुरुष’ नही बन जाता और ये सम्भव नही । हम सब उन गलियों की सच्चाई जानते है, पढ़ते है, सुनते है पर आवाज उठाने के नाम पर गुंगे बहरे और अंधे बन जाते है । नारी जीवन का ये वो पहलू है जहाँ सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण कदम उठाने की जरूरत है ।
ऐसे घृणित व्यवसाय को अपनाने के पीछे नारी के पास बहुत से कारण हैं । भूख, गरीबी, मजबूरी, अशिक्षा या डर । पर पुरूषों के पास एक मात्र कारण है जो वो औरतों को इस दलदल में धकेलता है वो है उसकी अपनी कामुक प्रवृत्ति । गरीब मजबूर लोगों का फायदा उठाकर छोटी–छोटी कोमल कलियों को इन अंधे कुओं में धकेल कर उनसे उनके जीवन जीने का हक छीन लिया जाता है । मासूमों को बहला फुसला कर कभी डर दिखला कर ये नारकीय जीवन जीने को मजबूर कर दिया जाता है । न कोई उनका दर्द देखता है, न उनकी पीड़ा किसी को छूती है । दो वक्त के भोजन के बदले न जाने वो कितनों का भोजन बनती हैं । छोटी–छोटी बच्चियों को जैसे दुर्दांत पशुओं के आगे डाल दिया जाता है कि आओ नोचों इनकी बोटियां । आह ! कितना दर्द ! कितनी तकलीफ ! अकल्पनीय यातना और जब उसे इस दर्द में जीने की आदत पर जाती है और वो बिना चीखे बिना चिल्लाए ‘धंधे’ पे बैठ जाती हैं या मुस्कुरा कर ‘सभ्य पुरूष ’को आमंत्रित करतीं हैं तो वो बेशरम वेश्या बन जाती है ।
सोचो, कितना दोगलापन भरा पड़ा है इन पुरूषों में । एक बार किसी लड़की का बलात्कार हो जाए तो ये उससे विवाह नही कर सकते क्योंकि वो ‘लायक’ नही रहती । पर उन गलियों की औरतों के साथ सोने में उन्हें कोई आपत्ति नही जिनके साथ पहले भी कई सो चुके हैं ।
और मुझे तो दुःख सबसे ज्यादा तब होता है जब हम औरतें भी उन्हें घृणित नजरों से देखती हैं । जब कि हम भलीभाँति जानती हैं कि स्वेच्छा से या खुशी से कोई भी ये काम नही अपनाता । उनके चेहरे की मुस्कान के पीछे छिपा बेइन्तहा दर्द हम औरतों को भी दिखाई नही देता । अपना घर अपना परिवार अपने बच्चे अपना संसार कौन नही चाहता । लोग घृणा से नही इज्जत की नजरों से देखे कौन नही चाहेगा भला ? पर अपने हर चाहत के दर्द को वो अपनी बेशरम हँसी में छुपा लेती है तो ये मतलब कतई नही कि वो खुश है । वो खुश हो ही नही सकती । कोई भी नही हो सकता । हम उन ‘धंधेवालियों’ से घृणा करते है पर उस तथाकथित सभ्य पुरूष वर्ग से नही जो उन्हें जन्म देता है । क्योंकि इन औरतों पर तो ठप्पा लग जाता है कि ये उपभोग की वस्तु हैं परन्तु इनका उपभोक्ता पुरूष अंधेरी रातों में इनका उपभोग करके दिन के उजाले में सभ्य समाज का हिस्सा बन जाता है । पर इन ‘वस्तुओं’ का समाज में कोई स्थान नही ।
नारी उत्थान या नारी विकास तब तक सम्भव नही जब तक इन गंदी गलियों में नारी जीवन पिसता रहेगा । नारी जीवन की ये दुर्गति पुरुषों की नारी दमन की प्रवृत्ति को उजागर करती है । वहां दिखता है अपने पैरों तले नारी को कुचलता मसलता अट्टहास करता पुरूष । कम से कम हम औरतों को तो उन्हें देखने का नजरिया बदलना ही चाहिए । वो कतई घृणा की पात्र नही । वो पात्र है दया की, करूणा की, आत्मीयता की । जरूरत है नारी के अन्दर बैठी उस ‘दुर्गा’ की जो काम वासना से आतुर महिषासुरों का अंत कर नारी जीवन का उद्धार कर सके । आवाह्न करो उस दुर्गा का जो समाज में बसे दानवों की दुर्गति कर दे । आवाह्न करो उस शक्ति का जो तुममें सन्निहित है ।
और अंत में..
नारी के द्वारा ही नारी उत्थान नारी विकास सम्भव है । अपनी जाति का सम्मान करो । अपने आत्म सम्मान के साथ जीओ ।

